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भगवंत मान की ‘द हाफ सीएम’ वाली छवि केजरीवाल ने पुख्ता कर दी है


 राकेश सैन

हाल ही में पंजाब में पांच सीटों के लिए हुए राज्यसभा चुनावों में भी जिस तरह से सदस्यों की घोषणा हुई उसमें भी सन्देह पैदा होने लगा है कि आम आदमी पार्टी की पंजाब इकाई की कम और हाईकमान की ज्यादा चली है।

पंजाब में सत्ता परिवर्तन के उपरान्त नौकरशाहों के दिल्ली चक्कर पर यहां के प्रशासनिक क्षेत्र में मुख्यमन्त्री भगवन्त मान को अन्दरखाते ‘दि हाफ सीएम’ के नाम से पुकारा जाने लगा है परन्तु हाल ही के ताजा घटनाक्रम ने मान के इस नए नामकरण पर स्वीकृति की भी मुहर लगा दी लगती है। मामला यह है कि भगवन्त मान और बिजली मन्त्री हरभजन सिंह की अनुपस्थिति में पंजाब के मुख्य सचिव अनिरुद्ध तिवारी, बिजली विभाग के सचिव दलीप कुमार, ऊर्जा निगम (पावरकॉम) के मुख्य प्रबन्ध निदेशक (सीएमडी) बलदेव सिंह सरां ने दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल, वहां के मन्त्री सत्येन्द्र जैन और राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा के साथ बैठक की। आम आदमी पार्टी की ओर से विधानसभा चुनाव से पहले 300 यूनिट नि:शुल्क बिजली देने सम्बन्धी वायदा किया गया था, अब जबकि पंजाब में पार्टी की सरकार बन चुकी है, ऐसे में लोगों ने निःशुल्क बिजली की मांग शुरू कर दी है। इसी को लेकर केजरीवाल ने पंजाब के उक्त अधिकारियों की बैठक बुलाई। चाहे केजरीवाल सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक हैं परन्तु पंजाब में चुनी गई सरकार वैधानिक सीमा में बन्धी है। राज्य के संवैधानिक मुखिया या उनके चुने हुए प्रतिनिधि की अनुपस्थिति में इस तरह की बैठक पूरी तरह से अवैध, राज्य के मामलों में हस्तक्षेप और देश के संघीय ढांचे के विरुद्ध है।

पंजाब में सत्ता के तार दिल्ली से झनझनाने की दुर्गंध तो नई सरकार के कार्यभार सम्भालने के बाद से ही आनी लगी थी। अमृतसर (उत्तर क्षेत्र) से विधायक व पूर्व भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी कुंवर विजय प्रताप सिंह अपनी ही सरकार की स्थानान्तर व नियुक्ति सम्बन्धी नीति पर अपना विरोध दर्ज करवा चुके हैं। उन्होंने दो वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों प्रबोध कुमार को विशेष डीजीपी (गुप्तचर) और अरुणपाल सिंह को अमृतसर का पुलिस आयुक्त नियुक्त करने का विरोध किया। फेसबुक पोस्ट के माध्यम से उन्होंने अपना विरोध जाताया। चाहे बाद में उन्होंने अपनी पोस्ट को बदल दिया परन्तु तब तक मीडिया की सुर्खियां बनने पर मान सरकार की जगहंसाई हो चुकी थी। कुंवर विजय प्रताप का आरोप है कि बेअदबी काण्ड में अप्रैल 2021 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने विशेष जांच दल द्वारा की गई एक जांच को रद्द कर दिया था। कुंवर विजय प्रताप भी इसका हिस्सा थे। यह दल 2015 में कोटकपुरा और बहिबलकलां में गुरु ग्रन्थ साहिब की बेअदबी का विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस फायरिंग के 2 मामलों की जांच कर रहा था।
न्यायालय के आदेश के बाद कुंवर विजय प्रताप नौकरी से इस्तीफा देकर आम आदमी पार्टी में आगए। उन्होंने आरोप लगाया कि उक्त दोनों अधिकारी बड़े राजनीतिक परिवारों के पक्षधर हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बरगाड़ी-बहबलकलां मामले में न्याय न मिलने के लिए ये दोनों अधिकारी जिम्मेदार हैं। चाहे मुख्यमन्त्री मान ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी परन्तु इससे संकेत तो मिले हैं कि पंजाब की क्रान्तिकारी सरकार में कुछ गड़बड़झाला तो है। सवाल पैदा होता है कि कांग्रेस सरकार के चहेते अधिकारी आज आप की सरकार में किस तरह अपनी पसन्द के पद हासिल कर रहे हैं?

