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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

वास्तविक बंधुता कब स्थापित होगी?

Holi 1जब तक एक मत अर्थात हम सब राष्ट्रवासी एक सी मति वाले और विचार वाले न हो जाएं, तब तक हमारी गति की दिशा सही नही होगी। एक जैसी मति ही सही गति का निर्धारण करती है। इसीलिए महर्षि दयानंद का विचार था कि जब तक एक मत, एक हानि-लाभ एक सुख दुख परस्पर न मानें तब तक उन्नति होना असंभव है। इसका अभिप्राय है कि जिस प्रकार एक भाई को चोट लगे और आह दूसरे की निकले, एक की संवेदनाएं दूसरे के साथ इस प्रकार एकाकार हो जाएं कि उन्हें अलग करना ही कठिन हो जाए तो वास्तविक बंधुता वही कहलाती है। नागरिकों की ऐसी गहन संवेदनशीलता राष्ट्रीयता का एक परमावश्यक तत्व है। महर्षि आर्यों के इस परिवारगत संस्कार को राष्ट्रगत संस्कार में परिवर्तित कर पुष्पित और पल्लवित होता देखना चाहते थे। इसलिए महर्षि का सपना था कि देश में जो विभिन्न मूलवंश, जाति और संप्रदायों का बखेड़ा खड़ा कर दिया गया है, यह बंधुता के मार्ग में एकबहुत बड़ी बाधा है।

हमारे संविधान से भी पूर्व 1948 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंगीकृत मानव अधिकार’ की घोषणा के अनुच्छेद 1 में यह कहा गया है-

‘‘सभी मनुष्य जन्म से ही गरिमा और अधिकारों की दृष्टि से स्वतंत्र और समान हैं। उन्हें बुद्घि और अंतश्चेतना प्रदान की गयी है। उन्हें परस्पर भ्रातृत्व की भावना से रहना चाहिए।’’

इसी आशय को लेकर हमारे संविधान निर्माताओं ने भारत के नागरिकों के मध्य बंधुता स्थापित करने की बात को प्राथमिकता दी। महर्षि दयानंद ने राष्ट्रीयता के संबंध में अपने विचारों को वेद की भाषा में स्पष्ट करते हुए कहा कि यह भारत भूमि हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं। यह माता और पुत्र का संबंध जब मातृभूमि और राष्ट्रवासियों के मध्य स्थापित हो जाता है तो उस समय देश में अपने आप ही बंधुता का भाव विकसित होने लगता है। स्वतंत्रता संघर्ष के काल में भारत माता की जय का नारा हमारे लिए बड़ा ही लोकप्रिय बन गया था। एक व्यक्ति जब इस उद्घोषण का वीरोचित शैली में उत्तर दिया करते थे। वह समय बड़ा ही रोमांचकारी होता था। कारण स्पष्ट था कि उस समय हमारी संवेदनाएं एकाकर हो जाती थीं। महर्षि संवेदनाओं के इसी स्वरूप को देश के नागरिकों का स्वाभाविक गुण बना देना चाहते थे।

क्या कश्मीर हमारी खंडित राष्ट्रीयता का प्रतीक है?

देश के किसी भी भाग में बसना और वहां अपना व्यापार या कारोबार स्थापित करना देशवासियों का मौलिक अधिकार है। पर यह बात कश्मीर पर लागू नही होती। धारा 370 इस राज्य को एक अलग प्रास्थिति प्रदान करती है। वास्तव में यह अनुच्छेद विघटनकारी है। परिणामस्वरूप राष्ट्र में खंडित राष्ट्रीयता का वातावरण हम देखते हैं। यह धारा हमारे भूगोल और इतिहास के तो विरूद्घ है ही साथ ही हमारे राष्ट्रवाद की डगर में सबसे बड़ी बाधा भी है। हमें सार्वभौम मानवतावाद के माध्यम से (नेहरू का अंतर्राष्ट्रवाद नही) देशों की कृत्रिम सीमाओं को धीरे-धीरे मिलाकर ‘एक राष्ट्र’ की स्थापना की ओर बढऩा था, पर हम उधर न बढक़र रास्ता भटक गये। हमने देश में ही विभाजन की दीवार खड़ी कर ली। यह दीवार स्वयं संविधान की मूल भावना के भी प्रतिकूल है।

महर्षि दयानंद के राष्ट्रवादी चिंतन की व्याख्या करते हुए डा. लालसाहब सिंह लिखते हैं :-स्वामी दयानंद के राष्ट्रवाद के विविध आयामों, स्वदेशी, स्वभाषा (हिंदी) स्वधर्म (वेदवाद) स्वराज्य तथा चक्रवर्ती आर्य राज्य के विस्तृत विवेचन के पश्चात यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय पुनर्जागरण काल के समाजसेवी तथा धर्माचार्य जहां लौकैष्णा तथा आत्मचिंतन तक ही सीमित थे, वही दयानंद ने मातृभूमि की दुर्दशा से द्रवित होकर उसके कल्याण और मुक्ति हेतु सार्थक चिंतन प्रस्तुत किया है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को जागृत करने के लिए अपने ब्रह्मसुख का परित्याग कर दिया। उनके लिए राष्ट्र मुक्ति ही परमधर्म था। एक संन्यासी द्वारा इस प्रकार का चिंतन अभूतपूर्व था।’’

वर्तमान संविधान में चूंकि उधारी मनीषा झलकाती है, इसलिए महर्षि का उद्भट राष्ट्रवाद तो इस संविधान का प्रतिपाद्य विषय नही है, परंतु राष्ट्रवाद को जितने अंश में दिखाया गया है या उसे बलशाली करने के रक्षोपाय किये गये हैं उन पर महर्षि दयानंद की चिंतन धारा का स्पष्ट प्रभाव हमें दिखायी देता है। इस संविधान पर चूंकि विदेशी झलक है इसलिए महर्षि दयानंद की भांति हमारे लिए आर्य चुनी हुई जाति, भारत चुना हुआ देश, और वेद चुनी हुई धार्मिक पुस्तक नही बन पायी है। महर्षि के इस आदर्श को इस संविधान की प्रस्तावना में ही स्थान मिलना चाहिए था। जिससे राष्ट्रीयता की भावना बलवती होती और सब लोगों की गरिमा की रक्षा का संकल्प एक राष्ट्र संकल्प बन जाता।

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