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आज का चिंतन

रामायण से हम क्या सीखें ?

उगता भारत ब्यूरो

स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती
श्री रामचन्द्रजी के भक्तो! दिन-रात रामायण के पढ़नेवालो! महाराज रामचन्द्रजी को अपना बड़ा माननेवालों ! देश के क्षत्रिय जनो ! आप रामायण को, जो आर्यकुलभूषण, क्षत्रिय-कुलदिवाकर, वेदवित्, वेदोक्त कर्मप्रचारक, देशरक्षक, शूर-सिरताज, रघुकुलभानु, दशरथात्मज, महाराजाधिराज महाराज रामचन्द्रजी का जीवन-चरित सदा पढ़ते-सुनते हैं, परन्तु शोक है कि आप उस महानुभाव के दिव्य जीवन से कुछ भी लाभ नहीं उठाते । महाशयो! यह रामचरित्र ऐसा उत्तम है कि यदि मनुष्य इसके अनुसार अपना जीवन व्यतीत करें तो अवश्य मुक्ति-पद को प्राप्त हो जाएँ।
रामायण के आदि में महाराज रामचन्द्रजी के जन्म का वृत्तान्त लिखा है, जिससे बोध होता है कि हमारे देश के राजाओं को जब सन्तान की आवश्यकता होती थी तब वे लोग विद्वान् ब्राह्मणों को बुलाकर यज्ञ कराते थे। इस समय के लोगों की भाँति गाजीमियाँ की क़ब्रों में जाने और पूजा करने के ढकोसले नहीं करते थे। वे कभी सण्डों-मुष्टण्डों से सन्तान न चाहते थे। वे गूगापीर और मसानी को नहीं मानते थे। वे टोने और धागे नहीं कराते थे। ये सब शिक्षाएँ आपको महाराज रामचन्द्रजी के जन्म से प्राप्त होती है।
आजकल की भाँति ऐसा न था कि विद्योपार्जन को आजीविका के लिए समझें, अपितु विद्याभ्यास मनुष्यत्व का हेतु माना जाता था । मूर्ख को मनुष्य की संज्ञा ही नहीं मिलती थी। उस वेद-विद्या को पढ़ो जिसे महाराज रामचन्द्रजी ने पढ़ा था। उस वेद-ज्ञान को समस्त संसार में फैलाओ। तत्पश्चात् महाराज रामचन्द्रजी का विश्वामित्र के साथ जाना है, जो इस बात का पूरा प्रमाण है कि पूर्व-समय में विद्वानों और तपस्वियों का कैसा मान था ! देखो, राजा दशरथ ने प्राणों से अधिक प्यारे अपने दोनों पुत्र विश्वामित्र को दे दिये। दूसरे, उस काल में क्षत्रियों के बालक ऐसे बली होते थे कि रामचन्द्रजी छोटी-सी अवस्था में भी ऋषि के साथ वन जाने से भयभीत नहीं हुए और दोनों भाइयों ने सहस्रों दुष्ट राक्षसों को मार गिराया। ब्रह्मचर्य, विद्या और धर्म के ऐसे प्रताप को देखकर भी हम लोग धर्म नहीं करते।
तत्पश्चात् रामचन्द्रजी का जनकपुर में जाकर धनुष तोड़ना लिखा है। इससे भी उनके बल की महिमा विदित होती है। इसके पश्चात् महाराजा रामचन्द्रजी के विवाह का वृत्तान्त है, जिससे यह विदित होता है कि उस काल में स्वयंवर की रीति थी। आजकल की भाँति गुडे-गुडियों का विवाह, अर्थात बाल-विवाह का प्रचार न था। कन्या और वर दोनों ब्रह्मचर्य का पालन करते थे और जब वे पूर्ण विद्वान और बल-वीर्य में पुष्ट हो जाते थे तब विवाह करते थे, जिससे पति और पत्नी में सदा प्रीति रहती थी और उनके गृहस्थाश्रम सुख से व्यतीत होते थे तथा सन्तान हष्ट-पुष्ट और शुद्ध बुद्धिवाली उत्पन्न होती थी।
