रामनवमी एवं आर्यसमाज-स्थापना-दिवस सनातन वैदिक धर्मियों के दो महनीय पर्व’

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ओ३म्

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आज दिनांक 10 अप्रैल, 2022 को दो महनीय पर्व रामनवमी एवं आर्यसमाज स्थापना दिवस हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम वैदिक धर्म एवं संस्कृति के आदर्श महान् पुरुष, रक्षक एवं प्रहरी हैं। उनका जीवन सभी मनुष्यों व संसार के लिए प्ररेक एवं अनुकरणीय है। वाल्मीकि रामायण के अनुरूप उनका जीवन सब मनुष्यों के अध्ययन करने एवं धारण करने योग्य है। रामचन्द्र जी ने अपने जीवन में वैदिक धर्म एवं संस्कृति को आत्मसात् कर उसका आचरण करते हुए उसे व्यवहारिक रूप दिया था। वैदिक धर्म एवं संस्कृति के सभी सिद्धान्तों को उन्होंने अपने कर्तव्यों एवं आचरणों में प्रशंसनीय रूप से स्थान दिया था। जब हम संसार के महापुरुषों का अध्ययन करते हैं तो हमें इतिहास में मर्यादा पुरुषोत्तम राम, योगेश्वर श्री कृष्ण, ऋषि दयानन्द एवं इतर सभी ऋषि मुनियों के ज्ञान एवं तप से युक्त जीवनों के समान जीवन दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। अतः हमें संसार के सभी सत्पुरुषों को आदर व सम्मान करते हुए ज्ञान एवं गुणों के भण्डार अपने महान् पुरुषों श्री राम एवं श्री कृष्ण जी सहित ऋषि दयानन्द जी को भी उचित सम्मान, आदर देना चाहिये व उनमें निहित वेद प्रेरित गुणों को धारण करना चाहिये।

ऋषि दयानन्द जी ने आर्यसमाज की स्थापना अपने समय में तेजी से विलुप्त हो रही सनातन वैदिक धर्म एवं संस्कृति की रक्षा के लिए की थी। वह इस कार्य में सफल भी हुए। उन्होंने सनातन धर्म एवं संस्कृति के मूल ग्रन्थ ईश्वरीय ज्ञान वेद की चार संहिताओं को खोज निकाला था। न केवल खोज निकाला था अपितु वेदों के सर्वसुलभ सरल वेदभाष्य का लेखन व प्रकाशन भी किया था। उन्होंने और उनके अनुगामी विद्वानों ने वेद के सत्य अर्थों अर्थात् वेदार्थों से जगत् को परिचित कराया है। उन्हीं की कृपा से आज हमें सत्य वेदार्थ प्राप्त हैं जिसका हम अध्ययन करने के साथ उसे अपने जीवनों में धारण किये हुए हैं व करने का प्रयत्न करते हैं। महर्षि दयानन्द और उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज का महत्वपूर्ण योगदान यही है कि ऋषि दयानन्द ने विलुप्त वेदों को खोज कर प्राप्त किया और मनुष्य जगत का कल्याण करने वाले उनके सत्य अर्थों को जगत् को प्राप्त कराया। वेदज्ञान से ही मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति होती है। उसके लोक व परलोक दोनों सुधरते हैं। मनुष्य के जीवन सहित समाज, देश तथा विश्व में शान्ति स्थापित होती व हो सकती है। यदि वेद न होते तो हमें लोक परलोक तथा अपनी आत्मा के अनादित्व तथा नित्यत्व का ज्ञान कदापि न होता। हमें यह ज्ञात न होता कि हम अनादि, नित्य, अजर, अमर व अविनाशी हैं। न केवल इस सृष्टि व कल्प में अपितु इससे पूर्व की अनन्त सृष्टियों व कल्पों में भी हमारे मनुष्य आदि अनेकानेक योनियों में जन्म हुए हैं और भविष्य में भी होंगे जिनका आधार हमारे जीवन के कर्म होंगे। सब सत्य विद्याओं सहित ईश्वर-जीव-प्रकृति का व्यापक ज्ञान प्रदान करने से वेद विश्व की सर्वोपरि महान् धर्म एवं संस्कृति सिद्ध होते हैं। वेद व वैदिक साहित्य सहित ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का अध्ययन कर संसार से अविद्या दूर हो सकती है और विश्व में सुख व शान्ति स्थापित हो सकती है। वेद एवं इसकी सत्य मान्यताओं का प्रचार करना सभी मनुष्यों का कर्तव्य है। जो मनुष्य ऐसा करेंगे उनका जन्म व परलोक दोनों सुधरेंगे वा उन्नत होंगे। हमारी आत्मा का मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होना सुनिश्चित है। यह जन्म हमें संसार के स्वामी, रचयिता, पालक व प्रलयकर्ता परमात्मा से प्राप्त होना है। वह सर्वव्यापक, सर्वज्ञ एवं न्यायकारी है। वह हमारे कर्मों का पूरा पूरा न्याय करते हुए हमें जन्म देंगे। हमें वैदिक धर्म के इस सिद्धान्त को सभी पठित व विद्वत्जनों को समझाना चाहिये और उन्हें भी इसके प्रचार की प्रेरणा करनी चाहिये। इसी में सबका कल्याण व हित निहित है। इन विचारों से पूरी मानवता एवं प्राणी जगत का भी उपकार होगा। हमारा वर्तमान व पारलौकिक जीवन भी उन्नति को प्राप्त होंगे। हमें मोक्ष प्राप्त हो या न हो, हम पशु एवं पक्षी आदि नीच योनियों में जाने से तो बच ही सकते हैं। हमें वेद, दर्शन, उपनिषद एवं ऋषि दयानन्द के सत्यार्थपकाश आदि इतर सभी ग्रन्थों का स्वाध्याय कर वेद के सिद्धान्तों एवं मान्यताओं को जानना और समझना चाहिये।

