”मत भूल मोदी मैं सूर्यपुत्री तापी हूं . . . . . .! ”

tapiरामकिशोर पंवार ”रोंढावाला”

आदिकाल से लेकर अंत तक भारत एवं भारतीय संस्कृति में नदी -नारी दोनो को ही जीवन दयानी के रूप के रूप मूें पूजा जाता रहेगा।  जहां एक ओर नारी जन्म देती है तो वही दुसरी ओर नदी मोक्ष प्रदान करती है।  एक सच तो यह भी है कि प्राचिन इतिहास की अनेक सभ्यताओं का विकास और विनाश नदियों के किनारे हुआ है । इतिहास के पन्नो में छपी कहानियां एवं उन सभ्याताओं के अवशेष बताते है कि अभी तक की प्रमाणित तथ्य एवं प्रमाण बताते है कि किसी भी सभ्य समाज एवं संस्कृति के विकास और विनाश के पीछे नदी – नारी का मान – सम्मान जुड़ा रहा है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि किसी नदी या नारी के मान – सम्मान को जब – जब ठेस पहुंची है तब – तब नया इतिहास लिख गया है। आम तौर पर नदी और नारी के बीच एक बात सामन्य रूप से देखी जाती है कि इनका जब भी मान – सम्मान क्रोधी एवं जिद में बदल जाता है कोई न कोई अप्रिय घटना जन्म लेती है। त्रेतायुग में राजा राम के चरित्र पर आधारित महाकाव्य एवं पवित्र ग्रंथ रामायण में माता सीता और बहन सूर्पनाखा के क्रोध ने ही रावण के अंत की कहानी लिखी। रावण को पता था कि अष्टक ऋषि के श्राप से श्री हरि विष्णु के द्वारपाल जय एवं विजय को असूर योनी में जन्म लेना पड़ा। असूर योनी से मुक्ति दिलाने के लिए स्वंय नारायण स्वंय नर रूप में आ चुके है इसलिए अपनी पूरी असूर जाति को मोक्ष की प्राप्ति दिलाने के लिए उसने ही ऐसा कूटरचित चक्रव्यूह तैयार किया जिसके चक्रजाल में सूर्पनाखा फंस गई और वह अपना अनादर कर बैठी। असूर जाति में अहंकारी स्वभाव को जानने वाले रावण ने ही सूर्पनाखा को मोहरा बना कर राम – रावण युद्ध के बहाने अपने पूरे कुल का उद्धार कर लिया। दुसरी घटना भी नारी से जुड़ी थी यहां पर भी भाई के रूप में बहन को माध्यम बना कर नारायण के द्वारपाल जय विजय कंस के रूप में एक नई महाभारत के रचियता बने। कंस को भी मालूम था कि नर रूप में नारायण आ गए है इसलिए उसने अपनी बहन की संतानो का वध किया। बहन देवकी के ऊपर की गई यातनाए भी कंस के विनाश का कारण बनी। द्वापर युग के इस दौर में एक अन्य घटना भी घटित हुई जो द्रौपदी के अपमान से जुड़ी थी। भरी सभा में जुआ में दांव पर रखी द्रोपदी हार के बाद जब चीर हरण की शिकार बनी तब उसकी शपथ ने ही पूरी कौरव सेना एवं दुर्योधन के संगी – साथियों की मौत की गाथा लिख डाली। ऐसा एक बार नहीं कई बार हुआ जब नारी के अपमान को पहुंची ठेस ने पूरी कायनात बदल डाली। वैदिक सनातन धर्म में नदियों को कन्या, देवी, जननी, जीवन दायनी मां के रूप में पूजा जाता रहा है लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जब – जब नदियों के मान – सम्मान कोइेस पहुंची है उसने अपनी दशा और दिशा दोनो को बदल कर भूगोल ही बदल डाला।