इसके पश्चात् महाराज को राज मिलने का लेख है और कैकेयी के आदेश से महाराज का वन को जाना और दशरथ महाराज की मृत्यु लिखी है। इससे क्या ज्ञात होता है? प्रथम तो यह कि नीच के संग से सदा हानि होती है। देखो, कैकेयी ने मन्थरा के संग से अपना सुहाग नष्ट किया। संसार को दुःख दिया, जगत् में अपयश लिया। जिस पुत्र के लिए यह अधर्म किया था, उस पुत्र ने भी उसको बुरा कहा। क्या इससे कुसंग से बचने की शिक्षा नहीं मिलती? जो लोग अधर्म करते हैं उनके घर के लोग भी उन्हें बुरा कहते हैं। दूसरे, महाराज दशरथ ने राज्य त्याग दिया, अपने प्यारे, नहीं-नहीं, नयनों के तारे पुत्र को चौदह वर्ष का वनवास दिया, अपने प्राणप्रिय पुत्र का वियोग स्वीकार किया, परन्तु अपना वचन नहीं तोड़ा। जिससे संसारभर में यश लिया और संसार को यह शिक्षा दी कि मनुष्य को जो कुछ किसी को देना हो शीघ्र दे दे, परन्तु किसी से प्रतिज्ञा न करे, न जाने कब कैसा समय आ जाए! क्योंकि, राजा दशरथ कैकेयी को यदि वर न देते तो उनको यह कष्ट और पुत्र का वियोग न सहना पड़ता।
यहाँ बहुत-सी शिक्षाएँ मिलती हैं, जैसे अन्धे माता-पिता अपने पुत्र श्रवण की मृत्यु से मर गये। इसी के फल से राजा दशरथ भी अपने पुत्र के वियोग से मरे। महाराज रामचन्द्रजी के वन-गमन के समय लक्ष्मणजी का सङ्ग में जाना भी अत्यन्त शिक्षापूर्ण है। देखो, उस समय के लोग कैसे पितृभक्त होते थे! महाराजा रामचन्द्रजी ने पिता के कहने से राज ही नहीं त्यागा, वनवास भी स्वीकार किया। क्या आजकल रामायण के पढ़नेवाले अपने पितरों की आज्ञा का पालन करते। हैं? दूसरे, लक्ष्मणजी का सङ्ग जाना भाइयों की प्रीति का प्रमाण देता है। लक्ष्मणजी ने भाई के लिए देश व माता-पिता का सुख त्याग दिया। सच्चे भाइयों की प्रीति ऐसी होती है। क्या आजकल के रामायण पढ़नेवाले अपने भाइयों से ऐसी प्रीति करते हैं? महाराज के साथ सीताजी का वन गमन लिखा है, जिससे स्वयंवर की रीति का गुण और सीताजी का पतिव्रत-धर्म झलकता है।
महाराजा भरत का रामचन्द्रजी को लेने जाना लिखा है। वह क्या ही देश के सौभाग्य का समय था कि अधिकारी के अधिकार का इतना ध्यान रखा जाता था! भरतजी में राज्य की तृष्णा नहीं थी। सबसे अधिक भाई की प्रीति दिखाई। फिर वन में रावण की बहन सूर्पनखा का रामचन्द्रजी के पास जाकर विवाह करने की प्रार्थना करना और महाराज का मना करना, उसका न मानना और हठ करना, लक्ष्मणजी का उसकी नाक काटने का वर्णन है। इससे यह भी शिक्षा मिलती है कि जो अधर्म पर हठ करता है उसकी नाक काटी जाती है। वीर क्षत्रियगण ऐसे हठी और दुराचारी को सदा दण्ड ही दिया करते थे।
इसके पश्चात् रावण का योगी-स्वरूप में आना लिखा है। इससे ज्ञात होता है कि जब दुष्ट अपने में बल नहीं देखता तब इसी प्रकार के छल करके सत्पुरुषों को कष्ट देता है। इससे यह भी ज्ञात होता है कि किसी के बाह्यस्वरूप पर नहीं रीझना चाहिए, क्योंकि दुष्टजन भी अच्छे पुरुषों का आकार बना सकते हैं। शोक है कि इस बात को देखकर भी हमारे देशवासी अपनी स्त्रियों को मुष्टण्डे वेषधारियों के पास जाने से नहीं रोकते ! जब सीता जैसी पतिव्रता स्त्री को एक कपटी पुरुष धोखा देकर निकाल ले-गया तो और साधारण स्त्रियों को वे क्या समझते हैं !
