ओ३म् “यज्ञ एवं योग मनुष्य जीवन के आवश्यक कर्तव्य होने सहित मोक्ष तक ले जाने में सहायक हैं”

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महर्षि दयानन्द जी ने वेदानुयायी आर्यों के पांच नित्यकर्म बताते हुए उसमें प्रथम व द्वितीय स्थान पर सन्ध्या एवं देवयज्ञ अग्निहोत्र को स्थान दिया है। प्राचीन ग्रन्थ मनुस्मृति में द्विजों को पंचमहायज्ञों को करने की अनिवार्यता का उल्लेख मिलता है। देवयज्ञ अग्निहोत्र एक ऐसा नित्य-कर्म है जिसका प्रतिदिन किया जाना गृहस्थ मनुष्य का कर्तव्य है। यज्ञ को अग्निहोत्र व हवन आदि नामों से भी जाना जाता है और इसकी विशेषता यह है कि यह अल्प समय साध्य है तथा इसे नित्य करने से इससे गृहस्थ एवं आसपास के लोगों को स्वास्थ्य आदि की उन्नति का लाभ होता है। यज्ञ से वायु एवं वृष्टि जल भी शुद्ध व पवित्र होता है। अग्निहोत्र में योग के आवश्यक अंग ईश्वर स्तुति, प्रार्थना व उपासना को भी स्थान दिया गया है। यद्यपि ऋषि दयानन्द जी ने दैनिक यज्ञ की जो विधि पंचमहायज्ञ विधि और संस्कारविधि पुस्तकों में दी हैं, वहां सम्भवतः दैनिक यज्ञ को अल्पकाल में सम्पन्न करने की दृष्टि से स्तुति-प्रार्थना-उपासना के आठ मंत्रों को स्थान नहीं दिया है तथापि आजकल जहां जो भी आर्य परिवार वा वैदिक धर्मी यज्ञ करता है, वह इन आठ मंत्रों का अवश्य ही उच्चारण व गान करते हैं। अधिकांश यज्ञकर्ताओं को इन मंत्रों के अर्थ भी ज्ञात होते हैं। ऋषि ने इन मंत्रों के हिन्दी अर्थ बोलने व सुनाने का निर्देश भी किया है। इन यज्ञों से ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना होने के साथ यज्ञ में जिन मंत्रों से आचमन, अग्न्याधान, समिधादान, पंचघृताहुति, जल सिचन आदि क्रियायें एवं अन्य आहुतियों सहित दैनिक यज्ञ के मंत्रों से आहुतियां दी जाती हैं, उनसे भी ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना सम्पन्न होती है। इससे योग की अनिवार्य शर्त ईश्वर की निकटता व उसकी प्राप्ति में सहायता मिलती है। ऋषि दयानन्द ने ईश्वर भक्ति अर्थात् ईश्वर की उपासना का फल बताते हुए कहा है कि इससे मनुष्य के गुण-कर्म-स्वभाव सुधरते हैं, ईश्वर की निकटता प्राप्त होती है और मनुष्य की आत्मा का बल इतना बढ़ता है कि पहाड़ के समान दुःख प्राप्त होने पर भी घबराता नहीं है। हमारा यह भी अनुमान है कि शारीरिक दुःख व क्लेशों में जितना कष्ट नास्तिक व सही रीति से ईश्वरोपासना न करने वालों को अनुभव होता है, ईश्वर की उपासना करने वालों को उससे कम प्रतीत होना अनुभव होता है। इससे प्रतीत होता है कि ईश्वर की भक्ति करने से मनुष्य की दुःखों को सहन करने की शक्ति में वृद्धि होती है।

मनुष्य के जीवन का उद्देश्य ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति के सत्य स्वरूप को जानना और ईश्वर की भक्ति व उपासना कर उसे प्राप्त करना है। ईश्वर ने जीवात्माओं के सुख भोग व विवेक प्राप्ति के लिए ही यह समस्त संसार बनाया है। इस समस्त संसार को बनाकर ईश्वर ने जीवों के लिए पृथिवी पर अग्नि, वायु, जल व अन्नादि अनेक उत्तमोत्तम पदार्थ बनाये हैं। परमात्मा ने जीवों के कर्म के अनुसार उन्हें मनुष्यादि शरीर सहित माता-पिता-भगिनी-बन्धु आदि अनेक संबंधी, परिवारजन व इष्ट-मित्र भी दिये हैं। परमात्मा ने मनुष्यों के कल्याण के लिए सृष्टि की आदि में मनुष्यों को वेदों का ज्ञान भी दिया है जिससे इस सृष्टि के रहस्यों को जानने व समझने की योग्यता उत्पन्न होती है और साथ ही मनुष्य ईश्वर, जीव व प्रकृति को यथार्थ रूप में जान सकते हैं। इस कारण प्रत्येक मनुष्य ईश्वर का ऋणी हैं। इस ऋण से उऋण होना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है। इसी के लिए वेद व ऋषियों ने सन्ध्या अर्थात् सम्यक ध्यान=योग का विधान किया है। इसमें ईश्वर का उसके द्वारा किये गये उपकारों के लिए धन्यवाद करना मनुष्य का मुख्य कर्तव्य होता है। समस्त सन्ध्या योगानुष्ठान ही है। सन्ध्या में आचमन मंत्र में ईश्वर में सन्ध्या का उद्देश्य मनोवांछित आनन्द अर्थात् ऐहिक सुख-समृद्धि और पूर्णानन्द अर्थात् मोक्षानन्द की प्राप्ति को बताया गया है। सन्ध्या की समाप्ति पर नमस्कार मंत्र से पूर्व समर्पण मन्त्र में भी ईश्वर से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति की कामना व प्रार्थना है। हम जानते हैं कि हम ईश्वर से जो भी प्रार्थना करें, उसकी पूर्ति के लिए हमें उसके अनुकूल कर्म व प्रयत्न भी करने होते हैं। ऐसा करने पर ईश्वर हमारी प्रार्थनाओं को पूरा करता है। अतः सन्ध्या करने से ईश्वर की निकटता व मनुष्य के गुण, कर्म व स्वभाव में सुधार होने के साथ ईश्वर का सहाय प्राप्त होता है।

