सत्गुरू मिलै भक्ति जगै, जग में दुर्लभ होय

बिखरे मोती-भाग 102

जितने भी संयोग हैं,
उतने ही हैं वियोग।
अटल सत्य संसार का,
मत लगा चिंता रोग ।। 943।।
व्याख्या :-
हमारे वेदों ने हमें जाग्रत पुरूष की तरह जिंदगी जीने के लिए प्रेरित किया है, किंतु इस संसार में अधिकांशत: मनुष्य आधी अधूरी जिंदगी जीते हैं। बेशक ऐसे व्यक्ति यज्ञ, सत्संग अथवा किसी धार्मिक अनुष्ठान में बैठे हों, वे केवल शरीर से विद्यमान रहते हैं, जबकि उनका मन-मस्तिष्क अतीत के दुखों अथवा अपमान की टीस में, पीड़ा में और भविष्य के डर अथवा चिंता में व्यथित रहता है, और फिर कहते हैं ईश्वर का दिया हुआ सब कुछ है, किंतु मानसिक शांति रूद्गठ्ठह्लड्डद्य क्कद्गड्डष्द्ग नही हैं। ऐसे लोगों को सर्वदा प्रकृति के नियमों को गंभीरता से देखना चाहिए। विधाता ने दिन के साथ रात बनायी है। बसंत के साथ पतझड़ बनाया है, जीवन के साथ मृत्यु है। ठीक इसी प्रकार सुख के साथ दुख है, मान के साथ अपमान है। संक्षेप में कहें तो संसार में जितने भी प्रकार के संयोग हंै उतने ही प्रकार के वियोग हंै। इस अटल सत्य को स्वीकार करके हमें जाग्रत पुरूष की तरह अनासक्त भाव से जीवन जीना चाहिए। अतीत की पीड़ा और भविष्य के डर के कारण शरीर में रोग और चिंता को प्रश्रय नही देना चाहिए। याद रखो, डर और चिंता तुम्हारे शरीर को ऐसे खा जाएंगे जैसे दीमक लकड़ी को खा जाती है। अत: सर्वदा भयमुक्त और चिंतामुक्त रहिए। अपने चित्त को हमेशा प्रसन्न रखिए।
सत्गुरू मिलै भक्ति जगै,
जग में दुर्लभ होय।
यह रूहानी अमीरी है यह,
बिरला पावै कोय ।। 944।।
व्याख्या :
इस संसार में भौतिक संपदा का संग्रह करने के लिए होड़ लगी है। लखपति करोड़पति होना चाहता है। करोड़पति अरबपति होना चाहता है। अरबपति खरबपति होना चाहता है, किंतु मन की तृष्णा फिर भी समाप्त नही होती है। यही मूल कारण है कि सांसारिक दौलत रूपया, पैसा, चल, अचल संपत्ति से सात्विक अमीरी अर्थात आध्यात्मिक संपदा श्रेष्ठ कहलाती है, क्योंकि पुण्य, प्रार्थना (भक्ति) परमार्थ के मार्ग पर चलने वाले की कामनाएं (तृष्णाएं) निर्मूल होती चली जाती हैं। वह अपने आपको प्रभु के चरणों में समर्पित कर सब कुछ उसी की मर्जी पर छोड़ देता है। ऐसा तभी होता है, जब जीवन में सच्चा गुरू मिले और प्रभु भक्ति का झरना फूट पड़े। यह अध्यात्म की पराकाष्ठा है, जिसे प्राप्त करना बड़ा ही दुर्लभ है। संसार में यह सात्विक अमीरी अर्थात रूहानी दौलत बिरले लोगों को ही मिला करती है, जनसामान्य को नही। इतिहास में इसके सुंदर उदाहरण हैं-गुरू नानकदेव, महात्मा गौतमबुद्घ, ईसामसीह, देव दयानंद इत्यादि।
बंधन और मोक्ष का,
हेतु मन कहलाय।
मन के साध सब सधै,
जीवन सफल बनाय ।। 945।।
व्याख्या : –
प्राय: देखा गया है कि मन की बड़ी आलोचना की गई है, किंतु गंभीरता से चिंतन किया जाए तो आप पाएंगे कि यह मन भवबंधनों का तथा मोक्ष का एक मात्र कारण है। मन तो सीढ़ी की तरह है, यदि इसे मुंडेरे के पास लगाया जाए तो व्यक्ति को सीढ़ी छत के ऊपर पहुंचा देती है और यदि सीढ़ी को किसी गढ्ढे में लगाया जाए तो वह व्यक्ति को गढ्ढे के निम्न तल पर उतार देती है। 
क्रमश:

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