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सृष्टि और आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान का मूल है:वेद

मनमोहन कुमार आर्य

इससे पूर्व कि सृष्टि और आध्यात्मिक विज्ञान कीkalam चर्चा की जाये, संक्षेप में यह जानना आवष्यक है कि वेद क्या हैं? वेद एक शब्द है जिसका अर्थ जानना व ज्ञान होता है। संसार में वेद नाम की अन्य कोई पुस्तक नहीं है जिसका कि कोई इतिहास न हो अर्थात् वेद-नामेतर सभी पुस्तकों व मत-मतान्तरों के धर्म-ग्रन्थों आदि सबका इतिहास अर्थात् लेखन का निश्चित काल व समय है। इन सबको ऐतिहासकि मनुष्यों ने लिखा व संकलित किया है। संसार मं् केवल ‘‘चार वेद’’ ही ऐसी पुस्तकें या मन्त्र संहितायें हैं जिसको बनाने वाली निराकार व सर्वव्यापक सत्ता ईश्वर है। इसका कारण न तो इसका कोई इतिहास उपलब्ध है और न हि इसके लेखक का कोई नाम व पता ही इतिहास में अंकित है। वेदों की अन्त:साक्षी भी इसे ईश्वरीय ज्ञान सिद्ध करती है।

शिक्षित व्यक्ति इस बात पर विश्वास नहीं कर सकते कि निराकार, सर्वव्यापक व सच्चिदानन्द-स्वरूप वाले ईश्वर से वेद रूपी ज्ञान उत्पन्न हो सकता है, जबकि यह बात पूर्णतय: सत्य है। आईये, इस पर संक्षेप में विचार कर लेते हैं। वेदों का ज्ञान ईश्वर से मनुष्यों को किस प्रकार से मिला, यह जानने के लिए ईश्वर तथा जीवात्मा के स्वरूप का जानना आवष्यक है। यहां इतना ही जानना पर्याप्त है कि ईश्वर चेतन तत्व है जो कि सर्वातिसूक्ष्म, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, निराकार व सर्वान्तर्यामी है। जीवात्मा भी एक चेतन तत्व, सूक्ष्म, एकदेशी, ससीम, अल्पज्ञ व अणु परिमाण है। ईश्वर सर्वव्यापक है व जीव व्याप्य है अर्थात् ईश्वर जीव के अन्दर और बाहर भी है। वेदों के अध्ययन व बौद्धिक ऊहापोह के आधार पर हम जानते हैं कि ईश्वर सर्वज्ञ अर्थात् सब सत्य विद्याओं का भण्डार है। आजकल की भाषा में इसे कह सकते हैं कि उसका ज्ञान अनन्त है और उसमें अज्ञान की मात्रा षून्य है। जीवात्मा के बारे में हम जानते हैं कि यह अल्पज्ञ है और अपने से अधिक ज्ञानी से ज्ञान की प्राप्ति की अपेक्षा रखता है। इसी गुण के कारण हमारे आज के ज्ञानी व वैज्ञानिकों ने अपने पुरूषार्थ से अपनी अल्पज्ञता को न्यून कर ज्ञान अर्जित किया है तथा वह संसार में अधिकतर सामान्य मनुष्यों से कहीं अधिक ज्ञान रखते है। हमारा सबका यह अनुभव है कि जब दो मनुष्य मिलते हैं तो आपस में मुख से बोलकर परस्पर वार्तालाप कर ज्ञान का आदान-प्रदान करते हैं। दूर होने पर वह जोर देकर बोलते हैं तथा पास आने पर धीरे बोलते हैं। एकदम, एक दूसरे के निकट होने पर और धीरे से बोलते हैं जिससे दूसरों के लिए उनका बोलना बाधक न हो। यह स्थिति तब है कि जब दोनों की आत्मायें पृथक-पृथक शरीरों में हैं। यदि कोई व्यक्ति कुछ गुप्त बात दूसरे के कान में कहता है तो पास वाले व्यक्ति को उसके ओठों के हिलने से पता चलता है कि वह बोल रहा है परन्तु ध्वनि, स्वर व आवाज बिलकुल सुनाई नहीं देती। इसे यह भी कह सकते हैं कि बिना ध्वनि के व्यक्ति अपनी बात दूसरे को समझा व सुना रहा है। अब यदि स्थिति यह बन जाये कि उपदेश या व्याख्यान देने वाला व्यक्ति व सत्ता जीवात्मा के अन्दर भी व्यापक व उपस्थित हो तो क्या बोलने की आवष्यकता होगी? इसका उत्तर है कि कदापि नहीं। ईश्वर जैसी सर्वज्ञ, सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी सत्ता को शब्द को उच्चारित करने की किंचित आवष्यकता नहीं होगी। वह उसकी आत्मा में ज्ञान प्रकट कर सकता है।

