ओ३म् “वैदिक साधन आश्रम तपोवन में पांच-दिवसीय वृहद गायत्री यज्ञ प्रगति पर”

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ओ३म्

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वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून देश की आर्यसमाजों की योग साधना एवं वैदिक धर्म प्रचार की एक प्रमुख संस्था है। कोरोना काल में भी यहां नियमों का पालन करते हुए अर्धवार्षिक उत्सव एवं अन्य यज्ञ आदि के आयोजन होते रहे हैं। स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती, पंडित सूरतराम शर्मा, श्री प्रेमप्रकाश शर्मा, श्री विजय कुमार आर्य जी आदि अनेक समर्पित ऋषिभक्तों की सेवायें आश्रम को उपलब्ध हैं। यह सभी बन्धु अपनी पूरी शक्ति से धर्म प्रचार के कार्यों में लगे हुए हैं। आश्रम में बुधवार 9 मार्च, 2022 से पांच दिवसीय वृहद गायत्री यज्ञ एवं चार वेदों के शतकों से यज्ञ किया जा रहा है। स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती तथा पं. सूरतराम जी का सान्निध्य देश से आये याज्ञिकों को प्राप्त है। यहां प्रतिदिन प्रातः व सायं यज्ञ, भजन एवं जीवन को ऊंचा उठाने वाले आध्यात्मिक एवं जीवन उपयोगी प्रवचन होते हैं। आश्रम की पर्वतीय इकाई में यह यज्ञ किया जा रहा है जो मुख्य आश्रम से तीन किमी. दूर पहाड़ियों पर घने वनों के बीच शुद्ध वातावरण में कई एकड़ भूमि में स्थित है जहां वृहद यज्ञशाला एवं साधकों के निवास आदि की सुविधायें सुलभ हैं। आजः प्रातः हम भी अपने निवास से चलकर इस आयोजन में सम्मिलित हुए। आश्रम में पहले गायत्री यज्ञ सम्पन्न किया गया। यज्ञ के अनन्तर स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वतीजी ने साधक याज्ञिकों को सम्बोधित किया।

स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने कहा कि यजमानों को पूर्ण श्रद्धा भक्ति से ही यज्ञ में आहुति देनी चाहिये। उन्होंने यज्ञ में आहुति देने की विधि भी बताई। उन्होंने कहा कि श्रद्धावान् साधक व उपासक तथा याज्ञिक को ही ज्ञान लाभ प्राप्त होता है। स्वामी जी ने कहा कि जो मनुष्य दूसरों को सुख बांटते हैं उनको सुख प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि यज्ञ करके वायु पवित्र होती है जिससे प्राणियों को सुख मिलता है। उन्होंने बताया कि यज्ञ श्रेष्ठतम् कर्म है। प्रातः 8.25 बजे यज्ञ का समापन हुआ। स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य को अपना जीवन चलाने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। मनुष्य को सुखी रहने के लिए वायु, जल तथा ओषधियों आदि की भी आवश्यकता होती है। आत्मा को भोजन आदि किसी भौतिक पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती। इनकी आवश्यकता हमारे शरीर को ही होती है। स्वामी जी ने कहा कि आत्मा सिर के बाल के अग्रभाग के 100 भागों में से एक भाग के भी सौंवे भाग के लगभग बराबर होता है। हमारा यह आत्मा कभी कुछ नहीं खाता है। स्वामी जी ने कहा कि परमात्मा भी कुछ नहीं खाता, वह अन्य सभी प्राणियों को खिलाता है। आत्मा को स्वामी जी ने नित्य, चेतन तथा अनादि आदि गुणों से युक्त बताया। स्वामी जी ने कहा आत्मा तथा परमात्मा मूल तत्व है। इनका निर्माण प्रकृति अथवा किसी भोतिक पदार्थ से नहीं हुआ है। आत्मा और परमात्मा किसी भी अन्य पदार्थ का कार्य नहीं हैं। स्वामी जी ने कहा कि कारण से ही कार्य हुआ करता है। सृष्टि प्रकृति से बनी हुई है। हम सबका शरीर भी प्रकृति से ही बना हुआ है। स्वामी जी ने सभी श्रोताओं को वायु का महत्व भी बताया। उन्होंने कहा कि वायु हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। स्वामी जी ने कहा कि मनुष्यादि प्राणी दूषित वायु छोड़ते और शुद्ध वायु वा आक्सीजन को लेते हैं। उन्होंने कहा कि यदि मानव जाति को जीवित रहना है तो उसे प्रदुषण को दूर करना होगा। स्वामी जी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रातः व सायं यज्ञ करते हुए 32 आहुतियां देनी हैं। स्वामी जी ने यह भी बताया कि 1 तोले शुद्ध गोघृत से 1 टन वायु शुद्ध होती है। यज्ञ से जो वायु शुद्ध होती है वह सब मनुष्यों व प्राणियों को लाभ देती है। इसके बाद यज्ञ में कुछ महत्वपूर्ण मंत्रों से आहुतियां देने के बाद पूर्णाहुति सम्पन्न की गई।

यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद स्वामी चित्तेश्वरानन्द जी ने यज्ञ प्रार्थना कराई। स्वामी जी ने परमात्मा को दया का आधार बताया। स्वामी जी ने कहा कि हमने यह जो यज्ञ किया है उसमें हमारा अपना कुछ नहीं है। हमारा यह यज्ञ परमात्मा को समर्पित है। परमात्मा उदार हैं। हम उस परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें भी उदार बनायें। परमात्मा आनन्दमय है। परमात्मा को किसी से कुछ भी नहीं चाहिये। परमात्मा ने ही सृष्टि तथा इसके सभी पदार्थों को बनाया है। सूर्य, चन्द्र, पृथिवी तथा सभी लोक-लोकान्तरों को भी परमात्मा ने ही बनाया है। परमात्मा सब माताओं की माता और सब पिताओं का पिता है। उसी ने वेदों का ज्ञान दिया है। स्वामी जी ने अन्धविश्वासों की चर्चा की और उन पर प्रकाश डाला। स्वामी जी ने कहा कि वेदों के विलुप्त होने से मानव जाति की अपार हानि हुई। इतिहास से ज्ञात होता है कि हमारा घोर पतन हुआ तथा हम अपनी माताओं तथा बहिनों की भी रक्षा नहीं कर पाये। वेदों से हम अपने पुराने गौरव को प्राप्त हो सकते हैं। स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी ने ऋषि दयानन्द जी के वेदोद्धार की चर्चा की तथा उनके मानव जाति की उन्नति के कार्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कामना की कि विश्व में वेदों का प्रचार हो। स्वामी जी ने ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कोरोना रोग को पूरी तरह से समाप्त करने की प्रार्थना भी की। स्वामी जी ने मोदी जी और योगी जी के कार्यों की भी प्रशंसा की। उन्होंने परमात्मा से इन दो महान पुरुषों की रक्षा करने की प्रार्थना भी की। स्वामी जी ने परमात्मा से कहा कि सबका मंगल हो तथा सबको सुख प्राप्त हों। स्वामी जी ने अन्त में कहा कि हम शरीर नहीं अपितु आत्मा हैं। हमें इसका सदैव ध्यान रहे। हम दोषों से दूर रहें। परमात्मा हमें इसकी सामथ्र्य दे। इसके बाद यज्ञ की सामूहिक प्रार्थना की गई।

सामूहिक ईश-प्रार्थना तथा यज्ञ-प्रार्थना के बाद माता सुरेन्द्र अरोड़ा जी का उपदेश हुआ। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है। हमें दुःख न हो, इसके लिए हम परमात्मा से प्रार्थना करते हैं। हमें अपनी प्रार्थना के अनुरुप आचरण भी करना चाहिये। माता जी ने कहा कि प्रभु ने मनुष्य को तीन विशेषतायें दी हैं।

1- परमात्मा ने हमें बुद्धि दी है जिससे हमें विवेकपूर्वक काम करने चाहियें।
2- हमें वाणी दी है जिसका हमें संयमपूर्वक सदुपयोग करना चाहिये।
3- हमें परमेश्वर ने दो हाथ दिये हैं। इनसे हमें परोपकार के कार्य करने चाहियें। यदि हम हार्थों का सही उपयोग करेंगे तभी हमें यह हाथ शेष जीवन तथा अगले जन्म में भी प्राप्त रहेंगे।

माता जी ने वाणी की चर्चा की तथा कहा कि हमारी वाणी में माधुर्य होना चाहिये। हमारी वाणी सरल तथा तरल होनी चाहिये। वाणी का सब मनुष्यों को सदुपयोग करना चाहिये। माता जी ने कहा कि हमारी जिह्वा सदा जल से युक्त रहती है। हमें अपने जीवन में जल के गुणों को सदा ग्रहण व धारण करना चाहिये। जल शीतल होता है। हमारी वाणी में भी शीतलता होनी चाहिये। ऐसा करने से पराये भी अपने बनेंगे। माता जी ने कहा कि जल ढलान पर बहता है। हमें भी जल के इस गुण से शिक्षा लेनी है और जीवन में विनम्रता को धारण करना है। हमें अहंकार को छोड़कर नम्रता को ग्रहण करना चाहिये। जल हमेशा मार्ग के गड्ढो में भर जाता है। मनुष्य जीवन में भी कमियां होती हैं। हमें अपनी कमियों को देखना व उन्हें दूर करना चाहिये। मनुष्य जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। उनको सहन करते हुए हमें शान्तिपूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहिये। ऐसा करने से ही हमारा जीवन सफल हो सकता है। माता जी ने कहा कि पानी में यदि अंगारा डाले तो वह बुझ जाता है और नीचे जाकर बैठ जाता है। हमारे जीवन में भी यदि कोई दोष या दुर्गुण हों तो हमें उन्हें दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये और अंगारे के पानी में मिलने के समान उन्हें दबा देना चाहिये। माता जी ने कहा कि यदि हम सुख चाहते हैं तो जल के गुणों को जानकर उन्हें अपने जीवन में धारण करना होगा। उन्होंने कहा कि परमात्मा ने यह संसार हमें शिक्षा देने के लिए बनाया है। परमात्मा जब दण्ड देते हैं तो हमें कोई नहीं बचा सकता है। उन्होंने कहा कि हममे जों शक्तियां हैं वह सब उसी की दी हुई हैं। हम इन सब बातों को जानकर प्रभु को अपना मित्र बनाना है तथा दोषों को भी दूर करना है।