सन्ध्या व योग का एक मुख्य अंग स्वाध्याय है। स्वाध्याय वेद एवं वैदिक साहित्य के अध्ययन, उसके चिन्तन व मनन सहित उसके अनुरूप आचरण को कहते हैं। स्वाध्याय से ईश्वर सहित अन्य विषयों के ज्ञान में भी वृद्धि होती है। स्वाध्याय भी एक प्रकार का योग व ईश्वर की उपासना ही है। ईश्वर का सत्यस्वरूप स्वाध्याय व वैदिक विद्वानों के उपदेश आदि से ही जाना जाता है। अतः स्वाध्याय भी हमें ईश्वर के निकट ले जाने व ईश्वर को जानने में सहायक होने से योग ही है। सन्ध्या को जान लेने व उसका नित्य प्रति सेवन करने के बाद ईश्वर के गुणों का निरन्तर ध्यान व धन्यवाद करना तथा स्वाध्याय किये गये विषयों के अनुरूप आचरण करना भी अनिवार्य रहता है। उसे करके हम निश्चय ही योग को सिद्ध कर सकते हैं। ऋषि दयानन्द समाधि को सिद्ध किये हुए योगी थे। उन्होंने उसी योग को सन्ध्या के माध्यम से प्रस्तुत किया है। इससे यह भी अनुमान होता है कि समाधि सिद्ध योगी होकर भी ऋषि दयानन्द इसी विधि से सन्ध्या वा ईश्वर का ध्यान आदि करते थे। यदि इससे अधिक व अन्य कुछ करते तो उसे भी वह पुस्तक रूप में अवश्य लिखते। अतः सन्ध्या ही वास्तविक योग है। सन्ध्या करके हम निश्चय ही योग करते हैं व निरन्तर अभ्यास कर व उसे बढ़ाते हुए समाधि प्राप्त कर ईश्वर का साक्षात्कार भी कर सकते हैं। हमारे जो संन्यासी और विद्वान हैं, वह सभी सन्ध्या के माध्यम से ही योग अर्थात् ईश्वर प्राप्ति के साधन व प्रयत्न करते हैं। सन्ध्या में भी यम, नियमों सहित योगासनों का अभ्यास, प्राणायाम आदि करना आवश्यक है।

यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है। यज्ञ में अग्निहोत्र सहित हमें परोपकार के सभी प्रकार के कर्म करने के साथ जीवन को सत्य व सादगी के अनुसार व्यतीत करना आवश्यक है। वेद ने सभी मनुष्यों के लिए भोगों का भोग त्यागपूर्वक करने की आज्ञा की है। दूसरों का दुःख दूर करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहना भी योगी के लिए आवश्यक है। योगेश्वर कृष्ण और ऋषि दयानन्द के जीवन में हमें यह दोनों महापुरुष समाज व देश के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करते हुए दिखाई देते हैं। हमारे सभी प्राचीन ऋषि योगी थे और वह वनों में रहकर निरन्तर यज्ञादि कर्म करते रहते थे। योगी के लिए यज्ञ व अग्निहोत्र का विधान तो श्रुति ग्रन्थों में है, यज्ञ के त्याग का विधान वैदिक शास्त्र में कहीं नहीं है। हमारा यह भी अनुमान है कि यज्ञ करते हुए मनुष्य यदि योगाभ्यास करता है तो वह इससे शीघ्र सफल मनोरथ हो सकता है। आर्यसमाज व वैदिक धर्म से इतर मनुष्यजन भी योगाभ्यास करते हैं परन्तु बिना वेदों के स्वाध्याय और सन्ध्या-यज्ञानुष्ठान भली प्रकार से न करने से उन्हें योग में ईश्वर साक्षात्कार की सिद्धि यज्ञ करने वाले साधको की तुलना में किंचित विलम्ब से मिलती है, ऐसा अनुमान होता है। यज्ञ करने से मनुष्य के पास शुभ कर्मों की एक बड़ी पूंजी संग्रहीत हो जाती है। यज्ञ से जितने अधिक प्राणियों को शुद्ध प्राणवायु व वर्षा जल की शुद्धि से ओषिधियों की शुद्धि व उनके प्रभाव में वृद्धि होती है, उससे उस यज्ञानुष्ठान करने वाली योगी व उपासक की कर्म-पूंजी इतर सभी योगाभ्यासियों से अधिक होने के कारण उसे शीघ्र योग के लाभों की प्राप्ति का होना निश्चित होता है। यज्ञ व अग्निहोत्र करना ईश्वर की आज्ञा भी है। अतः जो यज्ञ नहीं रकते वह ईश्वर की अवज्ञा करते हैं। यज्ञ योग, उपासना व ईश्वर की प्राप्ति में अत्यन्त सहायक एवं उपयोगी कर्म है। सभी योगाभ्यासियों को यज्ञ पर विशेष ध्यान देना चाहिये और दैनिक यज्ञ तो अवश्य ही करना चाहिये, ऐसा हम अनुभव करते हैं।