इसी प्रकार से सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने अपना ज्ञान चार वेदों यथा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद के रूप में क्रमष: अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा नाम के चार मनुष्यों को दिया था। यह चारों मनुष्य उच्च कोटि के ऋषि थे, अर्थात् इनकी आत्मायें अत्यन्त शुद्ध व पवित्र थी। वेदों का ज्ञान इन शुद्धात्मा ऋषियों को दिए जाने के कारण ज्ञान प्राप्त करने में इन ऋशियों को कोई कठिनाई नहीं हुई। ईश्वर ने ही उन्हें सभी मन्त्रों के अर्थ भी जना दिये थे। चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद इन ऋशियों ने वेदों का प्रचार किया और सबसे पहले ब्रह्मा नाम के ऋशि को प्रदान किया और उनके बाद सबने मिलकर अन्य मनुष्यों को वेदों का ज्ञान, अध्ययन व अध्यापन द्वारा, प्रकाशित व प्रचारित किया। वेदों को मनुष्यों को इस प्रकार दिया ज्ञान सम्भव कोटि में आता है। आजकल भी हमारे मन व आत्मा में नाना प्रकार के विचार, चिन्तन व ऊहापोह बिना शब्दों को बोले स्वत: चलता रहता है। कई बार आत्मा में कोई नया विचार अचानक आ जाता है। वह विचार ईश्वर के द्वारा प्रेरणा के रूप में हो सकता व होता है। हम उसे नोट कर लेते हैं और उस पर कुछ अधिक चिन्तन व मनन करने पर कई बार वह हमें बड़ी सफलता प्रदान करता है जिससे हमें प्रसन्नता व आनन्द की उपलब्धि होती है। हम समझते हैं कि यह सभी मनुष्यों का अनुभव होता है। हमें लगता है कि हमारी आत्मा योगियों व ऋशियों की भांति पूर्ण शुद्ध व पवित्र न होने के कारण हम उसे आंशिक रूप से ही समझ पाते हैं। आदि ऋशियों ने ईश्वर की प्रेरणा को पूरी तरह से समझा था। महर्षि दयानन्द के जीवन का भी एक उदाहरण इस प्रसंग में प्रस्तुत करते हैं। महर्षि दयानन्द ने ऋग्वेद का आंशिक व यजुर्वेद का सम्पूर्ण भाष्य किया है। जिन दिनों वह भाष्य करा रहे होते थे तो यदा-कदा किसी मंत्र का अर्थ व भाव प्रस्तुत करने में उन्हें कठिनाई होती थी। ऐसे अवसर पर वह भाष्य लिखने वाले पण्डितों को रोक कर अपनी कुटिया में चले जाते थे और वहां समाधि लगाकर बैठते थे। कुछ समय में समाधि में रहने के बाद वह वेदभाष्य लिखने वाले पण्डितों के पास आकर उस मन्त्र के अधूरे भाष्य, वेदार्थ वा मन्त्र के भावार्थ को पूरे विश्वास से लिखा देते थे। यह घटना यह बताती है कि समाधि की अवस्था में महर्षि दयानन्द ईश्वर का साक्षात्कार कर उससे मन्त्रों के यथार्थ अर्थ पूछते थे और परमात्मा उनको अर्थ बताता था। इस घटना का विवरण देखने के लिए आर्यजगत के प्रसिद्ध विद्वान डा. भवानीलाल भारतीय की पुस्तक ‘मैंने ऋषि दयानन्द को देखा’ का अध्ययन किया जा सकता है। हम यहां पाठकों व श्रोताओं को सत्यार्थ प्रकाश व ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका का वेदोत्पत्ति प्रकरण पढऩे का भी अनुरोध करते हैं।

