नवनीत और हिन्दुत्व के प्रताप से उद्धव ठाकरे का सूफड़ा भी साफ हो सकता है*

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*राष्ट्र चिंतन*

*आचार्य श्री विष्णुगुप्त*
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उद्धव ठाकरे और बाल ठाकरे में वास्तविक अंतर क्या है? बाल ठाकरे अपने विचारों में अटल थे, स्पष्टवादी थे और प्रखर भी थे। उनके लिए सत्ता महत्वपूर्ण थी, उनके लिए हिन्दुत्व ही महत्वपूर्ण था। हिन्दुत्व को लेकर वे कभी समझौता नहीं किये। सत्ता में बैठना उन्हें पंसद नहीं था। सत्ता में बैठने के अवसर आने पर भी उन्होंने जोशी और नारायण राणे को मुख्यमंत्री बनाया था। बाल ठाकरे चाहते तो कांग्रेस या शरद पावर के साथ समझौता कर शिव सैना की सरकार बनवा सकते थे। बाबारी मस्जिद विध्वंस के समय जहां भाजपा के बड़े- बड़े नेता जैसे अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी आदि ने जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिये थे वहीं बाल ठाकरे ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस की जिम्मेदारी ली थी और उन्होंने कहा था कि उन्हें गर्व है कि उनके शिव सैनिकों ने बाबरी मस्जिद के ढाचे को गिराने का काम किया है। बाल ठाकरे ने पाकिस्तान और भारत के मुस्लिम करण पर भी कांग्रेस और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों के खिलाफ दहाड़ते रहते थे। यही कारण है कि बाल ठाकरे को हिन्दुत्व का अपराजित मसीहा, सर्वश्रेष्ठ योद्धा तक कहा जाता है।
अगर कोई हिन्दू नेता बाल ठाकरे के निवास मातोश्री या शिव सैनिक भवन के पास हनुमान चलीसा या कीर्तन का पाठ करने की घोषणा करता तब क्या होता? क्या उद्धव ठाकरे की तरह ही बाल ठाकरे की प्रतिक्रिया होती? क्या बाल ठाकरे हनुमान का पाठ करने वाले समूहों और कीर्तन करने वाले समूूहों को जेल भेजवाने का काम करते? वे ऐसा कदापि काम नहीं करते। बाल ठाकरे तो हनुमान वलीसा का पाठ करने वालों और कीर्तन करने वालों की खुद प्रशंसा करते और आमंत्रण देते, इतना ही नहीं बल्कि ऐसा करने वाले समूहों या व्यक्तियों को वे हिन्दू वीर भी घोषित कर देते। जानना यह भी जरूरी है कि सड़कों पर नमाज पढ़ने को लेकर और अराजकता तथा हिंसा फैलाने वाले मुसलमानों के खिलाफ बाल ठाकरे लगातार सक्रिय होकर विरोध करते थे।
इसके विपरीत उद्धव ठाकरे ने उस कांग्रेस से समझौता किया जिस कांग्रेस के खिलाफ शिव सेना का उदय हुआ था और जिस कांग्रेस के खिलाफ शिव सैनिकों ने बेहिसाब बलिदान दिये, संघर्ष किये। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि कांग्रेस ने शिव सेना का विध्वंस करने के लिए न जाने कितने हथकंडे अपनाये थे। बाल ठाकरे तक को कांग्रेस जेल में डलवाने की कोशिश करती रही थी। भाजपा ने शिव सेना के साथ गद्दारी की या उद्धव ठाकरे के अहंकार या फिर अति राजनीतिक महत्वाकांक्षा खलनायक रही है, यह अलग बात है। राजनीति में जिसकी शक्ति बड़ी होती है उसकी ही चलती है और सरकार भी उसी की बनती है। अपवाद को छोड़कर। भाजपा की सीटें ज्यादा थी, इसलिए भाजपा के मुख्यमंत्री पांच साल तक राज किये थे। पिछले चुनाव में भी भाजपा की सीटें शिव सेना से बहुत अधिक थी। इसलिए भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाने में अड़ी हुई थी। शिव सेना कम सीटें जीतने के बावजूद भी अपना मुख्यमंत्री बनवाने के लिए अडी हुई थी। इसलिए इस प्रकरण में सिर्फ भाजपा ही दोषी है, यह कहना ठीक नहीं है।
नवनीत राणा के प्रकरण पर उद्धव ठाकरे ने जिस तरह की नीति बनायी वह नीति पूरी तरह से चाकचौबंद नहीं थी। इतनी हिंसक और कठोर नीति की जरूरत ही नहीं थी। नवनीत राणा के प्रकरण पर उन्हें उदासीनता बरतने की जरूरत थी, नजरअंदाज करने की जरूरत थी। ऐसा अगर वे करते तो उ़द्धव ठाकरे की ही छवि बनती और बात आयी-गयी हुई होती, नवनीत राणा को इतना प्रचार भी नहीं मिलता और न ही उन्हें इतना बड़ा जनसमर्थन हासिल होता। सिर्फ महाराष्ट में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में नवनीत राणा को समर्थन मिला है और नवनीत राणा-रवि राणा हिन्दुत्व के नये चेहरे बन कर उभरे हुए हैं।
