manarega2-300x185आजकल संपूर्ण विश्व को एक ग्राम (ग्लोबल बिलेज) कहने का प्रचलन बड़ी तेजी से बढ़ा है। विश्व में इस समय बाजारीकरण का वर्चस्व है और एक देश का उत्पाद दूसरे देश में बड़ी सहजता से उपलब्ध हो जाता है। थोड़ी सी देर में आज आप हवाई यात्राओं से विश्व के किसी भी कोने में पहुंच सकते हैं। किसी भी कोने में घटित हुई कोई भी घटना थोड़ी सी देर में ही आधुनिकतम संचार माध्यमों के द्वारा विश्व के हर भाग में पहुंच जाती है। हर देश के साथ हर देश का वासी वैसे ही जुड़ा है, जैसे किसी एक गांव में कोई व्यक्ति अपने पड़ोसियों या अन्य ग्रामवासियों से जुड़ा होता है। इन सबको देखकर ही ‘ग्लोबल विलेज’ जैसी अवधारणा ने जन्म लिया है, जिसे सुनकर एक सुखानुभूति होती है।

पर भारत ने इस ‘ग्लोबल विलेज’ से भी बढक़र विश्व के लिए एक अवधारणा दी थी, जिसे ह

म ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के नाम से जानते हैं। स्पष्टहै कि परिवार ग्राम से भी छोटी परंतु अत्यंत संवेदनाओं से भरी हुई एक ईकाई है। आप अपने परिवार के सदस्यों के दुख-दर्द के प्रति जितने संवेदनशील हो सकते हैं, उतने अपने पड़ोसी के प्रति नही और जितने पड़ोसी के प्रति हो सकते हैं, उतने अपने अन्य ग्रामवासियों के प्रति नही। इसलिए संवेदनाओं के विस्तार के लिए परिवार एक महत्वपूर्ण इकाई है। आप अपने ‘मिशन’ का शुभारंभ परिवार से करेंगे तो लाभ मिलेगा। इसीलिए ग्राम से पहले परिवार होता है, परिवार की एक व्यवस्था होती है, उस व्यवस्था में परिवार का कोई मुखिया होता है, कोई बौद्घिक रूप से समृद्घ व्यक्ति होता है, जो कि परिवार का बौद्घिक  मार्गदर्शन करता है, तो कोई  व्यक्ति परिवार की शत्रुओं से रक्षा करने वाला क्षत्रिय होता है, कुछ लोग परिवार में उत्पादन के श्रम में लगे होते हैं, जिनके हाथ में परिवार का अर्थ-तंत्र होता है। इसी प्रकार परिवार में कुछ बालक भी होते हैं, जिनका पालन-पोषण और विकास करना परिवार के प्रत्येक व्यक्ति का कार्य होता है। अर्थतंत्र वाले लोग यदि वैश्य हैं तो परिवार के बच्चे शूद्र हैं, जिनका अपना मुख्य कार्य परिजनों की सेवा तथा विद्याध्ययन होता है। भारत की संस्कृति का मूल शूद्र को शूद्र बनाये रखना नही है, अपितु शूद्र को हर व्यक्ति उसके शूद्रत्व से ऊपर उठाकर उसके कल्याण की योजनाओं में लगा दीखता है। भारतीय परिवार-व्यवस्था से इस भावना का वास्तविक बोध होता है।