इसके पश्चात् जटायु का रावण के साथ युद्ध करके प्राण देना लिखा है, जिससे सच्चे मित्रों का मित्र-भाव ज्ञात होता है। जटायु ने प्राण दिये, परन्तु अपने जीतेजी अपने मित्र दशरथ की पतोहू को दुष्ट रावण से बचाया। क्या रामायण-प्रेमी अपने मित्रों का इस पक्षी से भी न्यून उपकार करेंगे?
उसके आगे रामचन्द्र जी का सीताजी से वियोग और विलाप है, जिससे ज्ञात होता है कि संसार में संयोग का वियोग अच्छे-अच्छे महात्माओं को भी घबराहट में डाल देता है। उसके पश्चात् रामचन्द्रजी को सुग्रीव का मिलना है, जिससे ज्ञात होता है कि संसार में दो प्राणियों के मेल से दोनों का कार्य सिद्ध होता है। तत्पश्चात् रामचन्द्रजी की बाली को मारना लिखा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जो किसी से शत्रुता रखता है उसका एक दिन अवश्य नाश हो जाता है। फिर महाराज का समुद्र पर पुल बाँधना है, जो उस समय की विशाल विद्या और उन महात्माओं के महान् प्रयत्न का साक्षी है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि यदि मनुष्य दृढ़ निश्चय रखता हो तो अवश्य कृतकार्य होगा। इसके पश्चात् विभीषण का रावण से विरुद्ध होकर रामचन्द्रजी से मिलना है। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि जब बुरे दिन आते हैं तब भाई भी शत्रु बन जाते हैं और जिस घर में दो मत होते हैं वह एक दिन अवश्य नष्ट होता है।
कारण यह कि रावण और विभीषण का एक मत न था, इसी से विभीषण उससे अप्रसन्न हो गया और यही मतवाद भारत का नाशक है। तीसरे, इससे यह भी ज्ञात होता है कि जब घर में फूट पड़ती है तब शीघ्र सत्यानाश हो जाता है, अतः हे सज्जन पुरुषो! तुम सदा फूट से अलग रहो । हे रामायण के पढ़नेवालो! तुम कभी भी अपने भाई से विरोध न करो और मतवाद को नष्ट करो।
इसके पश्चात रावणादि का महाराजा रामचन्द्रादि के हाथ से मारा जाना है, जिससे जात होता है कि जो अपने बल से बढ़कर छल के आश्रय काम करता है, वह अवश्य नष्ट हो जाता है। देखो, रावण ने रामचन्द्र के बल को जानते हुए यह ढीठपन किया। यदि वह रामचन्द्र के बल को न जानता तो पहले ही बल से सीता को लाता, छल न करता। रावण का छल करना ही उसकी निर्बलता को प्रकट करता है। रावण ने जान-बूझकर यह कार्य किया, अन्त में नष्ट हो गया। इससे यह भी ज्ञात होता है कि जो लोग झूठे अभिमानी मनुष्य के भरोसे संसार से बिगाड करते हैं और उस कपटी के व्यवहारों को नहीं विचारते, वे सदैव हानि उठाते हैं। देखो, यदि रावण के साथी इस बात का विचार करते कि रावण चोरी करके सीता को लाया है तो कभी रामचन्द्रजी से विरोध न करते और उनका नाश न होता। दूसरे, रावण ने जो पाप किया उसका फल पाया; कोई उसे पाप के फल से बचा न सका। जो परस्त्री पर कुदृष्टि करेगा उसकी यही दशा होगी! इसके अतिरिक्त और भी बहुत-से अशुभ फल प्राप्त होते हैं।