यज्ञ वह अनुष्ठान वह प्रक्रिया है जिससे हम अपना वह सहस्रों लोगों को शुद्ध प्राण वायु व वर्षा जल सहित आरोग्य फैलाकर उन्हें लाभ पहुंचाते हैं। योगाभ्यास करके हम अपनी आत्मा को ही ईश्वर से मिलाने का प्रयत्न करते हैं। योग व यज्ञ दोनों के लक्ष्य में इस दृष्टि से समानता है कि दोनों में ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना होती है। विचार करने पर यह भी ज्ञात होता है कि यदि यज्ञ व योग दोनों का सहारा आध्यात्मिक व्यक्ति लेता है तो वह अपने लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त कर सकता है। यदि व्यक्ति योगाभ्यास ही करे और यज्ञ की उपेक्षा करे तो उसे अपने लक्ष्य प्राप्ति में अधिक समय लग सकता है। गृहस्थ जीवन में यज्ञ करना एकाकी जीवन जीने वाले मनुष्य की तुलना में कुछ सरल लगता है। यज्ञ में अनेक परिवारजनों की सहायता प्राप्त होने से यज्ञ आसानी से होता है जबकि एकाकी जीवन जीनें वाले मनुष्य को यज्ञ करने में कुछ अधिक पुरुषार्थ करना पड़ता है। यज्ञ के साधन एकत्रित करने में भी उसे मृहस्थ व्यक्ति से अधिक पुरुषार्थ करना पड़ सकता है। महर्षि दयानन्द ने योग को सन्ध्या में ही सम्मिलित कर लिया है। महर्षि दयानन्द स्वयं एक उच्च कोटि के योगी थे। वह कई कई घण्टों की समाधियां लगाते थे। रात्रि जब सब सो जाते थे तब भी वह समाधि अवस्था में रहते थे। इससे अनुमान है कि उन्होंने ईश्वर का साक्षात्कार किया था। अतः उनका लिखा व कहा एक-एक शब्द योग व यज्ञ विषय में प्रमाण है। इस आधार पर उनसे प्राप्त सन्ध्योपासना व यज्ञ की विधियां उनकी मनुष्यजाति को अनुपम देन हैं। यह सन्ध्या विधि व उनके वेदभाष्य का स्वाध्याय मनुष्य को योग में प्रवृत्त कर उसे समाधि तक ले जाते हैं। सन्ध्या में प्रार्थना करते हुए उपासक कहता है कि मुझे मोक्ष व अन्य धर्म, अर्थ व काम की प्राप्ति सद्यः अर्थात् शीघ्र वा आज ही हो। यह बात विशेष महत्व रखती है। यही योग का लक्ष्य भी है। यज्ञ में स्विष्टकृदाहुति में भी सभी कामनाओं को पूर्ण करने की प्रार्थना की गई है। यह महत्वपूर्ण है कि महर्षि दयानन्द ने योग को सामान्यजनों के लिए सरल बनाया है। योगदर्शन का अध्ययन सन्ध्या करने वाले उपासक को लाभ पहुंचाता है। इससे योगाभ्यासी को साधना के अनेक पक्षों व उपायों का महत्व ज्ञात होता है। सन्ध्या को निरन्तर करने से मनुष्य समाधि की ओर अग्रसर होता है। ईश्वर प्राप्ति का मार्ग भी यही है। अतः यज्ञ एवं योग ईश्वर प्राप्ति के साधन हैं। दोनों परस्पर पूरक हैं और जीवन के अत्यावश्यक कर्म वा कर्तव्य हैं। इन्हें करने से ही मनुष्य का जीवन सार्थक व सफल होता है। इति ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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