यजुर्वेद में यज्ञ शब्द पर हैं अनेक अर्थ

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यजुर्वेद में यज्ञ की अनेकों स्थानों पर बड़ी अच्छी व्याख्या की गई है।यजु० अ० १८ मन्त्र ६२ में ‘यज्ञम्’- ‘अध्ययनाध्यापनाख्यम्’ – अध्ययनाध्यापन कर्म का नाम यज्ञ है। यजु० अ० २२ मन्त्र ३३ में ‘यज्ञ’ शब्द बहुत बार आया है। यदि इस मंत्र को यजुर्वेद का सार तत्व कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी । इस मंत्र में आए यज्ञ शब्द से ही स्पष्ट हो जाता है कि यजुर्वेद यज्ञ का कितना पक्षधर है । इस मन्त्र में ‘यज्ञ’ शब्द से अनेक अर्थों का ग्रहण किया है। विद्यादान को भी यज्ञ कहा है। योगाभ्यास आदि कर्म भी यज्ञ है। श्रेष्ठ काम वा उत्तम काम यज्ञ है। यज्ञ का अर्थ यज्ञादि सत्कर्म करके प्रकट किया है कि जिन कर्मों को यज्ञ शब्द से ही प्रकट कर सकते हैं, उनसे अतिरिक्त कर्मों का ग्रहण भी ‘यज्ञ’ शब्द से करना युक्त है।
व्यापक परमात्मा और जीवात्मा दोनों यज्ञ हैं।
यजु० अ० २३ मन्त्र ५७ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘जगत् वा संसार’ किया है। बात स्पष्ट है कि जगत वा संसार भी यज्ञ की पवित्र भावना से ही चल रहा है, और चल भी सकता है।
यजु० अ० २३ मन्त्र ६२ में ‘यज्ञ’ शब्द से ‘जगदीश्वर’ अर्थ किया है। हे परमपिता परमेश्वर अपने आप में यज्ञ रूप है। सबके कल्याण में लगी रहने वाली परमेश्वर की अनुपम शक्ति से हम सब जीवन पाते हैं। नई ऊर्जा का अनुभव करते हैं।
यजु० अ० २५ मन्त्र २७ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘सत्कार’ किया है। यजु० अ० २५ मन्त्र २८ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘संगत’ किया है। यजु० अ० २५ मन्त्र ४६ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ ‘विद्वानों के सत्कार आदि उत्तम काम’ किया है। इन सब कार्यों में जितनी सेवा, समर्पण और त्याग की पवित्र भावना होती है उतना ही जीवन कल्याणकारी होता चला जाता है। जीवन में पवित्रता का वास होता है और हमारे आसपास के परिवेश में माधुर्य बिखर जाता है। मधुरता की समरसता जीवन को उन्नत करती है।
यजु० अ० २६ मन्त्र १९ में ‘यज्ञम्’ का अर्थ ‘धर्म्ये व्यवहारम्’ – ‘धर्मयुक्त व्यवहार’ ऐसा किया है। धर्म संसार की पवित्रतम व्यवस्था का नाम है । जो हमारे इस लोक और परलोक दोनों को सुधारती है। मनुष्य का व्यवहार जितना ही दूसरे के प्रति मधुरता पैदा करने वाला होता है उतना ही वह यज्ञ की पवित्र भावना से बंधता चला जाता है । इसीलिए यज्ञ को धर्म युक्त व्यवहार कहना भी युक्ति युक्त ही है।
यजु० अ० २६ मन्त्र २१ में ‘यज्ञम्’ का अर्थ ‘प्रशस्तव्यवहारम्’ – ‘उत्तम व्यवहार’ किया है। उत्तम व्यवहार लोक की रीति नीति को उत्तम बनाता है। सब एक दूसरे के प्रति आत्मीय भाव में विचरण करते हैं । जब उस आत्मीय भाव की वर्षा वाणी के माध्यम से होती है तो नए संगीत का निर्माण होता है। उस संगीत को मानव समाज जितना ही अधिक हृदयंगम करता जाता है उतना ही पवित्र समाज बनता चला जाता है ।