दूसरी तरफ हाल ही में पंजाब में पांच सीटों के लिए हुए राज्यसभा चुनावों में भी जिस तरह से सदस्यों की घोषणा हुई उसमें भी सन्देह पैदा होने लगा है कि आम आदमी पार्टी की पंजाब इकाई की कम और हाईकमान की ज्यादा चली है। ‘आप’ ने जालन्धर के रहने वाले क्रिकेटर हरभजन सिंह, फगवाड़ा स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के कुलपति अशोक मित्तल, पार्टी के पंजाब सह प्रभारी राघव चड्ढा, लुधियाना से उद्योगपति संजीव अरोड़ा और दिल्ली आईआईटी के प्रोफेसर डॉ. सन्दीप पाठक को राज्यसभा भेजा है। पार्टी पर केवल विपक्ष ने ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर उसके कार्यकर्ताओं ने ही आरोप लगाया कि यह नाम राज्य की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं। इन नामों के चुनाव में हाईकमान संस्कृति पंजाब के मुख्यमन्त्री पर भारी नजर आई।
वैसे विधानसभा चुनावों के दौरान भी ‘आप’ के राजनीतिक विरोधियों ने आरोप लगाया था कि केजरीवाल अपरोक्ष रूप से पंजाब की राजनीति व प्रशासन पर नियन्त्रण चाहते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्षा मायावती और पश्चिम बंगाल की मुख्यमन्त्री एवं तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्षा ममता बनर्जी की भांति केजरीवाल भी आम आदमी पार्टी के अघोषित एकछत्र सर्वेसर्वा हैं। उनके साथ उसी नेता की दाल गल सकती है जो ‘हाफ टिकेट’ सीट पर बैठने को तैयार हो। आम आदमी पार्टी का संक्षिप्त इतिहास भी साक्षी है कि चाहे योगेन्द्र यादव हों या कुमार विश्वास, किरण बेदी, आशुतोष व अन्य नेता, किसी ने भी फुल टिकेट की चाह रखी तो केजरीवाल ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया।
पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक होने के चलते अरविन्द केजरीवाल को पूरा अधिकार है कि वह अपनी पार्टी की सरकार पर कड़ी नजर रखें और उसका मार्गदर्शन करें परन्तु संविधान के दायरे में रह कर। देश के इतिहास में पहली बार हुआ है कि जब किसी राष्ट्रीय नेता ने अपने सत्ताधारी राज्य के संवैधानिक मुखिया या उसके प्रतिनिधि की अनुपस्थिति में उसके अधिकारियों के साथ बैठक की हो। मुख्यमन्त्री मान को साहस कर अपने अधिकारियों से इसके बारे में पूछताछ करनी चाहिए कि आखिर वे किस के आदेश से बैठक में गए। देश दस सालों तक एक कठपुतली प्रधानमन्त्री को झेल चुका है और उसी मार्ग पर भगवन्त मान चलते हैं तो यह पंजाब की जनता के जनादेश का घोर अपमान होगा। पंजाब की जनता उन्हें पूर्णरूपेण मुख्यमन्त्री के रूप में देखना चाहती है न कि ‘दि हाफ सीएम’ के रूप में।

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