महाभारत के आदिपर्व में कुरूवंश के बारे में पढऩे को मिलता है। कुरू वंश के संस्थापक राजा कुरू के पौत्र शान्तनु संग भागीरथी गंगा का विवाह हुआ था। भीष्म पितामह की कोई संतान न होने के कारण गंगा का पूरा वंश इतिहास के पन्नो से किसी युग की तरह समाप्त हो गया है। आज जहां एक ओर भागीरथी गंगा को लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उसकी पूरी केबिनेट गंगा नमों की तर्ज पर गंगामय हो गया है वही दुसरी ओर मध्यप्रदेश में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उसकी पूरी केबिनेट नमो नर्मदा के कारण नर्मदामय हो गया है। सवाल यह उठता है कि क्या देश में गंगा और नर्मदा ही दो पवित्र नदियां है जिस पर करोड़ो – अरबो रूपैया पानी की तरह बहाया जा रहा है। एक जानकारी के अनुसार पूरे देश 31 राज्य एवं 5 केन्द्र शासित प्रदेश है। इन सभी 36 राज्यों में औसतन 10 से 15 पवित्र नदियां होगी जो कुल योग में लगभग 450 होगी। यदि हम हिमाचल को छोड़ दे तो हर राज्य प्रदुषित पवित्र नदियों की संख्या एक एक दर्जन से कम नहीं होगी लेकिन यदि पूरी राज्य सरकार या केन्द्र सरकार सिर्फ एक ही नदी पर पूरा सरकारी खजाना लूटाने लगे तो अन्य नदियों का क्या होगा…? देश -प्रदेश की ऐसी नदियां जिसको लेकर विकास प्राधिकरण, घाटी परियोजना, मंत्रालय , बोर्ड तथा आयोग काम कर रहे है वही दुसरी ओर प्रदेश – देश की अन्य सैकड़ो नदियों के प्रति उपेक्षा का भाव देश में एक बार फिर नदियों के संग भेदभाव एवं उनके मान -सम्मान को ठेस पहुंचाने की सोची समझी साजिश है जो किसी दिन भयावह संकट को जन्म दे सकती है। हिन्दू ग्रंथो एवं पुराणो में कहा गया है कि गंगा में स्नान का , यमुना जल के आजमन का और मां नर्मदा के दर्शन का जो पुण्य प्राप्त होता हैउसके समान पुण्य मात्र पुण्य सलिला कुरूवंश की जननी मां सूर्यपुत्री ताप्ती के नाम मात्र से प्राप्त होता है। आज गंगा करोड़ो अरबो रूपैया पानी की तरह बहाने के बाद भी मैली है क्योकि गंगा आज बोझ से दबी है। पूर्वजो को मोक्ष दिलाने के चक्कर में पूरे देश ने गंगा को अस्थियों का दलदल बना दिया है। जिसके चलते स्वंय गंगा गंगा अष्टमी को नर्मदा मैया के पास आकर अपने आप को बोझ मुक्त और मैल मुक्त करती है।

कहना नहीं चाहिए लेकिन कड़वा सच है कि आज इस देश की बौद्धिक सोच भी गंगा और नर्मदामय हो गई है। गंगा किनारे वाला छोरा अमिताभ हो या पनवाड़ी सब अपने आप को ऐसे प्रस्तुत करते है जैसे उन्होने करोड़ो वर्ष तपस्या करके गंगा के किनारे जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त किया है। आज यही कारण है कि किसी ने इन दोनो (गंगा और नर्मदा) से श्रेष्ठ उस पुण्य सलिला मां सूर्यपुत्री ताप्ती के बारे में जानने का प्रयास नहीं किया जो भागीरथी गंगा की रिश्ते में सास लगती है। जिस वंश में गंगा का विवाह हुआ उस वंश की जननी मां सूर्यपुत्री ताप्ती है। सदियों से गंगा और नर्मदा का प्रभाव कम न पड़ जाए इस सोच ने उस ताप्ती की उपेक्षा की है जो न्याय के देवता शनि महाराज की सगी छोटी बहन है। भगवान सूर्य ने भी ताप्ती को पुत्री के रूप में पाने के लिए तप किया था। पुण्य सलिला मां सूर्यपुत्री ताप्ती का जप – तप आज किसी परिचय को भले ही मोहताज हो लेकिन इतिहास के पन्नो से पहले हमे ग्रंथो एवं पुराणो तथा वेदो में लिखी कथाओं को पढऩे की जरूरत है जिसमें