हमारे देश के लोग रामायण पढ़ते हैं, नित्य रामलीला देखते हैं, परन्तु उस पर विचार कुछ भी नहीं करते । उनका लीला देखना या नित्य रामायण पढ़ना ऐसा है जैसे एक बकरी का बाग में जाना। वह कभी घास चरती है तो कभी पत्तों पर मुँह मारती है। उसके लिए बार और जंगल एक-समान हैं। वह हानिकारक स्थलों से हानि तो उठाती है, वन में गढे में गिर पड़े तो टाँग टूट जाए, परन्तु बाग की उपयोगिता से उसे कोई मतलब नहीं ! इसी प्रकार हमारे देशीय भाई यदि दूषित और गन्दी पुस्तकों को पढ़ते हैं तो शीघ्र उनमें डूब जाते हैं, परन्तु उत्तम पुस्तकों को पढ़कर उनसे कुछ भी लाभ नहीं उठाते। यदि बहुत किया तो कहीं की दो चार चौपाई कण्ठस्थ कर लीं और जब कहीं कोई बातचीत हुई तो अपना पाण्डित्य जताने के लिए सभा में कह दीं। मैं बहुत-से लोगों को रामायण पढ़ते देखता हूँ, परन्तु उसके अनुकूल आचरण करनेवाले बहुत ही न्यून हैं। अब इस रामायण-सार का सूक्ष्मता से आशय कहते हैं।
रामायण में महावीरजी के चरित्र से सच्चे सेवकों का व्यवहार जान पड़ता है और रावण के इतिहास से जाना जाता है कि यदि कुल में एक भी दुष्ट पुरुष उत्पन्न हो जाए तो सारे कुल को नष्ट कर देता है। दूसरे, रावण पुलस्त्य मुनि का पौत्र था, शिवजी का भक्त था, वेदों का पण्डित था, परन्तु इतने पर भी मांस खाने और मदिरापान और परस्त्री-गमन करने से उसकी पदवी राक्षस की हो गई। अब तो रामायण के पढ़नेवाले लाखों दुराचार करते हैं, परन्तु अपने आपको साधु और ब्राह्मण ही मानते हैं।
अयोग्य से लालचवश विवाह मत करो! धर्म को नष्ट मत करो! माता-पिता की आज्ञा का पालन करो! माता को देवता मानो! उसकी श्रद्धापूर्वक सेवा करो! भाइयों से प्रीति रक्खो! थोड़ी बातों में उनसे विरोध मत करो! जहाँ तक हो सके प्राणान्त-पर्यन्त भाई को कष्ट मत दो ! यदि तुम इस प्रकार का जीवन व्यतीत करोगे तो अत्यन्त सुख होगा।
ये सब कार्य करने से आपकी रामचन्द्रजी के प्रति भक्ति पूर्ण होगी और आप सदा सुख पाओगे, नहीं तो तुमको कुछ फल न होगा। प्रायः मनुष्य परमेश्वर का भजन करते है, परन्तु फल नहीं मिलता, कारण यह है कि मनुष्य दश दोषों से नहीं बचते। वे दश दोष ये हैं ।
सन्निन्दासतिनाम वैभवकथा श्रीशेशयोर्भेदधीरश्रद्धा श्रुतिशास्त्रदैशिकगिरां नाम्न्यर्थवादभ्रमः।
नामास्तीति निषिद्धवृत्तिविहितत्यागो हि धर्मान्तरैः साम्यं नाम्नि जये शिवस्य च हरेर्नामापराधा दशः ॥
अर्थ-जो सत्पुरुषों की निन्दा करता है, उसे परमेश्वर नाम-फल नहीं देता। जो ऐसे नास्तिकों का नाम-माहात्म्य सुनाता है, जो महादेव और विष्णु को देव समझता है, जिसे वेदशास्त्र और गुरु की आज्ञा में श्रद्धा न हो, उसके लिए ईश्वर का नाम जपना व्यर्थ है। जो नाम के सहारे से मांस-मदिरा आदि दूषित वस्तुओं का सेवन करता है और नित्य-नैमित्तिक धर्म को छोड़कर केवल नाम ही जपा करता है अथवा ईश्वर के नाम को अन्य कार्यों के बराबर ही एक काम समझता है, उसे सब कामों से श्रेष्ठ नहीं मानता-ऐसे मनुष्य को नाम जपने से कोई फल प्राप्त नहीं होता।
लेखक- स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती
पुस्तक – दर्शनानन्द ग्रन्थ संग्रह
प्रस्तुति – ‘अवत्सार’

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