संसार में हम अपने नेत्रों से जिस दृष्यमान जगत को देखते हैं वह जड़ पदार्थ है। हमारा अपना शरीर जिसमें पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां, मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार हैं, वह भी जड़ है। यह इन्द्रियां व अन्य अवयव सूक्ष्म कारण प्रकृति के विकार हैं जो सृष्टि की उत्पत्ति के समय कारण प्रकृति जो सत्व, रज व तम गुणों की साम्यावस्था कही जाती है, उस सूक्ष्म प्रकृति से बने हैं। अब यह प्रष्न उत्पन्न होता है कि ईश्वर ने अत्यन्त सूक्ष्म प्रकृति से इस सृष्टि को कैसे बनाया है? इसका उत्तर देने से पूर्व हम यह कहना चाहते हैं कि हम सबका शरीर जड़ प्रकृति से बना हुआ है जिसमें जीवात्मा अर्थात् ‘मैं’ व ‘हम’, जो एकदेशी, अल्पज्ञ, सूक्ष्म, ससीम, अनादि, अजन्मा, अमर, नित्य व चेतन तत्व है तथा जो इस शरीर में रहता है और शरीर को चलाता है। इस जीवात्मा के शरीर में न रहने पर शरीर जीवित नहीं रहता है जिससे यह सिद्ध होता है कि जीवात्मा ही मनुष्य व अन्य सब प्राणियों के शरीरों को चला रहा है। आत्मा का निर्देश मिलते ही हाथ इच्छानुसार गति करता है, शरीर उठ जाता है, इच्छा करने पर पैर इष्ट दिषा में चल पड़ते हैं, इच्छा के होने पर ही वाणी बोलती है व बोलने की इच्छा न होने पर चुप हो जाती है। सब कार्य जीवात्मा के इच्छा व संकल्प रूपी गुणों एवं शक्ति से सम्पन्न होते हैं। वेदों के अनुसार ईश्वर का स्वरूप सच्चिदानन्द, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेष्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तरर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। इन गुणों के अतिरिक्त भी ईश्वर में अनन्त गुण हैं परन्तु हमारा उद्देश्य ईश्वर के इन कुछ ही गुणों से पूरा हो जाता है। यह समझने की आवष्यकता है कि जिस प्रकार से जीवात्मा अपने शरीर को चलाती है, उसी प्रकार से परमात्मा सारी प्रकृति को, जो उसके पूरी तरह से वश व अधिकार में है, अपनी इच्छानुसार, जिसे ‘‘ईक्षण’’ कहते हैं, चलाता वा सृष्टि की रचना व उत्पत्ति करता है। वह पहले प्रेरणा व ईक्षा द्वारा प्रकृति की साम्यावस्था में गति व हलचल पैदा करता है। मूल अथवा कारण प्रकृति, इसके तीन गुणों सत्व, रज व तम की साम्यावस्था होती है। ईश्वर की प्रेरणा अर्थात् ईक्षण से इसमें गति व हलचल आती है। यद्यपि हमारे सत्य शास्त्रों में इस प्रकृति का पहला महत्व व दूसरा अहंकार नाम का विकार लिखा गया है परन्तु आधुनिक विज्ञान की खोजों व जानकारी के अनुसार प्रकृति का सूक्ष्मतम कण परमाणु है। हम इस परमाणु को पहला व पहले कुछ विकारों के बाद के कुछ उन्नत विकारों की श्रेणी में रख सकते हैं। यह, परमाणु, महतत्व व अहंकार में से कोई एक विकार हो सकता है। हमारे ऋशियों की बुद्धि अत्यन्त शुद्ध, पवित्र व सूक्ष्म विशयों को जानने व ग्रहण करने में समर्थ थी। वह सब साक्षात्कृत-धर्मा अर्थात् वैज्ञानिकों से भी अधिक बुद्धिमान थे। वह कूप-मण्डूक या आजकल के पौराणिक पण्डितों की तरह अन्ध-परम्परावादी नहीं थे अपितु वेदों के ज्ञान के साथ उन्होंने ईश्वर का साक्षात्कार भी किया हुआ था और यह सब सृष्टि विज्ञान, पदार्थ विज्ञान या भौतिक विज्ञान जिसमें रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, प्रकाश, उष्मा, गति, विद्युत, गुरूत्वाकर्षण, भूगोल आदि सभी ज्ञान-विज्ञान के पारदर्शी तत्ववेत्ता ज्ञानी, वैज्ञानिक व ऋषि अर्थात् तत्ववेत्ता मनीषी थे। उन्होंने प्रकृति की साम्यावस्था का भी अपने सूक्ष्म ज्ञान से साक्षात्कार किया था और परमाणुओं की रचना व उत्पत्ति के ज्ञान व विज्ञान से भी वह पूरी तरह परिचित व विज्ञ थे। उन्होंने अपने विशद ज्ञान के आधार पर यह स्वीकार किया है कि प्रकृति में विकार होकर जो परमाणु, अणु व यह दृष्यमान जगत बना है, जिसमें सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, अग्नि, जल, वायु, आकाश, विद्युत, प्रकाश आदि हैं, यह सब पदार्थ ईश्वर के द्वारा बनायें गये हैं। जिस प्रकार से किसी रचना का पूर्ण ज्ञान उसके रचयिता को ही होता है उसी प्रकार से इस सृष्टि का पूर्ण ज्ञान तो इसके उत्पत्तिकर्ता ईश्वर को है व अध्ययन, चिन्तन, मनन व ध्यान के द्वारा कुछ ज्ञान वैज्ञानिक कहे जाने वाले व्यक्तियों को भी है। परमाणु कैसे बनें, अस्तित्व में आये अथवा इनकी उत्पत्ति का ज्ञान तो आज के वैज्ञानिकों को भी नहीं है जिसका कारण वैज्ञानिकों का ईश्वर के अस्तित्व को ही अस्वीकार करना है। यह ज्ञान व विज्ञान वेदों में उपलब्ध है जो सृष्टि नियमों के अनुकूल होने के कारण सभी ज्ञानी व विज्ञानियों के लिए मान्य व स्वीकार्य होना चाहिये। ऋग्वेद का नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10/129) सृष्टि की रचना व इसकी उत्पत्ति के विज्ञान को जानने व समझने के लिए दृष्टव्य है। वैषेशिक और सांख्य दर्षन से भी सृष्टि विज्ञान को जानने में कुछ सहायता ली जा सकती है। इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है जो सृष्टि के आरम्भ में प्रथम वा आदि चार ऋशियों को सीधे परमात्मा से, उनकी अन्तरात्माओं में पउचंतज करके दिया गया था। यह भी हमने जाना है कि सृष्टि उत्पत्ति का ज्ञान भी वेदों में उपलब्ध है जिसको जान व समझ कर सृष्टि रचना के रहस्य को जाना जा सकता है। वेद और सृष्टि का रचयिता ईश्वर है, यह भी हमने जाना है। महर्षि दयानन्द महाभारत काल के बाद वेदों के सबसे बड़े विद्वान हुए हैं। उन्होंने वेदों का भाष्य करने से पूर्व चारों वेदों की भूमिका के रूप में एक ग्रन्थ की रचना की है जिसे उन्होंने ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका का नाम दिया है। इस पुस्तक में उन्होंने सृष्टि उत्पत्ति के साथ आधुनिक विज्ञान से सम्बन्धित अनेक विशयों पर, जो वेदों में भी वर्णित है, विस्तार से प्रकाश डाला है। इन विशयों में पर्यावरण, वायु शुद्धि, यज्ञ से वर्षा, सृष्टि विद्या, पृथिव्यादि लोक भ्रमण, आकर्षण-अनुकर्षण वा सृष्टि का धारण, प्रकाश्य-प्रकाशक लोक, गणित विद्या, जलयान व विमान, तार विद्या, वैद्यक वा चिकित्सा शास्त्र आदि को लिया है। महर्षि दयानन्द अंग्रेजी से सर्वथा अनभिज्ञ थे। वह कभी किसी सरकारी या ऐसे स्कूल जहां विज्ञान आदि पढ़ाया जाता है, न तो गये थे और न ही सम्पर्क में आये थे। उन्होंने अपने ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका ग्रन्थ में जो कुछ भी लिखा है, वह उनके वेदाध्ययन व स्वयं के अध्ययन व चिन्तन का परिणाम है।

ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका के विषयों से सहज ही यह अनुमान लगता है कि उन्होंने वेदों के आधार पर ही इन विशयों को लिखा है। यदि यह ज्ञान वेदों में हैं, जिसके कि उन्होंने प्रमाण भी उद्धृत किये हैं, तो वेदों में इन विज्ञान से जुड़े विशयों का वर्णन होना प्रमाणिक व सत्य सिद्ध होता है। अत: प्राचीन काल में वेदों के आधार पर भारत के ऋषि-मुनियों व शिक्षकों ने वेदों के आधार पर विज्ञान को विकसित किया था। आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व और सृष्टि बनने से 1,96,08,48,000 वर्ष पष्चात महाभारत के युद्ध के समय तक भारत ज्ञान-विज्ञान से पूर्णत: सम्पन्न था। इस महायुद्ध के बाद भारत का पतन आरम्भ होता है और मध्यकाल अर्थात् 2,000-2,500 वर्ष पूर्व देश की स्थिति अति दयनीय हो गई। देश अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, अन्ध-परम्पराओं, मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिश, जन्म के आधार पर ऊंची-नीची जातियों में बंट व फंस गया। ऐसे स्थिति में यूरोप व निकटवर्ती देशों में ईश्वर ने कुछ सुसंस्कारित ऐसी जीवात्माओं को जन्म दिया और उन्हें प्रेरणा की कि वह सृष्टि के बारे में विज्ञान के आधार पर चिन्तन करें। उन्होंने चिन्तन किया जिसका परिणाम यह हुआ कि समय-समय पर विज्ञान के नये-नये सिद्धान्त अस्तित्व में आये जो सृष्टि में तो कार्य कर रहे थे परन्तु जिनका ज्ञान उस समय के देश-विदेश के सुविज्ञ लोगों में प्राय: नहीं था। इस प्रकार से ज्ञान के विस्तार का आरम्भ होकर वह दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहा जिसने आज एक वट-वृक्ष का रूप धारण कर लिया है। हमारे चार वेद व प्राचीन वैदिक साहित्य किसी भी प्रकार से विज्ञान की प्रगति व वृद्धि में बाधक नहीं रहे अपितु साधक ही रहे हैं। यदि न होते तो महर्षि दयानन्द ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका में उनका वर्णन नहीं कर सकते थे। अत: यह निर्विवाद रूप से स्वीकार कर सकते हैं कि सृष्टि के आरम्भ से लगभग 1,96,06,48,000 वर्षों तक, महाभारतकाल तक, वेदों के आधार पर ही ज्ञान-विज्ञान विकसित हुआ था जो महाभारत के युद्ध के कारण पतनोन्मुख हुआ। इसके बाद विगत 2-3 शताब्दियों से यूरोप के लोगों के पुरूषार्थ व निष्पक्ष चिन्तन से विज्ञान पुन: विकसित हुआ है। वेद अन्य धर्मों के ग्रन्थों की भांति विज्ञान की प्रगति में बाधक नहीं रहे हैं अपितु साधक हैं जो कि ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका ग्रन्थ से ज्ञात होता है।

आईये, अब वेदों में आध्यात्मिक ज्ञान व विज्ञान का चर्चा करते हैं। वेदों के अनुसार संसार में मुख्यत: दो प्रकार के तत्व हैं, एक चेतन व दूसरे जड़। जड़ पदार्थों का ज्ञान भौतिक विज्ञान के अन्तर्गत आता है तथा ईश्वर व जीवात्मा, जो कि चेतन तत्व हैं, का अध्ययन आध्यात्मिक ज्ञान के अन्तर्गत आता है। ईश्वर व जीवात्मा के स्वरूप का वेदसम्मत वर्णन हम उपर्युक्त पंक्तियों में कर चुके हैं। अध्यात्म में जीवात्मा को आनन्द से रहित व सुख व आनन्द