जाने चले जाते हैं कहां दुनिया से जाने वाले’

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ओ३म्

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मनुष्य संसार में जन्म लेता है, शिशु से किशोर, युवा, प्रौढ़ व वृद्ध होकर किसी रोग व अचानक दुर्घटना आदि से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। वैदिक ग्रन्थों में मृत्यु का कारण जन्म को बताया गया है। यदि हमारा जन्म ही न हो तो हमारी मृत्यु नहीं हो सकती। यदि जन्म हुआ है तो मनुष्य का शरीर वृद्धि व ह्रास को अवश्य ही प्राप्त होगा क्योंकि शरीर का बढ़ना व घटना, निर्बल और रोगी होना उसका धर्म व स्वभाव है। हम मृत्यु के कारण जन्म को जानते हैं परन्तु फिर भी अपने किसी प्रिय बन्धु व परिवारजन की मृत्यु होने पर अपने आपको नियंत्रण या सामान्य स्थिति में नहीं रख पाते। अपने किसी परिचित व प्रिय व्यक्ति के मरने पर हमें दुःख रूपी क्लेश होता है। कुछ समय बाद हमारी आत्मा के भीतर उपस्थित परमात्मा हमें सांत्वना देते हैं और हम धीरे धीरे सामान्य होने लगते हैं। हमें मृत्यु का दुःख न हो इसके लिये हमें प्रयत्न करने हैं जिससे मनुष्य मृत्यु के भय से मुक्त होता है। प्रथम हमें जन्म व मृत्यु के रहस्य को जानना व समझना है तथा उन्हीं विचारों में जीने का अभ्यास करना है। महर्षि दयानन्द को भी अपनी बहिन व चाचा की मृत्यु से विषाद हुआ था। उन्होंने लोगों से मृत्यु से बचने के उपाय पूछे थे। परिवार के लोगों व अन्य किसी भी व्यक्ति से इसका सन्तोषप्रद उत्तर न मिलने पर ही उन्होंने ईश्वर के सच्चे स्वरूप व मृत्यु की औषधि ढूंढने के लिये अपने माता-पिता सहित सभी भाई-बन्धुओं वा परिवार का त्याग कर दिया था। देश भर के सभी प्रसिद्ध विद्वानों की संगति कर उन्होंने ईश्वर व जन्म-मृत्यु के रहस्य को जाना व समझा था और विवेक को प्राप्त होकर वह इससे दूसरों को लाभान्वित करने के लिये वेदों अर्थात् सद्ज्ञान के प्रचार में प्रवृत्त हो गये थे। हमारा सौभाग्य है कि हम महर्षि दयानन्द के प्रयत्नों से लाभान्वित हुए और आज हमें ईश्वर व जन्म-मृत्यु के रहस्यों सहित अनेक समस्याओं व शंकाओं का भ्रान्तिरहित ज्ञान है। हम समझते हैं कि सारा संसार इसके लिये महर्षि दयानन्द का चिरऋणी है। उन्होंने सत्यार्थप्रकाश नामक जो ग्रन्थ लिखा है वह सभी आध्यात्मिक शंकाओं व भ्रमों को दूर करने वाली अचूक ओषधि के समान है। सत्यार्थप्रकाश में जो ज्ञान निहित है वह ज्ञान संसार के अन्य ग्रन्थों में उपलब्ध नहीं होता। बिना इस ज्ञान के मनुष्य जीवन में निश्चिन्तता नहीं आती। यही इस सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का सबसे बड़ा महत्व है।

हम जानते हैं कि हमारा जन्म हुआ है। हमारी आयु निरन्तर बढ़ रही है। हम शिशु से वृद्धावस्था को पहुंच चुके हैं। हमारी शारीरिक शक्तियों में कमी आ चुकी है तथा अब धीरे धीरे हमारी शारीरिक शक्तियां और कमजोर वा न्यून होगीं। कोई अन्य रोग, जिसकी कल्पना भी नहीं है, आ सकता है। इन कारणों से भविष्य में हमारी मृत्यु होगी। हमारी मृत्यु अवश्य होनी ही है यह सब जानते हैं। मृत्यु से जो दुःख होता है वह प्रायः अज्ञानता के कारण होता है। हमें जन्म व मृत्यु के सभी पक्षों और इनके सत्यस्वरूप का ज्ञान नहीं है। अज्ञानता में कई बार बिना दुःख के समुचित कारणों के भी दुःख होता है। हम मृत्यु को जान लें तो फिर इससे बचने के लिये उपाय कर सकते हैं। हम जानते हैं कि जीवन व मृत्यु परमात्मा के हाथ में है। हमें परमात्मा को अपने अच्छे कार्यों से सन्तुष्ट करना है। अच्छे कार्य शास्त्रों में बताये गये हैं। वह कार्य ईश्वर, जीवात्मा और कारण-कार्य प्रकृति का वेदानुकूल ज्ञान प्राप्त करना है। ईश्वर व जीवात्मा आदि के सत्यस्वरूप को जानकर हमें ईश्वर के उपकारों को स्मरण कर उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना करनी है। इससे हमारी आत्मा को दृणता व बल प्राप्त होता है। बलवान आत्मा मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। यह हमने ऋषि दयानन्द की मृत्यु का दृश्य पढ़ कर समझा है। पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी तथा स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी के जीवन व मृत्यु के बारे में भी पढ़ा, सुना व जाना है। यह लोग मृत्यु के अवसर पर तनिक भी भयभीत नहीं थे। इसका कारण उनका ईश्वर व आत्मा सहित संसार का तथ्यात्मक व यथार्थ ज्ञान था तथा उनके जीवन का अधिकांश भाग ईश्वर भक्ति व उपासना में व्यतीत किया गया था। हमें भी अपने प्रिय जनों सहित अपनी भी मृत्यु के दुःख से बचने के लिये उन्हीं उपायों को करना है जो इन महापुरुषों ने अपने जीवनों में किये थे। वेदों सहित सत्यार्थप्रकाश, उपनिषद एवं दर्शनों का ज्ञान भी हमारी इस कार्य में सबसे अधिक सहायता कर सकता है। अतः हमें स्वाध्याय को जीवन में मुख्य स्थान देना होगा। इसी से हमारा अपनी मृत्यु का दुःख दूर होगा।

