“अथर्ववेद भाष्यकार ऋषि दयानन्द भक्त पं. क्षेमकरण दास त्रिवेदी”

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ओ३म्

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अथर्ववेद भाष्यकार पं. क्षेमकरण दास त्रिवेदी जी से समस्त आर्यजगत परिचित है। उनका वेदभाष्य विगत एक शताब्दी से वैदिक धर्मियों द्वारा श्रद्धा से पढ़ा जा रहा है। पं. क्षेमकरण दास त्रिवेदी ऐसे विद्वान हैं जो ऋषि दयानन्द के समकालीन रहे और जिन्होंने आर्य विद्वान पं. जयदेव शर्मा, पं. विश्वनाथ वेदोपाध्याय विद्यामार्तण्ड तथा पं. हरिशरण सिद्धान्तालंकार आदि से पूर्व अथर्ववेद भाष्य का कार्य सम्पन्न कर परवर्ती विद्वानों का अथर्ववेद भाष्य लेखन का मार्ग प्रशस्त किया। पं. क्षे़मकरण दास जी ने मुरादाबाद में ऋषि दयानन्द जी के दर्शन किये थे और उनके उपदेशों को भी सुना था। उन्होंने ऋषि दयानन्द के दर्शन और उनके सत्संगों का वर्णन स्वयं अपनी लेखनी से किया है। उनके द्वारा लिखित प्रसंग को ही हम आंशिक रूप से इस लेख में प्रस्तुत कर रहे हैं।

पंडित क्षेमकरण दास त्रिवेदी लिखते हैं कि संवत् 1933 (सन् 1877) में महर्षि श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती मुरादाबाद पधारे। उन्होंने राजा जयकृष्णदास जी सी.आई.ई. की कोठी पर उतर कर लगातार पांच-छह दिन तक सायंकाल वैदिक धर्म पर व्याख्यान दिये। वे बैठकर व्याख्यान देते थे और अन्य वेद मन्त्रों के साथ-

ओ३म् शन्नो मित्रः शं वरुणः शन्नो भवत्वर्य्यमा।
शन्न इन्द्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः।।
नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ऋतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तारम्। ओ३म् शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः।

सत्यार्थ प्रकाश का आदि मन्त्र व्याख्यान के आरम्भ में और-

ओ३म् शन्नो मित्रः शं वरुणः शन्नो भवत्वर्य्यमा।
शन्न इन्द्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः।।
नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिषम्। ऋतं वदिषम्। सत्यं वदिषम्। तन्मामावीत्। तद्वक्तारमावीत्। आवीन्माम्। आवीद्वक्तारम्। ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

सत्यार्थप्रकाश के अन्त का मंत्र व्याख्यान के अन्त में स्पष्ट शब्दों में ऊंचे मधुर स्वर से बोलते थे और व्याख्यान भी बहुत शुद्ध सरल और मधुर शब्दों में देते थे जिसको श्रोता लोग एकचित्त होकर सुनते थे। कैसी ही बातचीत वा कोलाहल हो उनके बोलते ही सब एक साथ बन्द हो जाता था और शान्ति फैल जाती थी। व्याख्यान की समाप्ति पर वे लोगों की शंकाओं का समाधान करते थे। कुछ लोग रात्रि में दस ग्यारह बजे तक उनसे सत्संग करते थे। मैं भी नंगे पैरों श्रद्धा और भक्ति से दोनों समय व्याख्यान और सत्संग में जाता था और प्रातःकाल जब वे दण्डा लेकर नगर से बाहिर भ्रमण करते थे, मैं भी जाकर मार्ग में उनके दर्शन करता और ‘‘आनन्दित रहो” यह आशीर्वाद लेता। स्वामी जी का शरीर विशाल, पुष्ट, गेहुंआ रंग था। उनकी बोलचाल में बुद्धिमत्ता, गम्भीरता, वीरता, निष्पक्षता और परोपकारिता साक्षात् दीखती थी। उनका दण्डा लेकर भ्रमण करना मेरी आंखों के सामने घूमा करता है।

उन्हीं दिनों, मैं और मुन्शी कालिका प्रसाद दो कायस्थों (पंडितजी सक्सेना उपनाम के कायस्थ थे) ने, लाला चन्द्रमणि और लाला द्वारिका प्रसाद दो वैश्यों ने स्वामी जी से यज्ञोपवीत और गायत्री मन्त्र लिया। मैंने स्वामी जी की आज्ञा से उनकी पंचमहायज्ञ विधि पुस्तक को मुन्शी इन्द्रमणि जी से पढ़ा। मैंने एक दिन स्वामी जी से पूछा कि यदि लोग आप से यज्ञोपवीत लेने में दोष लगावें और हमारा धर्म पूछें तो क्या उत्तर दिया जावे। उन्होंने कहा कि संन्यासी से यज्ञोपवीत लेना शास्त्रोक्त है, और अपना धर्म वैदिक धर्म बतलाया करो। तभी उन्होंने बड़े प्रेम से मेरी पीठ ठोककर कहा–ईश्वर करे तू वेदों को पढ़कर उनका प्रचार करे।” मैं स्वामी जी की पुस्तकों को बहुत रुचि से लेता और पढ़ता था। उनके मासिक पत्र वेद भाष्य के ग्राह्कों में मेरा नम्बर 9 था जिसको मैं अन्त तक 17 वर्ष तक लेता रहा।