की अपेक्षा रखने वाला बताया जाता है। यह सुख कुछ सांसारिक पदार्थों व सुख-सुविधाओं की वस्तुओं से प्राप्त होता है परन्तु सांसारिक सुख-सुविधाओं व भोगों में सीमित सुख है। यह सांसारिक सुख समय के साथ कम होते-होते समाप्त हो जाता है। सभी सांसारिक सुख-सुविधा के पदार्थ दु:खों से मिश्रित होते हैं। यह सभी सांसारिक भोग धन से प्राप्त होते हैं जिसे अर्जित या कमाना पड़ता है। धन को अर्जित करने में भी पुरूषार्थ करना पड़ता है जिससे दु:ख होता है। फिर उस को व्यय करने में दु:ख होता है। फिर भोग को प्राप्त करने में भी दु:ख होता है और उसका परिणाम इन्द्रियों की शक्ति के क्षय होने व रोगों के कारण दु:ख के रूप में सामने आता है। धन चोरी न हो जाये या कोई छीन न लें, इसके लिए धन की रक्षा करनी होती है जो कुछ परिस्थितियों में जान लेवा तक हो जाती है जिससे दु:ख प्राप्त होता है। इस प्रकार से सुख की प्राप्ति में अनेक दु:ख होते हैं। इसके विपरीत ईश्वर आनन्दस्वरूप है। वह सर्वव्यापक व निराकार होने से सबको सर्वत्र हर काल में प्राप्त है। उससे स्तुति-प्रार्थना-उपासना, यज्ञ-अग्निहोत्र एवं सत्कर्मों द्वारा जुड़ कर आत्मा में आनन्द का संचार होता है जो कि स्थाई सुख होता है। इसका परिणाम भी अच्छा होता है। ईश्वर की उपासना से ईश्वर का साक्षात्कार करना ही जीवात्मा व मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। जो व्यक्ति ईश्वर की उपासना नहीं करता वह कृतघ्न होता है क्योंकि जिस ईश्वर ने हमारे सुख के लिए इस संसार व इसके समस्त पदार्थ बनाये हैं, हमें मनुष्य जन्म व माता-पिता, भाई-बहिन, मित्र व संबंधी दिए हैं, उसका उपकार न मानना व उसकी उपासना न करना कृतघ्नता है। इससे बड़ा पाप व दुष्कर्म और कुछ हो ही नहीं सकता। वेदों का ज्ञान सत्य है, इसका प्रमाण हमारे प्राचीन व अर्वाचीन ऋशि-मुनियों व योगियों द्वारा साधना करने के बाद वेदज्ञान का सही पाया जाना है। महर्षि दयानन्द स्वयं एक महान ऋषि व योगी थे और उन्होंने अपने सभी ग्रन्थों में वेदों के ईश्वरीय व सत्य होने के कारण इसको स्वत: प्रमाण मानना है। वेदों में जिस वैदिक संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है वह आज भी सर्वोत्तम व वैज्ञानिक है। संसार की कोई भाषा गुणवत्ता में इसके समकक्ष नहीं है।

चिन्तन, विचार, तर्क व प्रमाणों से यह सिद्ध हुआ है कि मनुष्य स्वयं भाषा का निर्माण नहीं कर सकते। इसके लिए उसे ईश्वर जैसी दिव्य सत्ता की अपेक्षा होती है। जिस प्रकार से मनुष्य को मानव शरीर व संसार के पृथिवी, सूर्य, चन्द्र व पृथिवीस्थ सभी पदार्थ अपौरूषेय सत्ता ईश्वर ने प्रदान किये हैं उसी प्रकार से वैदिक संस्कृत भाषा भी ईश्वर की ही देन है। आज संसार में जितनी भी भाषायें हैं, वह सब भौगोलिक कारणों व वैदिक संस्कृत भाषा में अपभ्रंस व विकारों से ही अस्तित्व में आई हैं। भाषा की दृष्टि व प्राचीनता की दृष्टि से भी वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान सिद्ध होते हैं। अत: वेदों को ज्ञान व विज्ञान का आदि व प्राचीनतम् मूल भण्डार स्वीकार करना प्रत्येक विश्व-वासी का कर्तव्य है।

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