Categories
देश विदेश

युद्ध पर यूक्रेन के पक्ष को ही दिखाने पर क्यों आमादा है मीडिया ? रूस का पक्ष नदारद क्यों है?

 उमेश चतुर्वेदी

चूंकि पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशक तक तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों पर यूरोप के देशों का शासन रहा है। लंबे समय तक यूरोपीय देशों का शासन रहने की वजह से उनका असर ज्यादातर दुनिया पर रहना ही था।

पीड़ित के पक्ष में सहानुभूति होना सामान्य जीवन व्यवहार है। करूणा और दया भारतीय चिंतन और जीवन दर्शन के प्रमुख तत्व रहे हैं, इसलिए भारतीय संदर्भ में तो यह सोच और भी गहरी हो जाती है। तो क्या यही वजह है कि यूक्रेन पर रूस के हमले के संदर्भ में सिर्फ यूक्रेन का ही पक्ष लगातार सामने आ रहा है? भारत ही नहीं, तकरीबन समूचा वैश्विक मीडिया सिर्फ यूक्रेन की तबाही की कहानियों से भरा पड़ा है। यूक्रेन की सरकार और उसके राष्ट्रपति के विचारों को तवज्जो लगातार मिल रही है। इस पूरी प्रक्रिया में रूस का पक्ष तकरीबन नदारद है। शीत युद्ध के पहले तक दुनिया की दूसरी महाशक्ति रहे रूस का पक्ष वैश्विक और भारतीय मीडिया में यदा-कदा रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन की कार्यशैली को ही लेकर आ रहा है।

यह ठीक है कि रूस ने हमला किया है। पहली नजर में वह आक्रांता है, लिहाजा उसे लेकर क्षोभ और गुस्सा होना स्वाभाविक है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इतने दिनों तक उसने हमला क्यों नहीं किया और इस हमले के पीछे क्या वजहें हैं? इसकी भी जानकारी दुनिया के सामने आनी चाहिए। लेकिन रूस का यह पक्ष सिरे से नदारद है। इसकी एक मात्र वजह यह नहीं है कि रूस को लेकर दुनियाभर के मानवाधिकारवादी गुस्से में हैं, बल्कि इसकी एक बड़ी वजह सूचना का साम्राज्यवाद है। दुनिया में अब न तो उपनिवेश हैं और ना ही गुलामी। शासन और संप्रभुता के लिहाज से दुनिया के तमाम देश और समाज स्वाधीन हो चुके हैं। लेकिन वैचारिक और सोच के आधार पर दुनिया के ज्यादातर समाज उस दुनिया के गुलाम हैं, जिन्हें हम ज्यादा विकासित और आर्थिक रूप से समृद्ध मानते हैं।