कहा गया है कि सूर्यपुत्री ताप्ती के किनारे अनेको ऋषियों एवं तपस्वियों ने तप – तप करके बाबा भोलेनाथ को प्रसन्न किया। गंगा और नर्मदा के किनारे दो या तीन ज्योतिलिंग मिलेगें लेकिन पूरे बारह द्धादश ज्योर्तिलिंग केवल सूर्यपुत्री ताप्ती के किनारे बैतूल जिले के शिवधाम बारहलिंग में मौजूद है। इनके बारे में कहा जाता है कि यहां पर भगवान श्री राम ने असूरो से लडऩे के लिए अपने वंश में जन्मी अराध्य मां सूर्यपुत्री ताप्ती को प्रसन्न कर उसके तटपर तपेश्वर नामक बारहलिंगो की सरंचना विश्वकर्मा जी की मदद से की थी। पुण्य सलिला मां सूर्य पुत्री ताप्ती के तेज और वेग के सामने देश की अन्य नदिया बौनी साबित होती है क्योकि ताप्ती देश की एक मात्र ऐसी नदी है जो मैदान से निकली है और पश्चिम दिशा में बहती हुई दर्जनो पहाडिय़ों को चीर कर अपने लिए रास्ता बनाती हुई सूरत में जा मिलती है। वैसा प्रमाणिक इतिहास आज भी ताप्ती के किनारे बसे लोगो की जुबां पर मौजूद है कि पुण्य सलिला मां सूर्यपुत्री ताप्ती ने जब भी अपना तेज और वेग को प्रदर्शित किया है तब – तब महाराष्ट्र के भुसावल का भूसा निकला है और गुजरात का सूरत बदसूरत हुआ है। प्रमाणिक साक्ष्य चीख – चीख कर कहते है कि मध्यप्रदेश के तीन बार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ताप्ती के नाम से इतने भयभीत है कि उसका नाम प्रदेश गान में जोडऩे तक की घोषणाओं को मूर्त रूप नहीं दे पा रहे है। सिक्के का एक पहलू यह है कि पुण्य सलिला सूर्यपुत्री ताप्ती के नाम मात्र से लोग तर जाते है यहां पर तीन दिन में विसर्जित अस्थियां पंचतत्व में लीन हो जाती है। सिक्के का दुसरा पहलू यह है कि जिसके नाम मात्र से लोग तर जाते है उसी ताप्ती नाम पर पूरे देश – दुनिया में आज तक कोई सरकारी उपक्रम नहीं है जो गंगा या नर्मदा के समान हो। तीन राज्यों (मध्यप्रदेश – महाराष्ट्र – गुजरात ) की जीवन दायनी पुण्य सलिला ताप  हरिणी, पाप नाशिनी , मोक्ष दायनी मां सूर्यपुत्री ताप्ती को लेकर इस समय शासन – प्रशासन द्वारा की जा रही उपेक्षाओं एवं वादा खिलाफियों का रिकार्ड बन चुका है। बात चाहे ताप्ती नाम प्रदेश गान में शामिल करने की हो या फिर ताप्ती पर बनने वाले 250 बैराजो की जो मुख्यमंत्री के चुनावी वादो में नहीं बल्कि विधानसभा एवं जन सभाओं में की गई घोषणाओं के वे प्रमाणिक दस्तावेज है। आज एक वजह यह भी है कि ताप्ती पर बैराजो के निमार्ण न होने की पीड़ा ग्रीष्म काल में जितनी ताप्ती भक्तो को होती है उससे कई गुणा अधिक पूरे साल मां पुण्य सलिला ताप्ती को होती है क्योकि वादो एवं वादा खिलाफी से उसके मान – सम्मान को ठेस पहुंचाती है। मध्यप्रदेश के महाराष्ट्र से लगे बैतूल जिले के मुलताई (मुलतापी) से लेकर गुजरात के सूरत तक 750 किलो मीटर क्षेत्र में बहने वाली ताप्ती का सर्वाधिक प्रवाह एवं बहाव क्षेत्र बैतूल जिले में आता है। जिले में कुल 250 किमी बहने वाली ताप्ती ने बड़े – बड़े पहाड़ो को चीर कर अपने लिए दुर्गम रास्ता बनाया है। ताप्तीचंल की दुर्गम पहाडिय़ों एवं सैकड़ो मीटर गहरे डोह (कुआं आकर के गडडे् जिसमें दो