कश्मीर का इतिहास और आतंकवाद : महाभारत से कुषाण-काल तक कश्मीर 1

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अध्याय 4

महाभारत से कुषाण-काल तक कश्मीर 1

महाभारत काल के बारे में यदि कश्मीर के विषय में विचार करें तो पता चलता है कि महाभारत युद्ध से एकदम पहले तक प्रथम गोनन्द  का शासन कश्मीर पर था। कल्हण ने भी उसे कलियुग के प्रारंभ होने के पूर्व का ही एक प्रतापी शासक लिखा है। किस राजा के शासनकाल में कश्मीर का दूर-दूर तक साम्राज्य स्थापित हो गया था । गोनन्द के राज्य का विस्तार गंगा के उद्गमस्थान कैलाश पर्वत तक होने के प्रमाण मिलते हैं।(काश्मीरेंद्र से गोनदो वेल्लगंगादुकूलया। दिशा कैलासहासिन्या प्रतापी पर्य्युपासत – राजतरंगिणी, १.५७)। उस समय श्री कृष्ण जी ने भारतवर्ष में अत्याचारी शासकों का अंत कर शुद्ध वैदिक दृष्टिकोण को अपनाकर वैदिक सिद्धांतों और मूल्यों की रक्षा के लिए काम करने वाले वैदिक राज्य की स्थापना के लिए एक महाभियान चलाया हुआ था। अपने इस अभियान के अंतर्गत श्री कृष्ण जी ने अनेकों अत्याचारी शासकों का अंत कर वैदिक राज्य (आज के संदर्भ में हिंदू राष्ट्र ) की स्थापना करने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। श्री कृष्ण जी के इस इतिहास प्रसिद्ध अभियान की चपेट में जरासंध ही आया था। कश्मीर का राजा गोनंद इस जरासंध का निकट संबंधी माना जाता है।
जब श्री कृष्ण जी जरासंध को समाप्त करने के लिए उससे युद्ध कर रहे थे तब यह गोनंद भी जरासंध की सहायता के लिए सुसज्जित सेना लेकर मथुरा आया था। जरासंध की सहायता करने से पता चलता है कि गोनन्द एक राक्षस प्रवृत्ति का शासक था। जब वह जरासंध की सहायता के लिए यमुना के तट पर पहुंच गया तो श्री कृष्ण जी ने उसे भी नष्ट करने का निर्णय ले लिया। गोनंद की सहायता पाकर जरासंध का मनोबल और भी अधिक बढ़ गया और उसने दुगुने वेग से श्री कृष्ण जी पर हमला करना आरंभ कर दिया। इसके उपरांत भी श्री कृष्ण जी पर इन दोनों राक्षसवृत्तियों के शासकों के संयुक्त बल का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अंत में उस युद्ध में श्री कृष्ण जी ने इन दोनों का ही अंत कर दिया था। श्री कृष्ण जी के भाई बलराम जी ने इस गोनंद नाम के शासक का अंत किया था। इसके पश्चात गोनंद के पुत्र दामोदर ने राज्यसिंहासन संभाला। जिसने श्री कृष्ण जी से प्रतिशोध लेने के लिए उन पर उस समय आक्रमण किया जिस समय वह गांधार में एक स्वयंवर के उत्सव में सम्मिलित हो रहे थे। श्री कृष्ण जी ने अनुभवहीन दामोदर का भी युद्ध में अंत कर दिया।
व जिस समय दामोदर का अंत हुआ उस समय उसे कोई संतान नहीं थी तब श्री कृष्ण जी ने उसकी पत्नी यशोमती को राज्यभार सौंप दिया। रानी यशोमती उस समय गर्भवती थी। कुछ समय पश्चात उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। रानी ने अपने इस पुत्र का नाम द्वितीय गोनन्द रखा। कल्हण का कथन है कि उसी के समय महाभारत का युद्ध लड़ा गया। किंतु उस समय वह अभी बालक ही था और कौरवों पांडवों में किसी ने भी उससे महाभारत युद्ध में भाग लेने को नहीं कहा। उसकी माता का नाम यशोमति थी। कल्हण ने इस रानी के गुणों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।
श्री गोपीनाथ श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ‘कश्मीर : समस्या और पृष्ठभूमि’ में लिखा है कि कल्हण के अनुसार गोनन्द द्वितीय के बाद 35 राजा हुए। उनके संबंध में सारे अभिलेख नष्ट हो गए। इसलिए उनका कोई विवरण नहीं मिलता। कश्मीरियों का विश्वास है कि पांडव वंश के राजाओं ने भी कश्मीर पर राज्य किया था और इन 35 लुफ्त राजाओं में 23 राजा पांडव वंश के थे। मार्तंड तथा अन्य मंदिरों के भग्नावशेष पांडवलरी या पांडव भवन कहलाते हैं। इन लुप्त राजाओं में परीक्षित का पुत्र और अर्जुन का प्रपौत्र हरनदेव भी था। जो हस्तिनापुर के राज्य के लिए अपने भाई जन्मेजय से लड़ा था। किंतु जब वह अपने भाई का सामना न कर सका तो छम्ब पहाड़ी की तरफ भागा गया और एक कुटिया में जा घुसा। वहां एक ऋषि तपस्या कर रहे थे। ऋषि ने उससे कहा था कि वह एक दिन कश्मीर का राजा बनेगा। कहा जाता है कि हरनदेव कश्मीर गया और गोनन्द द्वितीय की सेना में भर्ती हो गया । अपनी योग्यता के कारण वह प्रधानमंत्री बन गया । गोनन्द द्वितीय के बाद वही पांडव वंशीय प्रथम राजा हुआ। जिस ने कश्मीर पर 30 वर्ष राज्य किया।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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