हमें इस जन्म में मृत्यु के दुःख से दूर होना है और भावी जन्मों में होने वाली मृत्यु से बचने के लिये भी मोक्ष के साधन करने हैं। इसके लिये हमारा जीवन स्वाध्याय में व्यतीत होना चाहिये। इसके साथ उच्च कोटि के वीतराग विद्वानों के प्रवचन व उपदेश भी हमारे काम आते हैं। हमें विद्वानों की संगति को भी महत्व देना चाहिये। इसका उपाय यह है कि हम आर्यसमाज व इसकी संस्थाओं के आयोजनों में उपस्थित रहें और वहां होने वाले विद्वानों के उपदेशों का श्रवण करने सहित वहां आयोजित वृहद-यज्ञों में भी भाग लें। ऐसा करके हमारा ज्ञान व आत्मा का बल निश्चय ही वृद्धि को प्राप्त होगा और हम इस जन्म में मृत्यु को पार कर सकेंगे और भावी जन्मों में भी हमें श्रेष्ठ मानव-देव-योनि मिलने के कारण हम आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति करते हुए मोक्ष को प्राप्त हो सकते हैं। यजुर्वेद के एक मन्त्र में कहा गया है कि मैंने ईश्वर को जान लिया है। वह ईश्वर सबसे महान है, आदित्य अर्थात् सूर्य के समान तेजस्वी है तथा अन्धकार से सर्वथा रहित है। उस ईश्वर को जानकर और उसकी उपासना कर ही मनुष्य मृत्यु रूपी दुःख से पार हो सकता है। मृत्यु से पार होने अर्थात् मोक्ष प्राप्त करने का अन्य कोई उपाय नहीं है।

वर्तमान में हम देखते हैं कि लोग अल्पायु में भी अनेक प्रकार के रोगों का शिकार होकर अकाल मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं। इसके अनेक कारण हो सकते हैं। एक कारण प्रारब्ध भी हो सकता है। अन्य कारणों में हमारा वायु व जल प्रदुषण सहित अन्न का प्रदुषण भी मुख्य है। इसके अतिरिक्त भी हम बाजार का बना जो भोजन करते हैं, वह भी स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम नहीं होता। पुराने समय में लोग घर का बना साधारण भोजन ही करते थे। पुराने अशिक्षित लोग भी रोटी, दाल, सब्जी, दूध, दही, फल आदि खाकर स्वस्थ रहते थे तथा 70 से 100 वर्ष की आयु व्यतीत करते थे। तब डाक्टर व चिकित्सक भी कम थे और रोग भी बहुत कम होते थे। वर्तमान समय में अन्न उत्पन्न करने वाले खेतों में रासायनिक खाद के प्रयोग व पौधों पर कीटनाशकों के छिड़काव ने अन्न को अत्यन्त प्रदुषित वा विषयुक्त कोटि में ला दिया है। लोभी व्यवसायी भी अनेक प्रकार की मिलावट आदि करके अन्न को दूषित करते हैं। वायु अत्यधिक प्रदुषित हो चुकी है। जल में भी अशुद्धियां विद्यमान रहती हैं। हमारे घर भी छोटे-छोटे बने होते हैं जिसमें वायु के घर के अन्दर आने व बाहर जाने का स्थान अर्थात् उचित मात्रा में वायु का प्रवेश व निकास नहीं होता। घर की वायु का बाहर न निकलना और घरों में अग्निहोत्र यज्ञों का न होना भी अनेक रोगों को जन्म देता है। इसका उपाय यही है कि हमारे निवास किसी खुले स्थान पर बने हों। घरों में रोशनदान व खिड़कियां उचित मात्रा में हों तथा घरो ंमें यज्ञ होता हो। ऐसा होने पर वहां रोग और मृत्यु के दुःख सामान्य से कम हो सकते हैं। इस ओर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। यह इसलिये भी आवश्यक है कि यदि हम इस पर ध्यान नहीं देंगे तो हम भी इसके शिकार हो सकते हैं और हमारी भावी पीढ़ियों को भी इससे हानि होगी।

हमें मृत्यु से डरना नहीं है अपितु उससे बचने के लिये अपने आध्यात्मिक ज्ञान को बढ़ाना है और प्राचीन ऋषियों की योग विधि से ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना सहित वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थों दर्शन एवं उपनिषद् आदि का स्वाध्याय करना है जिसमें सत्यार्थप्रकाश भी एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। यदि ऐसा करेंगे तो निश्चय ही हम दीर्घकाल तक स्वस्थ जीवन व्यतीत करते हुए मृत्यु के समय सरल व सहज होकर ईश्वर को स्मरण करते हुए अपने प्राणों का त्याग कर सकेंगे जैसा हम ऋषि दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम तथा पं. गुरुदत्त विद्यार्थी आदि महापुरुषों के जीवन में देखते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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