नवनीत राणा निर्दलीय सांसद हैं, उनके पास कोई अपनी राजनीतिक पार्टी नहीं है। इसलिए उनकी राजनीतिक शक्ति को कम देखना और आंकना बहुत बड़ी भूल है। राजनीति में मुद्दे-प्रसंग महत्वपूर्ण होते हैं। इसका उदाहरण अरविन्द केजरीवाल हैं। अरविन्द केजरीवाल ने जब लोकपाल के लिए आंदोलन शुरू किये थे तब उनके पास न तो कोई अपनी पार्टी थी और न ही अरविन्द केजरीवाल कोई सांसद या विधायक थे। पर उनके पास मुद्दा था। उस मुद्दे पर उन्होंने तत्कालीन केन्द्रीय सरकार को हिला कर रख दिया था। तत्कालीन कांग्रेस की सरकार अरविन्द केजरीवाल की शक्ति को कम कर आंकी थी और अरविन्द केजरीवाल को निपटाने के लिए इसी तरह के हथकंडे अपनायी थी। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार का विध्वंस हुआ। दिल्ली में कांग्रेस की सरकार का विध्वंस कर अरविन्द केजरीवाल ने अपनी सरकार बनायी। आज अरविन्द केजरीवाल की पंजाब में भी सरकार है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि अरविन्द केजरीवाल राष्टीय राजनीति के सिरमौर बनने के लिए अभियानी भी हैं। इसी तरह नवनीत राणा ने अजान के खिलाफ हनुमान चलीसा का पाठ करने की राजनीतिक नीति अपना कर हिन्दुओं के बीच अपनी जगह बनायी है।
नवनीत राणा के प्रसंग में भाजपा ही नहीं बल्कि राज ठाकरे भी साथ हैं। नवनीत राणा और रवि राणा की गिरफ्तारी के खिलाफ भाजपा सक्रिय है। भाजपा उद्धव ठाकरे की तथाकथित तानाशाही की आलोचना कर रही है। कहने का अर्थ है कि हनुमान चलीसा के पाठ के समर्थन में भाजपा भी कूद पड़ी है। राज ठाकरे ने भी अजान के खिलाफ सक्रिय हैं और धमकियां भी दी हे। शिव सैनिकों और राज ठाकरे की पार्टी के बीच भी गतिरोध हिंसक स्तर तक पहंुंच रहा है।
शिवसेना का आधार तो हिन्दुत्व ही रहा है। पर इस प्रश्न पर उद्धव ठाकरे पर गठबंधन की मजबूरी हावी है। कांग्रेस और शरद पवार के दबाव के कारण उद्धव ठाकरे की परेशानी समझी जा सकती है। लेकिन कई अन्य हिन्दुत्व के प्रश्न भी हैं जहां पर उद्धव ठाकरे की कमजोरी झलकी है। जैसे पालघर में हिन्दू साधुओं की हत्या। जहां पर हिन्दू साधुओं की हत्या हुई थी वहां पर ईसाई संगठनों और चर्च का दबदबा है। प्रचारित यह है कि साधुओं की हत्या में ईसाई संगठनों की साजिश थी। पालघर कांड पर गिरफ्तारियां भी हुई। पर हिन्दू संगठनों का आरोप है कि ईसाई संगठनों के दबाव में पुलिस ने चाकचौबंद जांच नही की थी। एनसीपी के मुस्लिम नेता नवाब मलिक की गिरफ्तारी से भी साख की समस्या उत्पन्न हुई है। नवाब मलिक का मुस्लिम प्रेम से भी शिव सेना की छवि खराब हुई है। नवाब मलिक पर माफिया डॉनों से संबंध रखने और बेहिसाब जमीन खरीदने और संपत्ति रखने के आरोप हैं। नवाब मलिक अभी भी जेल मे हैं। पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख का प्रकरण भी कम नुकसानकुन नहीं है। 100 करोड़ की वसूली के आरोप में अनिल देशमुख के खिलाफ सीबीआई जांच जारी है। पत्रकार अर्नब गोस्वामी के प्रकरण पर भी शिव सेना की आलोचना हुई थी।
उद्धव ठाकरे का हिन्दुत्व जनाधार सिखक रहा है। शिव सैनिक अजान और मुस्लिम विरोध के लिए जाने जाते हैं। नवनीत-रवि राणा प्रकरण, नवाब मलिक प्रकरण और अजान प्रकरण से संदेश यह गया है कि उद्धव ठाकरे अब मुस्लिम प्रेम के समर्थक हो गये हैं। उद्धव ठाकरे को अंहकार त्यागकर संयम दिखाने की आवश्यकता है। उन्हें हिन्दुत्व के प्रश्न पर समर्पण दिखाने की जरूरत है। हिन्दुत्व के मुद्दे कहीं उद्धव ठाकरे की सत्ता का पतन न करा दे, इसकी आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता है, शिव सेना भी बीते दिनों की बात हो सकती है।

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*संपर्क* …

*आचार्य श्री विष्णगुप्त*
मोबाइल … 9315206123
*नई दिल्ली*
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