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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पश्चिमी जगत का केवल एक नाटक मात्र है

तरुण वैद्य

पश्चिम जगत पुरुष व स्त्री को समाज मे अलग अलग दृष्टि से देखता है जबकि भारत, स्त्री व पुरुष को अलग अलग नही अपितु समग्र दृष्टि से देखता है, एक दृष्टि से देखता है। पश्चिमी समाज में महिला पुरुष दो अलग अलग इकाइयां हैं और भारत में केवल एक मनुष्य नाम की इकाई है, यही मूल भिन्नता है। पश्चिम ने feminism के नाम पर महिला को समाज से अलग कर अकेला खड़ा कर दिया है। भारत मे महिला परिवार की धुरी होती है, परिवार इस धूरी के आधार पर ही घूमता है। लगभग हम सभी ने अपने परिवार की इस आदेशात्मक धुरी का रूप बेटी, पत्नी, मां, बड़ी मां, दादी, परदादी के रूप में देखा ही है।
भारत मे महिला सशक्तिकरण को पश्चिम से जोड़ने वाले नही जानते कि पिछली सदी तक कई यूरोपीय देशों में महिलाओं को मताधिकार तक नही था! पश्चिमी feminism की आंधी में हमने कई गरिमामयी स्त्रैण भारतीय प्रतिमान ध्वस्त किये हैं। अब भी भारतीय स्त्री के पास जो परिवार की धुरी होने का भाव बचा है वह समूचे विश्व में किसी सभ्यता की नारी के पास नही है!! भारतीय नारी अपने मूल स्वरूप में आज भी केवल माँ है! एक दिव्य व दिव्यतम आभा, ममता व गरिमा को धारण की हुई माँ को आप जब जब भी पश्चिमी चश्में से देखेंगे वह आपको एक वैश्विक औरत तो नजर आ सकती है किंतु उसमें आपको देवत्व नही दृष्टिगोचर होगा।
अभी उठिए और देखिये घर, समाज, नगर व राष्ट्र की जो भी स्त्री सामने आ जाये, उसे उस दृष्टि से दखिये जो दृष्टि आपकी माँ ने आपको दी है, आपको हर नारी में स्वर्ग दिखेगा। यहां तक कि एक निरक्षर मां से हमें मिली दृष्टि से भी स्त्री को देखने से हमें स्त्री में देवी के अतिरिक्त कुछ और नहीं दिखता। वस्तुतः भारतीय नारीवाद को आप अक्षर, शिक्षा, अकादमी, स्वतंत्रता जैसे कई कई शब्दों से अलग होकर केवल सहज सरल सनातनी भाव से लिख पढ़ लेंगे तो परिणाम में आप नारीवाद नहीं, मानववाद भी नहीं बल्कि इससे भी ऊपर उठकर जीव मात्र के कल्याण की कल्पना और सर्वे भवन्तु सुखिनः का पाठ सीख रहे होंगे।
स्त्री को हमें सनातनी दृष्टि से देखने की समृद्ध विरासत मिली किंतु हम उसे छोड़कर चिथड़े में लिपटे नारीवाद की ओर आकर्षित हुए। इसे Waves of feminism के चमकदार नाम से पुकारा और फिर हर बार विफल होने पर इस कथित फेमिनिज्म के नए नए संस्करण लाए। फेमिनिज्म के किसी भी संस्करण से कभी वैश्विक स्त्री संतुष्ट न हो पाई व सदैव अपने अस्तित्व को, मूल को, अंतर्भाव को खोजती आज भी भटक रही है। कालान्तर में पाश्चचात्य व वामपंथ ने स्त्री को लेकर विभिन्न थोथे विमर्श गढ़े जिससे स्त्री समाज के समुद्र में एक टापू की भूमिका में रहने लगी। पश्चिम समाज मे स्त्री एक अलग थलग टापू बन गई है और ऐसी विकट के आसपास भारत को भी लाने के प्रयास हो रहे हैं। स्त्री के इस वैचारिक आइलैंड (टापू) पर पाश्चात्य ने बहुत से नरेटिव विकसित किये। इन नरेटिव्स या विमर्श के परिणाम स्वरूप समाज में बहुत सी विडम्बनाएं उपजी जिनके साइड इफेक्ट्स पश्चिम से अधिक हमने भुगते हैं।

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