अमेरिका और यूरोप के पश्चिमी हिस्से के देशों की ही सोच आज वैश्विक स्तर पर हावी है। चूंकि सूचना तंत्र पर उनका ही कब्जा है, इसलिए उनकी ही सोच के हिसाब से जानकारियां और सूचनाएं दुनिया के अग्रणी मीडिया तंत्र लगातार प्रसारित करते हैं, इसलिए पूरी दुनिया के पाठक, दर्शक और श्रोता उन्हीं सूचनाओं को लगातार पढ़ते, देखते और सुनते रहते हैं। चूंकि यह सतत प्रक्रिया है, इसलिए उसके प्रभाव से दुनियाभर के कथित और पढ़े-लिखे लोग अब पश्चिमी देशों के विचार के मुताबिक ही सोचने और विचारने लगे हैं।
चूंकि पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशक तक तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों पर यूरोप के देशों का शासन रहा है। लंबे समय तक यूरोपीय देशों का शासन रहने की वजह से उनका असर ज्यादातर दुनिया पर रहना ही था। बदलती वैश्विक व्यवस्था में जब यूरोपीय देशों को अपने उपनिवेशों को आजाद करना पड़ा। उन्होंने भूभागों को आजादी तो दे दी, लेकिन अपने उपनिवेशों के लोगों के मनोमस्तिष्क को गुलाम बनाए रखने के लिए सूचना तंत्र का सहारा लिया। इसे सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की संज्ञा दी गई। दिलचस्प यह है कि यह नाम भी एडवर्ड सईद जैसे पश्चिमी चिंतकों ने ही दिया।
पिछली सदी के नब्बे के दशक में जब उपग्रहीय संचार की क्रांति बढ़ी, मीडिया में बहुराष्ट्रीय मीडिया कारपोरेशनों का बोलबाला बढ़ा तो सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की सोच और ज्यादा पल्लवित हुई। मीडिया विशेषज्ञों ने अपने अध्ययनों में पाया कि अफ्रीका, एशिया, लातीनी अमेरिका के देशों के साथ तीसरी दुनिया कहे जाने वाले दूसरे देशों में टेलीविजन के दर्शकों को सुबह से शाम तक सिर्फ़ अमेरिकी और यूरोपीय सांस्कृतिक उत्पादों की खुराक परोसी जाने लगी। अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया कारपोरेशन ने इन देशों को अपने यहाँ बनाए गए टीवी सीरियल और दूसरे कार्यक्रम सस्ती कीमत पर भेजने लगे। 1991 में सोवियत साम्राज्यवाद के ढहने के बाद पश्चिमीकरण की यह सोच सिर्फ अमेरिकीकरण के रूप में विकसित होती गई। भारत समेत तमाम देशों के लोग ‘आह अमेरिका, वाह अमेरिका’ की सोच पर झूमने लगे। बहुराष्ट्रीय मीडिया कारपोरेशन अमेरिकी सोच और आर्थिकी को वैश्विक स्तर पर ना सिर्फ स्थापित करने में सफल होते गए, बल्कि उन्होंने तीसरी दुनिया की सोच को लगातार किनारे रखा। सोवियत संघ के पतन के बाद चूंकि रूस भी
इसी दुनिया का अंग बन गया था, लिहाजा उससे जुड़ी सूचनाएं भी बहुराष्ट्रीय मीडिया कारपोरेशनों की किनाराकसी का शिकार बनीं। सूचना के साम्राज्यवाद ने अमेरिकी और पश्चिमी देशों की सोच, आर्थिकी और
सामाजिक धारणा को बेहतर साबित करने के नजरिए से लगातार सूचनाएं प्रसारित कीं। यह क्रम आज भी जारी है। तीसरी दुनिया या गरीब मुल्कों की सफलता की कहानियां, समाज के बेहतरीन चेहरे इस सूचना क्रांति से लगातार गायब होते गए।
वैश्विक स्तर पर अमेरिकी और पश्चिमी सोच को चुनौती देने वाले पक्ष भी मीडिया के बहुराष्ट्रीयकरण के दौर में गायब होते गए। यह प्रक्रिया कितनी गंभीर है कि भारत के पाठक, दर्शक और श्रोता अपने पड़ोसी देश श्रीलंका, मालदीव और म्यांमार के बारे में नजदीक होने के बावजूद उतना नहीं जानते, जितना अमेरिका और यूरोप के बारे में जानते हैं। भारत के ज्यादातर पाठकों को पता भी नहीं है कि उनके नजदीक मंगोलिया नामक एक देश भी है। लेकिन वे अमेरिका की खूबसूरत कहानियों को खूब जानते हैं। ऐसा इसलिए हुआ है कि पश्चिमी वर्चस्व वाले मीडिया कारपोरेशनों ने सिर्फ पश्चिम का ही पक्ष दुनिया के सामने रखा है, उसकी ही संस्कृति को लगातार महान बताया है। उनकी आर्थिकी बेहतर तो खैर हो ही चुकी है, वहां के सामाजिक सिस्टम को भी बेहतर बताया है।
बहुराष्ट्रीय मीडिया कारपोरेशनों की इसी सोच का नतीजा है कि रूस का पक्ष दुनियाभर के मीडिया से सिरे से गायब है। रूस की भी अपनी कुछ कहानियां होंगी, अच्छे या बुरे कुछ पक्ष होंगे। उन्हें भी दुनिया को जानने का हक है और उसके बाद अपनी राय बनाने का हक है। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। चाहे लीबिया में विद्रोह और अमेरिकी कार्रवाई हो या फिर इराक में अमेरिका की अगुआई में हुए हमले, उन दिनों भी ज्यादातर अमेरिकी और पश्चिमी देशों के ही पक्ष आ रहे थे। जबकि इराक या लीबिया का पक्ष नहीं आ पाता था। कुछ वैसा ही रूस के साथ इन दिनों हो रहा है।

सूचना के साम्राज्यवाद को गुट निरपेक्ष आंदोलन ने भी समझा था। इसलिए गुटनिरपेक्ष देशों ने अपना एक अलग संचार पूल बनाया था। 2009 में जब दुनिया की पांच उभरती अर्थव्यवस्थाओं- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने ब्रिक्स नाम से संगठन बनाया तो उसमें भी अपना न्यूज पूल बनाने की बात हुई थी। जिसकी जिम्मेदारी चीन की न्यूज एजेंसी सिन्हुआ को निभानी थी। चूंकि इन देशों के अपने-अपने राष्ट्रीय हित कुछ ज्यादा ही टकराते रहे, इसलिए ब्रिक्स की अवधारणा जी-20 जैसे संगठनों की तरह मजबूत नहीं बन पाई। ऐसे में उसका अपना न्यूज पूल भला कैसे बन पाता।
मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में सूचना के साम्राज्यवाद का असर रूस के संदर्भ में गहराई से देखा-समझा जा सकता है। वैसे रूस अकेला ऐसा राष्ट्र नहीं है, जहां की सूचनाएं लगातार गायब हैं। ऐसे मौकों पर पश्चिमी सोच को चुनौती देने वाले हर देश की सूचनाएं गायब हो जाती हैं। पश्चिम के विरोधी राजनेताओं को सिरफिरा, पागल, दकियानुसी आदि-आदि बताया जाने लगता है। सूचना तंत्र में पश्चिम विरोधी राजनेताओं के स्याह पक्ष खुलकर आने लगते हैं। इराक, लीबिया आदि इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। इसके बाद पूरी दुनिया में अमेरिका और पश्चिम विरोधी राजनेता और तंत्र वैश्विक खलनायक के तौर पर उभरने लगते हैं।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
kolaybet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
holiganbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
perabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet güncel giriş
onwin güncel giriş
betpark
sahabet güncel giriş
sahabet güncel giriş
betpark
sahabet güncel giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
sahabet giriş