यजु० अ० २७ मन्त्र १३ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘सङ्गत व्यवहार’ किया है। यजु० अ० २७ मन्त्र २६ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘सङ्गत संसार’ किया है। यजु० अ० २९ मन्त्र ३६ में ‘यज्ञ’ का अर्थ ‘अनेकविधव्यवहारम्’ ऐसा किया है।
यजुर्वेद की इन तीनों सूक्तियों से पता चलता है कि यज्ञ की पवित्र भावना जब हमारे व्यवहार में समाविष्ट हो जाती है तो हमारा व्यवहार भी एक उत्तम कर्म के रूप में प्रकट होता है। जिससे संसार समरसता की मधुवाणी में भीगने लगता है। उस मधुवाणी को प्रकट करने में और सुनने में जिस आनंद की अनुभूति होती है वह प्रकट नहीं की जा सकती।
यजु० अ० ३० मन्त्र १ में ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ- ‘राजधर्माख्यम्’ – अर्थात् ‘राजधर्मरूप यज्ञ को’ ऐसा किया है। वास्तव में राजधर्म सबसे बड़ा धर्म है। इसके माध्यम से लोक शांति और लोकव्यवस्था को बनाने में सहायता मिलती है। जब हमारे ऋषि पूर्वजों ने राज्य व्यवस्था की स्थापना की थी तो वह यज्ञ की पवित्र भावना से प्रेरित होकर ही की थी। क्योंकि उसका अंतिम उद्देश्य लोक कल्याण करना है। यदि आज की राजनीतिक व्यवस्था भी इस वैदिक आदर्श को अपना ले तो सचमुच राज्य व्यवस्था लोक कल्याणकारी स्वरूप को प्राप्त कर सकती है।
यजुर्वेद अध्याय ३७ मन्त्र ८ में ‘मखस्य’ शब्द का अर्थ ‘ब्रह्मचर्य्य आश्रम रूप यज्ञ के’ किया है। इस अर्थ में ‘ब्रह्मचर्य आश्रम’ को यज्ञ कहा है। जैसे यज्ञ सृष्टि का आधार है, जीवन और जगत को सुव्यवस्थित करता है , वैसे ही ब्रह्मचर्य आश्रम जीवन की नींव है। ब्रह्मचर्य आश्रम में जितना संयम बना रहेगा उतना ही शेष जीवन पवित्र और सुदृढ़ विचारों वाला होगा। जिस प्रकार यज्ञ विश्व की नाभि है वैसे ही ब्रह्मचर्य आश्रम भी जीवन की नाभि है।
यजु० अ० ३१ मन्त्र ७ में ‘यज्ञ’ का अर्थ – ‘पूजनीयतम’ किया है। जब यज्ञ की भावना हमारे रोम रोम में समाविष्ट हो जाती है तो संसार का सारा व्यवहार उसी से प्रेरणा पाता हुआ और उसी के साथ लयबद्ध होकर गीत गाता हुआ दिखाई देता है। जीवन नवीन भावों से भर जाता है। छल, दंभ, द्वेष, पाखंड आदि हृदय से दूर हो जाते हैं । काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ आदि जैसी मलीनताओं से हृदय अपने आप को स्वतंत्र कर लेता है। तब जो कुछ शेष रहता है वह पूजनीयतम ही रहता है। उस शेष से समस्त संसार का कल्याण होता है।
श्री शिवपूजन सिंह कुशवाहा ने यजुर्वेद का गहन मंथन करने के पश्चात इस प्रकार की अनेक वैदिक ऋचाओं को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। जिनसे यजुर्वेद और यज्ञ का गहरा संबंध निष्पादित होता है। इसलिए वेद के ऋषियों ने स्थान स्थान पर जीवन को लोकहित में लगाकर परोपकार की पवित्र भावना से प्रेरित करने की शिक्षाएं दी हैं। यजुर्वेद की उपरोक्त सूक्तियों से स्पष्ट हो जाता है कि यह वेद तो अनेक स्थानों पर हमें यज्ञ की पवित्र भावना के साथ जोड़ने का कार्य करता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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