आर्यसमाज की स्थापना से वैदिक धर्म का पुनरुद्धार एवं रक्षा हुई है। यह कार्य सदा चलता रहना चाहिये। यदि इस कार्य में शिथिलता हुई तो इससे मानवता पर अनेक संकट आ सकते हैं। वेद प्रचार से ही मानव समाज श्रेष्ठ समाज बनेगा तथा कृण्वन्तों विश्मार्यम् से ही विश्व का कल्याण एवं उन्नति होगी।

हमें यह भी जानना है कि ऋषि दयानन्द ने वैदिक धर्म के पुनरुद्धार का कार्य अपने गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती, मथुरा की प्रेरणा से किया था। इस कार्य को करते हुए उन्होंने अपने कुछ सहयोगियों एवं अनुयायियों के निवेदन पर आर्यसमाज की स्थापना मुम्बई में 10 अप्रैल सन् 1875 को की थी। आर्यसमाज ने ऋषि दयानन्द निर्दिष्ट वैदिक सिद्धान्तों का प्रचार प्रसार करते हुए समाज को सृदण करने में सहायक कार्यों यथा अज्ञान, अविद्या, अन्धविश्वासों, पाखण्ड, कुरीतियां आदि दूर करने का महान कार्य किया है। आर्यसमाज ने ईश्वर की सच्ची स्तुति, प्रार्थना और उपासना को प्रचलित किया है। आर्यसमाज ने पर्यावरण को शुद्ध व पवित्र रखने सहित सब मनुष्य आदि प्राणियों को स्वस्थ रखने के लिए देवयज्ञ अग्निहोत्र भी प्रचलित किया जिसे अधिकांश आर्यसमाजी नियमित, सप्ताहिक व पाक्षिक रूप से करते हैं। माता-पिता का महत्व भी वैदिक साहित्य में पढ़ने को मिलता है। हमें माता-पिता का उनकी उचित आज्ञाओं का पालन करते हुए जीवन भर सहयोग व पालन करना है। इस परम्परा पर चल कर हमारी सन्तानें भी हमारे साथ ऐसा ही व्यवहार करेंगी और उन सन्तानों की सन्तानें भी उनका रक्षण व पालन करेंगी। इस दृष्टि से पितृयज्ञ का विधान है जिसे सभी विवेकी पुरुष स्वीकार करते हैं और अपने परिवारों में माता-पिताओं की तन-मन-धन से सेवा भी करते हैं। विद्वान अतिथियों का सत्कार करना भी गृहस्थियों का कर्तव्य होता है। इसे अतिथि यज्ञ के नाम से जाना जाता है। विद्वानों का आदर, उनकी सेवा तथा घर पर आने पर उनकी सेवा व उनसे विनम्रतायुक्त व्यवहार करना भी धर्म का आवश्यक अंग है। इसको भी शास्त्रों के आधार पर आर्यसमाज ने ही प्रचलित व प्रचारित किया है। पशु-पक्षियों में भी हमारे समान आत्मा है। यह सभी पशु पक्षी किसी न किसी रूप में मनुष्य जीवन में सहयोग करने के लिए परमात्मा द्वारा बनाये गये हैं। गायों से हमें दुग्ध मिलता है। बैल हमारी खेती में हल चलाने व अन्य कार्यों में सहायक होते हैं। घोड़े हाथी भी उपयेागी हैं। उनका भी पोषण हमें करना चाहिये। सभी प्राणियों के प्रति हमारा पूर्ण अहिंसात्मक व्यवहार होना चाहिये। अदण्डनियों को दण्ड व पीड़ा देना मनुष्यों का कर्तव्य व कार्य नहीं है। किसी को भी किसी प्राणी को अपने स्वार्थ के कारण कष्ट नहीं देना चाहिये। यह शिक्षा भी हमें बलिवैश्वदेव यज्ञ से मिलती है।

आर्यसमाज ने देश को स्वतन्त्र कराने सहित समाज से सभी प्रकार के अन्धविश्वासों और पाखण्डों को दूर करने का कार्य किया है व कर रहा है। आर्यसमाज ने समाज में सदियों से प्रचलित अनेकानेक कुरीतियों का उन्मूलन किया है। नारी शिक्षा सहित बच्चों की शिक्षा का आन्दोलन भी आर्यसमाज ने किया है तथा देश भर में गुरुकुल एवं विद्यालय खोले हैं जो आज भी संचालित हो रहे हैं। आर्यसमाज ने ही देश को सबसे अधिक वेदों सहित वैदिक धर्म एवं संस्कृति के पोषक विद्वान दिये हैं। आर्यसमाज स्थापना दिवस पर हमें आर्यसमाज के साहित्य सहित आर्यसमाज के इतिहास को पढ़ने का संकल्प लेना चाहिये। इससे हम आर्यसमाज के महत्व से परिचित हो सकेंगे। हम पायेंगे कि आर्यसमाज मानवमात्र वा प्राणीमात्र का कल्याण करने वाली संसार की एकमात्र अनूठी संस्था है। सबको आर्यसमाज के साथ सहयोग करना चाहिये और वैदिक विचारधारा को अपनाना चाहिये जो कि वस्तुतः सत्य, शिव एवं सुन्दर है। सबके लिए हितकारी एवं कल्याणकारी है। सबका पोषण करने वाली तथा दुःखों का निवारण करने वाली है। सब प्राणियों के प्रति न्यायपूर्ण व्यवहार करने की शिक्षा देती है। आर्यसमाज के स्थापना दिवस एवं रामनवमी पर्व की सभी बन्धुओं को हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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