माता जी के सम्बोधन के बाद डा. वीरपाल विद्यालंकार जी का ओजस्वी सम्बोधन हुआ। उन्होंने अनेक विषयों पर विचार व्यक्त किये। उन्होंने बताया कि वह कल तपोवन आश्रम में संन्यास ग्रहण करेंगे। उन्होंने कन्या गुरुकुल देहरादून को पुनर्जीवित करने का दायित्व ग्रहण करने का भी उल्लेख दिलाया। डा. वीरपाल जी ने अनेक विषयों पर प्रभावशाली रूप से बातें कही। उनकी बातें उनके हृदय से निकल रहीं थी और श्रोताओं के हृदयों को प्रभावित कर रहीं थीं। आश्रम के मंत्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी ने अपने सम्बोधन में सभी आगन्तुकों को अपनी प्रविष्टि आश्रम के रजिस्टरों में अनिवार्य रूप से कराने का निवेदन किया। उन्होंने बतया कि आश्रम पर धर्मशाला एक्ट लागू होता है जिसके अन्तर्गत सभी आने वाले बन्धुओं की प्रविष्टि होना अनिवार्य है। मंत्री जी ने बताया कि आश्रम में गायत्री यज्ञ की परम्परा लगभग 40 वर्ष पूर्व महात्मा दयानन्द वानप्रस्थी जी ने डाली थी। मंत्री जी ने कहा कि वर्तमान समय में वृहद यज्ञ पर पूर्व की अपेक्षा अधिक व्यय होता है। पहले इस व्यय को सभी यज्ञ करने वाले बन्धु मिलकर वहन करते थे। वर्तमान में भी ऐसा ही करना उचित है। उन्होंने कहा कि यज्ञ में भाग लेने वाले बन्धुओं को अपनी अपनी सामथ्र्य के अनुसार दान देना चाहिये। मंत्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा ने बताया है कि देहरादून की कुछ प्रमुख आर्यसमाजें एवं संस्थायें सक्रिय सदस्यों व समय देनेवाले बन्धुओं के अभाव में खाली पड़ी है। इनका भविष्य खतरे में है। उन्होंने सभी वानप्रस्थियों व संन्यासियों सहित अधिक आयु के आर्यसमाज के ऋषिभक्तों को संस्थाओं में एक-एक दो-दो महीने देने को कहा और कहा कि उन्हें आर्यसमाजों में रहकर उसकी गतिविधियों को सामान्य रूप से चलाना चाहिये अन्यथा इस पर दूसरे लोग अधिकार कर लेंगे। शर्मा जी ने अपनीसेवायें देने वाले बन्धुओं के लिए आवास एवं भोजन की व्यवस्था करने का संकल्प व्यक्त किया। शर्मा जी के सम्बोधन के बाद देहरादून के प्रसिद्ध आर्य पुरोहित पं. वेदवसु शास्त्री जी का एक भजन हुआ। भजन के बोल थे ‘परमात्मा का सभी गुण गाओ तो आवागमन से सभी छूट जाओं।’ इसके बाद शान्तिपाठ के साथ आज के सत्र का समापन हुआ। आयोजन में अनेक लोगों में प्रसिद्ध भजन उपदेशक श्री रुवेलसिंह आर्य एवं प्राकृतिक रोग चिकित्सक स्वामी योगानन्द सरस्वती जी भी सम्मिलित थे। पं. रुवेल सिंह आर्य के भजन यूट्यूब चैनल पर सुने जा सकते हैं। कल यज्ञ की पूर्णाहुति होगी। स्थानीय व निकटवर्ती लोग कल प्रातः 7.00 बजे से 11.00 बजे के मध्य यज्ञ में सम्मिलित होकर सत्संग का लाभ ले सकते हैं। इसके लिए उन्हें अपने वाहनों से यज्ञशाला वा आश्रम में पहुंचना होगा। यह बतादें कि आश्रम की पर्वतीय इकाई तक जाने के लिए सार्वजनिक बस या अन्य वाहन सुलभ नहीं है। यहां निजी वाहनों से ही पहुंचा जा सकता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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