जब स्वामी जी सन् 1877 में मुरादाबाद आये थे, एक आर्यसमाज उक्त राजा साहिब की कोठी पर खोला गया था जो आपस की अनबन से टूट गया। स्वामी जी 3 जुलाई 1879 को फिर मुरादाबाद आये और शहर में उन्हीं राजा साहिब की कोठी पर उतरे। इन दिनों स्वामी जी संग्रहणी (दस्तों) के रोग से पीड़ित थे, उन्होंने तीन व्याख्यान दिये। 20 जुलाई, 1879 को स्वामी जी की उपस्थिति में उन्हीं राजा साहिब की कोठी पर बड़ा हवन करने के लिये सामग्री मंगाई गयी और मोहनभोग भी बनाया गया। उस दिन वर्षा बहुत हो रही थी। एक घर में थोड़ा सा हवन किया गया। सामग्री और मोहनभोग बच गया। लभभग पांच सौ मनुष्य उपस्थित थे। देर हो जाने के कारण राजा साहिब ने सब को भोजन कराया और वह मोहनभोग भी बंटवा दिया। उसी दिन आर्यसमाज स्थापित होकर मुन्शी इन्द्रमणि प्रधान, कुंवर परमानन्द और ठाकुर शंकरसिंह मन्त्री, साहू श्याम सुन्दर कोषाध्यक्ष, लाला जगन्नाथ दास पुस्तकाध्यक्ष ओर अड़तीस सभासद् हुए जिनमें मैं भी था। इस अवसर पर धूर्तों ने गप्प उड़ाई कि स्वामी जी ने मोहनभोग में थूक दिया था, वह इन लोगों ने खाया है। बिरादरी में पंचायतें होने लगीं, कुछ लोग समाज से अलग हो गये और कुछ दृढ़ होकर कार्य करते रहे। मुझ से भी कुछ बिरादरी वालों ने खेंचातानी की, मैं पक्का होकर समाज में बना रहा। दूसरे वर्ष चिरंजीव विष्णुदयाल का यज्ञोपवीत कराया। सब भाई बन्धु, नातेदार और आर्यसमाजी भाई संस्कार में सम्मिलित हुए, मैंने उसको यज्ञोपवीत ओर गायत्री मन्त्र दिया। आये हुए स्त्री पुरुषों का सत्कार मिष्टान्न और भोजन आदि से किया गया और कार्य बड़ी प्रसन्नता से पूरा हुआ।

संक्षिप्त आत्म परिचय में पं. क्षेमकरण दास त्रिवेदी जी ने अपने जन्म एवं वंशावली, बालकपन और पढ़ाई, जीविका, गृहस्थ कर्म विवाह आदि, धर्मनिष्ठा, संस्कृत विद्या, प्राक्ष परीक्षा और वेद परीक्षा, अथर्ववेद का भाष्य, विघ्न तथा परमेश्वर का ध्यान आदि विषयों पर किंचित विस्तार से प्रकाश डाला है। यह आत्म-परिचय सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली द्वारा प्रकाशित अथर्ववेद हिन्दी भाष्य के प्रथम भाग में दिया गया है। लेख पठनीय है और इससे पंडित क्षेमकरण दास त्रिवेदी जी के जीवन पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। पंडित जी ने अथर्ववेद भाष्य सहित अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। पंडित जी ने अपना आत्म-परिचय 25 दिसम्बर 1921 को लिखा था। यह भी बता दें कि पडित जी का जन्म 3 नवम्बर, 1848 को अलीगढ़ के एक गांव शाहपुर-मंडराक में हुआ था। पंडित जी ने लिखा है कि वह अपने माता पिता से अठारह भाई बहिन जन्में थे। पंडित जी ने अपने विषय में बताया है कि उनकी आठ सन्तान हुईं जिनमें से तीन पुत्रियों और एक पुत्र का विवाह हुआ। पुत्र का नाम लाला विष्णुदयाल था और उनके दो पुत्र लाला शंकरदयाल सेठ बी.एससी. और इन्द्रदयाल सेठ थे।

पंडित जी ने ऋषि दयानन्द जी के दर्शन कर उनकी प्रेरणा से विपरीत परिस्थितियों में संस्कृत व्याकरण एवं वैदिक साहित्य व शास्त्रों का अध्ययन किया और अथर्ववेदभाष्य का वह कार्य किया जैसा महाभारत के बाद पांच हजार वर्षों में किसी धर्माचार्य ने नहीं किया था। पंडित क्षेमकरण दास त्रिवेदी जी की प्रतिभा, पुरुषार्थ एवं ऋषि-भक्ति को सादर नमन है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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