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प्रमुख समाचार/संपादकीय

आज का चिंतन-13/07/2014

सेवा वही जिसमें स्वार्थ न हो

– डॉ. दीपक आचार्य3401holding-hands-page161
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dr.deepakaacharya@gmail.com

सेवा हर इंसान को करनी चाहिए, यह उसका प्राथमिक फर्ज है। उदरपूर्ति के लिए जरूरी काम-काज के बाद जो कुछ समय हमें मिलता है, उस पर हमारा कोई अधिकार नहीं है, वह समय समाज का है। यह वह समय होता है जब हमें आत्मकेन्दि्रत स्वभाव को छोड़कर औरों के लिए जीने तथा समाज और देश के लिए काम करने के लिए सदैव उद्यत रहना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं कि हम शेष समय को मन्दिरों, चौराहों, सर्कलों, पाटों, दुकानों की पेढ़ियों और दूसरी जगहों पर बैठकर गप्पे हाँकने और समाज व देश के लिए चर्चाएं करने में बिता दें। सेवा का अर्थ है हमारी कर्मेन्दि्रयों और ज्ञानेन्दि्रयों का सम्पूर्ण उपयोग, मेहनत और लक्ष्य के साथ कर्मयोग। इस मामले में लोगों की विचारधाराएं और मत भिन्न-भिन्न हैं।

हर इंसान का फर्ज है कि जिस मिट्टी से उपजा अनाज वह खाता है, जहां की वायु, पानी का सेवन करता है, जिन लोगों के बीच रहता है, वहाँ का कर्ज चुकाए बगैर वह ऋण मुक्त नहीं हो सकता। इस ऋण को चुकाने का सीधा सा अर्थ है कि हमारे काम-धंधे और नौकरी के अलावा जो कुछ समय मिलता है उसमें से अपनी सुविधा के अनुसार कुछ न कुछ समय समाज और अपने क्षेत्र के लिए निकालें और सेवा करें।

सेवा से सीधा तात्पर्य उस काम से है जो हम जनता की भलाई के लिए कर सकते हैं, ईश्वर ने हमें समर्थ बनाया है और जो हम आसानी से कर सकते हैं, इससे हमारे दैनिक जीवन या काम-काज पर किसी भी प्रकार का बुरा असर नहीं पड़ता। सेवा का संबंध रुपए-पैसों से कतई नहीं है। रुपए पैसे लेकर सेवा करने वालों की गिनती ठेकेदारों और मजदूरों में होने लगती है और इसमें किसी भी प्रकार की सेवा का हमें कोई पुण्य प्राप्त नहीं होता क्योंकि हम अपने द्वारा दी गई सेवा की एवज में पैसे ले लिया करते हैं, चाहे वे सामने वाले की इच्छा से प्राप्त कर लें अथवा हमारे किसी न किसी दबाव में।

सेवा का सीधा सा फार्मूला यह है कि अपने द्वारा किए गए वो काम जिनके बदले हमेंं किसी से कोई अपेक्षा नहीं होती, न धन की, न पब्लिसिटी की, न धन्यवाद पाने की। यह सेवा अपने आप में पूरी तरह निःस्वार्थ, निरपेक्ष और निष्काम ही होती है जिसकी किसी भी रूप में पुनर्भरण की इच्छा मात्र भी नहीं होती। जिस सेवा के बदले हम कुछ भी प्राप्त करने की आशा नहीं रखते हैं, उसी सेवा का पुण्य हमें प्राप्त होता है और ईश्वर भी इसी प्रकार की निष्काम सेवा से ही प्रसन्न होता है।

जस अच्छे कार्य के लिए हम सेवा का ढिण्ढोरा पीटते हुए दिन रात दूसरों से चंदा उगाही करते रहते हैं, दान-पुण्य और श्रद्धा के नाम पर रुपए-पैसों या अन्य प्रकार का सहयोग प्राप्त कर दूसरी जगह लगा दिया करते हैं उसका हमें कोई पुण्य प्राप्त नहीं होता। हैरत की बात यह है कि ऎसे लोग अपनी ओर से एक पैसा भी सेवा कार्यों में नहीं लगाते।

हमें प्राप्त होने वाले यश और पब्लिसिटी से उस सेवा का पुनर्भरण हमको हो जाता है, इसलिए ऎसे सेवा कार्य से पुण्य संचय और भगवान की प्रसन्नता की कामना दिवास्वप्न ही है। खूब सारे लोग सेवा के नाम पर  कितने सारे जतन करते रहते हैं लेकिन उनकी सेवा किसी मुनीम, हवाला कारोबारी या ठेकेदारी सेवा की तरह ही है जिसमें एक जगह से पैसा लाकर दूसरी जगह लगा दिया करते हैं। इसमें कई बार दबाव में, कई बार पापों की समाप्ति और कई मर्तबा अंध श्रद्धा का जबर्दस्त प्रभाव होता है।