भारत की यही ‘परिवार-व्यवस्था’ घर से निकलकर संसार का निर्माण करती थी। इसीलिए घर-संसार जैसे शब्द समूह में घर पहले आता है। परंतु यह शब्द समुच्चय हमें स्पष्टकरता है कि जैसा घर होगा वैसा ही संसार भी बनाना होगा। संसार को श्रेष्ठ बनाने (कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम्) के लिए पहल घर से ही करनी होगी। इसलिए घर पहले है, संसार बाद में। जैसे माता-पिता जैसे शब्द समुच्चय में माता को पिता से पहला स्थान देकर स्पष्टकिया गया है कि मां परिवार की प्रमुख ईकाई है और सारा परिवार उसी के मार्गदर्शन में चलता है। मां का सुशिक्षित और सुसंस्कारित होना इसलिए आवश्यक है कि वह घर की मुखिया होती है और उसके मार्गदर्शन में जैसा घर बनता है, वैसा ही संसार भी बनता जाता है। इसलिए माता को वेद ने निर्माता कहा है। पहले वह परिवार का निर्माण करती है और बाद में उसी के संस्कारों से विश्व का निर्माण होता है। इस प्रकार नारी का विश्व व्यवस्था के निर्माण में एक महत्वपूर्ण स्थान है। हमारी नारी सुशिक्षित और सुसंस्कारित होनी तो आवश्यक है, पर वह नौकरी पेशा वाली होनी आवश्यक नही है। क्योंकि यदि वह कमाने वाली बनेगी तो ‘घरवाली’ (गृहस्वामिनी) नही रह पाएगी, जिससे परिवार से विश्व निर्माण का आदर्श कहीं पीछे छूट जाएगा। कमाना पुरूष का कार्य है और ‘बनाना’ महिला का कार्य है। वसुधा को ही परिवार बनाने या मानने के लिए या विश्व को आर्य बनाने के लिए भारत की इस परिवार व्यवस्था का अनुकरण शेष विश्व को करना ही होगा।

आज विश्व एक ग्राम भी नही है, जैसा कि कहा जा रहा है। क्योंकि आज विश्व ग्राम की उपभोक्ता वादी बाजारीकरण की व्यवस्था में सबको संवेदनाएं स्वार्थ पूर्ण मानसिकता के बोझ तले दबकर मर रही है। हर व्यक्ति आपसे इसलिए संबंध रखना चाहता है कि उसका आपसे कोई स्वार्थ पूर्ण होने जा रहा है, यदि स्वार्थ नही है या स्वार्थ पूर्ण हो गया है तो इसके पश्चात उस व्यक्ति का आपसे संबंध विच्छेद  हो जाता है। फलस्वरूप एकाकीपन की अवस्था ने मानव जीवन में तेजी से विस्तार किया है। कोई भी व्यक्ति किसी से भी अधिक बात करना, उचित नही मानता। एकाकीपन की इस अवस्था के चलते भाई-भाई में, पिता-पुत्र में, माता-पुत्री में, पति-पत्नी में और संतान एवं माता-पिता में संवादहीनता की व्याधि बड़ी तेजी से विकसित हुई है। फलस्वरूप अपने चारों ओर भारी भीड़ होते हुए भी व्यक्ति लाखों करोड़ों लोगों के मध्य भी स्वयं को अकेला अनुभव करता है। उसका हंस रोता है, इसलिए बाहर से हंस नही पाता। चुप रहता है और चुप रहने की बीमारियां (ब्लड-प्रेशर, शुगर, हार्ट प्रॉब्लम इत्यादि) से ग्रसित हैं। इसलिए इस दम घोंटू संसार की ‘चुप की बीमारी’ से एक दिन ‘चुप होकर’ ही चला जाता है। इस दमघोंटू विश्व व्यवस्था को भी लोग ‘ग्लोबल विलेज’ कहते हैं, तो ऐसा सुनकर दुख होता है। क्योंकि यह हमारी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की प्राचीन आर्य परिवार परंपरा के विरूद्घ है। कोई भी संवेदनशून्य व्यवस्था कभी भी व्यवस्था कही ही नही जा सकती। व्यवस्था वही होती है, जो संवेदनाओं का निर्माण करे, जो मानव का निर्माण करे, जो विश्व का निर्माण (कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम्) करे और जो संपूर्ण भूमंडल को एक परिवार की व्यवस्था के अनुरूप ढाले, चलाये और व्यवस्थित होकर जीना सिखाए।

