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कश्मीरी आतंकवाद
अध्याय 4

महाभारत से कुषाण-काल तक कश्मीर 2

सम्राट अशोक

चक्रवर्ती सम्राट अशोक का शासन काल ईसा पूर्व 304 से ईसा पूर्व 232 माना जाता है। उसके शासनकाल में कश्मीर में ही नहीं बल्कि भारतवर्ष से बाहर भी बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार- प्रसार हुआ। इसका कारण यह था कि अशोक पर बौद्ध- धर्म के सिद्धांतों का बड़ा गहरा प्रभाव हो गया था। बौद्ध-धर्म अपने समय में वैदिक धर्म की स्थापना के लिए की गई एक महान क्रांति थी। यद्यपि कालांतर में यह स्वयं भी वैदिक सिद्धांतों से भटक गया । अशोक स्वयं एक वैदिक सिद्धांतों में आस्था रखने वाला सम्राट था। वह वेद के मानवतावादी सिद्धांतों से बहुत प्रभावित था।

बौद्ध धर्म था एक आंदोलन

प्रत्येक आंदोलन कुछ कालोपरांत एकमत में परिवर्तित हो जाता है। विश्व का इतिहास हमारे इस मत की पुष्टि करता है। जब कोई आंदोलन एक मत के रूप में स्थापित हो जाता है तो वह रूढ़ियों का शिकार हो जाता है। संसार में आज जितने भी मत, पंथ या संप्रदाय दिखाई देते हैं यह सभी मूल रूप में किसी न किसी आंदोलन की उपज हैं। जब इनका यह आंदोलन स्थायी रूप में एक मत, पंथ या संप्रदाय में परिवर्तित हो गया तो इनमें भी अनेकों प्रकार की रूढियां, पाखंड और एक दूसरे के प्रति हिंसा जैसे अमानवीय भाव भी समाविष्ट होते चले गए ।
वेदों के नाम पर उस समय जिस प्रकार का पाखण्ड व्याप्त हो गया था उसके विरुद्ध महात्मा बुद्ध ने एक महान आंदोलन चलाया। अशोक उसी आंदोलन को जनसाधारण से विश्व स्तर पर स्थापित कर देना चाहता था। वैश्विक स्तर पर भारत ने प्राचीन काल से लोगों का नेतृत्व किया है। अशोक ने यदि बौद्ध धर्म के वैदिक सिद्धांतों के प्रचार – प्रसार के लिए अनेकों धर्म प्रचारकों या उपदेशकों को संसार के कोने – कोने में भेजा तो उसका अभिप्राय यही था कि वह भारत के प्राचीन गौरवपूर्ण स्थान को फिर से स्थापित करना चाहता था। उस समय कश्मीर ने अपने सम्राट का साथ दिया और वैश्विक स्तर पर व्याप्त प्रत्येक प्रकार की रूढ़िवादिता या जड़ता को समाप्त करने में सहयोग प्रदान किया।
बौद्ध धर्म को अशोक का राज्याश्रय मिल जाने से यह बड़ी तेजी से प्रचारित और प्रसारित हुआ। कश्मीर ने भी इस नयी वैचारिक क्रांति में अपनी सहभागिता स्थापित की। उस समय के कश्मीर ने वैदिक और वैज्ञानिक विचारों को आने के लिए दरवाजे खोल दिए और वैदिक सिद्धांतों में लगी जंग को साफ करने में बढ़ चढ़कर भाग लिया।
नीलमत पुराण और कल्हण की राजतरंगिणी  से स्पष्ट होता है कि बौद्ध धर्म शास्त्रीय कश्मीरी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। सम्राट अशोक  के राज्य क्षेत्र में स्थित होने के कारण कश्मीर ने बौद्ध धर्म का न केवल स्वागत किया अपितु उसके विचारों को प्रचार प्रसार करने में भी अहम भूमिका निभाई।