कुछ लोग अपेन ही कामों में मस्त रहते हैं, अपने नौकरी और धंधों के सिवा उन्हें कुछ नहीं सूझता है। इन लोगों की अपेक्षा वे लोग अच्छे होते हैं जो यश-प्रतिष्ठा पाने या  अपने किसी न किसी स्वार्थ या पैसों के लिए किसी न किसी प्रकार के सेवा कार्यों में जुड़ जाते हैं और सेवा के नाम पर अपनी भी सेवा कर  डालते हैं। लेकिन सेवा करने वाले वे लोग दुनिया में सर्वश्रेष्ठ होते हैं जिनका हर कर्म परमार्थ से जुड़ा और निष्काम होता है। इन लोगों का कहीं भी अपना धेले भर का भी स्वार्थ नहीं होता। ये लोग यश-प्रतिष्ठा, नाम और तस्वीरों की भूख, छपास के महारोग और धन संग्रह की लोभी-लालची प्रवृत्ति से दूर रहकर चुपचाप सेवा करते रहते हैं। वस्तुतः सही सेवा यही है। इन लोगों के आत्मआनंद का कोई मुकाबला नहीं होता और ऎसे लोग मरने के बाद मुक्ति या स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।

जो लोग किसी न किसी नौकरी या काम-धंधों में कमा खा रहे हैं उन लोगों द्वारा किसी भी रचनात्मक गतिविधि और समाज सेवा की किसी भी प्रवृत्ति में धन, उपहार और प्रचार की भूख रखना बेमानी है और ऎसे लोगों द्वार किए जा रहे कार्यों को सेवा नहीं माना जा सकता है। जहां कहीं कुछ पाने की उम्मीद से कोई सा कर्म किया जाए, वह सेवा न होकर धंधे का स्वरूप ग्रहण कर लिया करता है।

आजकल अधिकांश लोग ऎसे ही हमारे सामने हैं जो सेवा के नाम पर हर कहीं मिल जाएंगे, जहाँ मौका मिलता है वहाँ मुँह मारने लग जाएंगे। ऎसे लोगों का कर्मयोग सेवा नहीं है। ऎसे लोगों को किसी भी सेवा कार्य में कहीं कोई लाभ दिखेगा, किसी भी आयोजन का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव सामने आएगा, ये लोग औरों का अनुबंध छीनकर उसमें घुसपैठ कर लिया करते हैं।   अपने लाभ के लिए कहाँ और किस तरह जाल बिछाया जाए, यह इन लोगों से बढ़कर और कौन जा सकता है।

सत्य तो यही है कि जो निःस्वार्थ कर्म करे वही कर्मयोगी, बाकी सारे तो हैं धंधेबाज। जिनकी आजीविका का साधन उपलब्ध है, चाहे वह नौकरी हो या फिर कोई सा काम-धंधा। इससे जो आमदनी होती है वह घरबार चलाने के लिए है। जो मिल रहा है उसमें संतोष करें। नियम तो यह भी है कि अपनी कमायी का कुछ हिस्सा जरूरतमन्दों व क्षेत्र की सेवा में लगाएं,लेकिन होना चाहिए वह शुद्ध ईमानदारी और मेहनत का, तभी फल मिलेगा।

इस बंधे-बंधाये पारिश्रमिक या मेहनताने के सिवा जो लोग अपने निर्धारित दायित्वों के लिए कहीं से पैसा, उपहार या और कोई सुविधा प्राप्त करते हैं वह सब नाजायज है। अपनी ड्यूटी के अलावा किसी सामाजिक, धार्मिक, रचनात्मक कार्य के लिए पैसे लेकर जो लोग काम करते हैं उन्हें कर्मयोगी, रचनात्मक कार्यकर्ता या समाजसेवी नहीं कहा जा सकता। ये लोग समाज के धंधेबाज हैं जिन्हें कहीं से भी पैसा या पब्लिसिटी चाहिए। ऎसे लोगों द्वारा किया गया कार्य न समाजसेवा की श्रेणी में आता है, न कर्मयोग की।

जो लोग पैसे  लेकर सामाजिक या सेवा कार्यों में जुटे रहते हैं उन लोगों को किसी भी प्रकार का सहयोग देना परमार्थ परंपरा का अपमान और सामाजिक अपराध है। अपने शरीर, धन और बुद्धि का इस्तेमाल उन्हीं लोगों या कामों के लिए होना चाहिए जो निःस्वार्थ व निष्काम भाव से सेवा करने का ध्येय रखते हैं।

धंधेबाजों को किसी भी प्रकार का सहयोग देने का अर्थ है समाज के निःस्पृह समाजसेवियों और श्रेष्ठ कर्मों को आघात  पहुंचाना। सेवा करने वाले लोगों को किसी से भी कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। सेवा का अंतिम उद्देश्य आत्म आनंद और ईश्वर प्राप्ति है। इससे पहले यदि कुछ प्राप्ति की आशा जग जाए तो समझ लेना चाहिए कि हम जो कर रहे हैं वह सेवा नहीं होकर धंधा ही है।

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