हम बड़े प्यार से ‘ग्लोबल-विलेज, ‘ग्लोबल-विलेज’ कहते रहते हैं पर कभी यह विचार नही करते कि इस ‘ग्लोबल-विलेज’ में क्या एक ग्राम के निवासियों की सी संवेदनाएं हैं? एकव्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास देशों की सीमाओं के भीतर प्रांतों की सीमाओं में और प्रांतों की सीमाओं में जनपद, नगर, कस्बे, गांव मौहल्ले या परिवार आदि की सीमाओं में जकड़ा फंसा पड़ा है। इसी प्रकार उसकी पहचान विभिन्न जातियों, संप्रदायों और वर्गों में कहीं दबी छुपी पड़ी है। इसलिए व्यक्ति जिंदगी का झूठा नाच नाच रहा है, भारतीय संस्कृति ने उसे आनंद लोक का वासी माना, उसका रास्ता तय किया कि तुझे अन्नमयकोष से निकलकर आनंदमयकोष तक पहुंचना है, हमने आनंद को मनुष्य की स्वर्जित पूंजी माना है, और मनुष्य को इसी ‘पूंजीवादी व्यवस्था’ में जीने के लिए प्रेरित किया। इसके लिए उसे रास्ता दिया योग का, ईशभक्ति का एवं मानव प्रेम का। इसी रास्ते को अपनाकर मानव ने अपनी उड़ान भरी और वह आनंद के पारलौकिक जगत का निर्माण इसी वसुधा पर करने लगा। हमारे नामों के पीछे आनंद और देव आने का कोई न कोई तो कारण होगा ही, उसे आज खोजने की आवश्यकता है। आज भी व्यक्ति को आनंद और देव का उपासक बना दो तो सारा संसार 33 करोड़ देवों का रहस्य समझ जाएगा। उसे पता चल जाएगा कि देव तैंतीस करोड़ नही अपितु सात अरब (विश्व की वर्तमान जनसंख्या) से भी अधिक हैं। भारत के नर से नारायण बनने के आहवान का भी यही रहस्य है कि देव बनो और देव संस्कृति के संवाहक प्रसारक और आराधक बनो। संकीर्णताओं का विनाश करो और अपने मानवत्व और देवत्व को विस्तार दो। भारत के ग्राम कभी इसी व्यवस्था के पोषक और प्रसारक हुआ करते थे। समय ने उन पर उपेक्षा की धूल चढ़ा दी और नगरीय व्यवस्था ने उनका रूप विकृत कर दिया, जबकि वर्तमान बाजारीकरण की व्यवस्था उन्हें खाई रही है। सचमुच ग्रामों की यह व्यवस्था दयनीय है।

मानव को मानव बनाने के लिए विश्व को एक परिवार मानना होगा। परिवार की उस उत्कृष्टभावना का विस्तार विश्व स्तर पर करना होगा, जिसके अंतर्गत घर का प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे के प्रति समर्पित रहता है और एक दूसरे के प्रति संवेदनाओं से भरा रहता है। हमारे ग्राम इसी परिवार व्यवस्था का एक बड़ा रूप होते थे, जहां सब एक दूसरे के सुख दुख में सम्मिलित होते थे और व्यक्ति को अकेलेपन की बीमारी से मरने नही देते थे। इसलिए नीरोग भारत स्वस्थ भारत का आदर्श कभी यहां यथार्थ रूप में काम करता था। उसी से निकलता था ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का मानव के नर से नारायण बनने का महासंकल्प। उसी से सृजित होती थी एक विश्व संस्कृति, मानवतावाद एवं विश्व शासन व्यवस्था (चक्रवर्ती सम्राट) का राष्ट्र संघ विकल्प नही है क्योंकि ‘ग्लोबल-विलेज’ की धारणा दोषपूर्ण है। ईकाई में दोष है तो दहाई का दोषपूर्ण होना तो स्वाभाविक है।

 

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