अशोक और बौद्ध धर्म का मेल

यहां पर हम यह भी स्पष्ट करना चाहेंगे कि अशोक ने नए धर्म का केवल इसलिए स्वागत किया कि वह वैदिक सिद्धांतों का संरक्षक बन कर आया था या कहिए कि वैदिक सिद्धांतों के प्रति उसकी अटूट निष्ठा निष्ठा थी। इसलिए अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया – यह कहना उचित नहीं लगता। इसके स्थान पर यह कहना उचित है कि उसने नए बौद्धिक आंदोलन का इसलिए स्वागत किया कि वह पुरानी व्यवस्था को शुद्ध विशुद्ध कर देना चाहता था। जब कोई इतिहासकार यह कहता है कि अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था या कश्मीर में बौद्ध धर्म अशोक से पूर्व के हिंदू शासकों के समय में भी भली-भांति फूल-फल रहा था तो यह तथ्यों और तर्कों के साथ किया गया घालमेल है, जिसे उचित नहीं कहा जा सकता। इसके उपरांत भी हम यह भी कहना चाहेंगे कि अशोक ने बौद्ध धर्म की अहिंसा को सीमा से अधिक अपनाया। जिसका कुपरिणाम भारत को भुगतना पड़ा।
कश्मीर से चलकर बौद्ध धर्म ने उस समय के लद्दाख, तिब्बत और चीन में भी अपने विचारों का प्रचार – प्रसार किया। कश्मीर के शासकों द्वारा बौद्ध धर्म के संरक्षण के लेख राजतरंगिणी में पाए जाते हैं।
 सीलोनीज क्रॉनिकल के अनुसार , तीसरी बौद्ध संगीति के समापन के समय ही यह निर्णय ले लिया था कि बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न देशों में धर्म प्रचारकों को भेजा जाए। अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सम्राट अशोक ने मज्जंतिका को कश्मीर और गांधार (वर्त्तमान अफगानिस्तान) भेजा था। इस प्रकार मज्जंतिका वह पहला व्यक्ति था जिसने महात्मा बुद्ध की जीवनोपयोगी शिक्षाओं का कश्मीर में एक धर्मप्रचारक के रूप में प्रचार-प्रसार किया था।

राजा सुरेंद्र के समय में कश्मीर

यद्यपि कल्हण अशोक के पूर्ववर्ती राजा सुरेंद्र के शासनकाल में कुछ विहारों की स्थापना का उल्लेख करता है । कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार कश्मीर के पहले ज्ञात शासक, गोनंदा जरासंध से संबंधित थे । सुरेंद्र सम्भवत: कश्मीर के पहले शासक थे जिन्हें कई विद्वानों ने बौद्ध शासक के रूप में भी मान्यता प्रदान की है।  यह एक धर्म प्रेमी शासक था , जिसने कश्मीर में पहला बौद्ध विहार बनवाया। इनमें से एक सौरका शहर ( जोजी ला से परे सुरु) में था। जबकि दूसरा विहार श्रीनगर के उत्तर में अंचर झील के तट पर सोउर गांव के अनुरूप सौरसा में था ।
इतिहास में ऐसे अनेकों उतार-चढ़ाव आए हैं जब उसे संक्रमण काल से गुजरना पड़ा है। जब पहले मूल्य अस्थिर हो रहे हों या किन्ही कारणों से पहली व्यवस्था में जंग लग रही हो तो हमें यह समझ लेना चाहिए कि जंग लगी हुई व्यवस्था बहुत अधिक देर तक स्थाई नहीं रह पाती है। जैसे जब व्यक्ति कई दिन तक नहा नहीं पाता है तो उसके शरीर में खुजली मचने लगती है वैसे ही जब समाज किसी भी कारण से अस्त-व्यस्त हो जाता है और सामाजिक व्यवस्था डगमगा जाती है तो स्वाभाविक रूप से समाज में बेचैनी व्याप्त हो जाती है।

आते रहे हैं समाज सुधारक

हमें ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी बेचैनी उस खोई हुई अमूल्य चीज को पाने के लिए होती है जिसे हम समाज की परंपरागत सुव्यवस्थित स्थिति कह सकते हैं। जो खो जाता है उसे पाने के लिए बेचैनी होती ही है। उसे पाने की जितनी अधिक व्याकुलता बढ़ती जाती है उतनी ही तेजी से नई क्रांति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस प्रकार की बढ़ती हुई बेचैनी किसी न किसी नए समाज सुधारक के आने का संकेत देती है। यही कारण है कि संसार में इस सुव्यवस्थित स्थिति को पाने के लिए समाज में समाज सुधारक आते रहे हैं। किसी भी समाज सुधारक ने आज तक अपने मौलिक चिंतन के आधार पर कोई नई व्यवस्था संसार को नहीं दी है। बस , उसने समाज की पुरानी सुव्यवस्थित व्यवस्था को ही फिर से सुधारकर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
हमारे ऐसा कहने का अर्थ यह है कि सुव्यवस्थित व्यवस्था तो हमारे वेदों और वैदिक विद्वानों के द्वारा प्राचीन काल में ही स्थापित कर दी गई थी। उसमें समय-समय पर जंग लगती रही और नए-नए सुधारक उस जंग को साफ करने के लिए समय-समय पर आते रहे। महात्मा बुद्ध के समय जब वेद के नाम पर पशुओं को बलि चढ़ाए जाने लगा और कई प्रकार की सामाजिक विसंगतियां फैल गईं तब उन्होंने वेद की व्यवस्था को फिर से स्थापित करने का महान कार्य किया। इसी व्यवस्था को सम्राट अशोक ने अपना राजकीय संरक्षण दिया।
इस प्रकार जहां महात्मा बुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण के स्वामी थे वहीं सम्राट अशोक भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का शासक था। जिसके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को कश्मीर के लोगों ने अपना समर्थन प्रदान किया।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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