खटिया की रस्सी डालने के बाद उसकी गहराई का पता नहीं लगता है बने हुए है) जिनकी संख्या एक दर्जन से अधिक होगी और जो पूरे बैतूल जिले को पेयजल आपूर्ति करने में सक्ष्म है। महाराष्ट्र भूसावल के केले की पहचान हो या सूरत के हीरे की नक्काशी की शान सबको कहीं न कहीं ताप्ती का तेज लगा हुआ है। पूरे देश में गंगा और मध्यप्रदेश में नर्मदा को लेकर सैकड़ो एनजीओं, संगठन , सरकार विभाग अरबो – खरबो रूपैया पानी की तरह बहा चुके है लेकिन किसी ने भी ताप्ती के जल को सहेजने के लिए रत्ती भर काम नहीं किया है। आज बैतूल जिले में सबसे अधिक 250 किलोमीटर क्षेत्र का पहाड़ी सीना चीर कर बहने वाली ताप्ती का जल इस क्षेत्र की तकदीर एवं तस्वीर को बदल सकता है लेकिन ताप्ती के नाम पर लोगो को करोड़ो रूपैया लोगो को खाने को नहीं मिल सकता। ताप्ती के बारे में कहा जाता है कि यहां पर जितना पैसा उतना काम यदि ताप्ती काम में रत्ती भर भी बेइमानी हुई तो फिर उस पर करवाये गए कार्यो का नामो निशां तक मिटा जाता है। बैतूल जिले का चन्दोरा बांध जब फूटा था तब कुछ ऐसी ही कहानी सामने आई थी। गुजरात के महानगरो में से एक सूरत के लोगो का यह मानना है कि चार साल में एक बार तापी मैया (ताप्ती) सूरत के घर – घर तक पहुंचती है। लोगो की धार्मिक आस्था है कि मां के पांव पखारने (पांव पूजा) के लिए उन्हे चार साल तक इंतजार करना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि चार साल में एक बार सूरत जलमग्र हो जाता है। सूरत से अलग कहानी है महाराष्ट्र के भूसावल की जहां पर ताप्ती मैया ने पूरे खान देश को आर्थिक रूप से सम्पन्न बनाने के साथ – साथ वह उसके विनाश की इबादत भी लिखना नहीं भूलती है। मुगल शासक शाहजांह की मुमताज को शांती प्रदान करने वाला किनारा भी ताप्ती का था जहां पर अनेक प्रचलित कथाओं एवं किवदंतियों को सुनाते लोग बताते है कि पुण्य सलिला सूर्यपुत्री ताप्ती आज प्रदुषित हुई है तो उसके पीछे बुरहानपुर शहर की गंदगी है। बैतूल से स्वच्छ जल लेकर निकली ताप्ती इस शहर तक इतनी प्रदुषित हो जाती है कि इसका पानी आजमन के लायक भी नहीं रह पाता है। हालांकि ताप्ती के पानी के जल भंवरे और जल लहरे प्रदुषित पानी को साफ करते है लेकिन प्राकृतिक प्रयास पर्याप्त नहीं है। प्रदेश सरकार की केबिनेट मंत्री श्रीमति अर्चना रमेश चिटनीस ने भी ताप्ती को लेकर कोई सार्थक पहल को अंजाम नहीं दिया है जो गंगा और नर्मदा के समान हो। उपेक्षा का भाव ली तापी नमो मोदी और नमो शिवराज की ओर अपना उग्र रूप लेकर आ गई तो बुरहानपुर का बुरा, महाराष्ट्र के भूसावल का भूसा, गुजरात के सूरत को बदसूरत बनाने से कोई नहीं रोक सकता। काश आज पुण्य सलिला मां सूर्यपुत्री ताप्ती नमो मोदी और नमो शिवराज को कह पाती कि मैं सूर्यवंशी तापी न्याय के देवता शनिदेव की छोटी बहन अपनी मर्यादा को भूल गई तो जहां एक ओर अपने पिता के तेज से निकले अपने तेज से प्रदेश और देश का सब कुछ जला कर राख कर दूंगी और वही अपने जल वेग  से सब कुछ जलमग्र कर दूंगी तो फिर कैसे कह पाओगें नमो: नमो:!

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