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संपादकीय

रूस ने कई बार भारत के लिए दिया है एक अच्छे मित्र का परिचय

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यदि कोई देश आपके देश के हितों के साथ खड़ा हुआ दिखाई दे तो उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना आवश्यक हो जाता है। यह तब और भी अधिक आवश्यक हो जाता है जब अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उतार-चढ़ाव का स्तर बड़ी शीघ्रता से परिवर्तित होता रहता है। कब कौन राजनीति में किस को धोखा दे जाए, इस संबंध में कभी भी कुछ नहीं कहा जा सकता। यदि इस कसौटी पर रूस और भारत की मित्रता को देखा व परखा जाए तो पता चलता है कि रूस ने कई अवसरों पर हमारा साथ देकर हमारे सम्मान और राष्ट्रीय अस्मिता को बचाने में एक अच्छे मित्र की भूमिका निभाई है। यही कारण रहा है कि भारत ने भी अपने इस परंपरागत मित्र के साथ अपनी मित्रता के धर्म का निर्वाह करते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस के विरुद्ध लाए गए निंदा प्रस्ताव पर मतदान से अपने आपको दूर कर लिया, भारत के इस कदम की रूस ने भी प्रशंसा की। भारत ने ऐसा करके अपनी बहुत ही सधी हुई भूमिका का निर्वाह किया । भारत के इस कदम की चाय कई देशों ने निंदा की हो पर वर्तमान परिस्थितियों में भारत के लिए इसी रणनीति पर कार्य करना उचित था।
  कई प्रकार के उतार-चढ़ावों को देखने वाली रूस – भारत की मित्रता कई देशों के लिए ईर्ष्या का कारण रही है । अमेरिका ने तो इस मित्रता को कभी फूटी आंख भी पसंद नहीं किया । भारत की सहृदयता और इसके सांस्कृतिक मूल्यों का रूस ने एक नहीं कई अवसरों पर खुले मन से स्वागत किया है। जब भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्राचीन काल से भारत के एक अंग के रूप में रहे कश्मीर का अंतरराष्ट्रीयकरण कर उसे संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने की गलती की तो उनके आलोचकों ने उनके इस कार्य की भारत में पहले दिन से ही आलोचना करनी आरंभ कर दी थी। नेहरू के ऐसे आलोचकों का कहना होता था कि हम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मित्रविहीन होने के कारण कश्मीर को पाकिस्तान को दिलाने की गलती कर सकते हैं। सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बलराज मधोक जैसे नेहरू के कट्टर आलोचकों की इस आलोचना में बल था। यदि जम्मू कश्मीर के प्रकरण को लेकर रूस हमारा साथ नहीं देता तो हम यूएनओ सहित प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बाजी हार सकते थे। नेहरू की गलती तब हमारे लिए और भी अधिक भयंकर कोढ़ बन जाती। यदि आज कश्मीर वर्तमान स्वरूप में हमारे पास है तो इसमें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रूस की भूमिका का  महत्वपूर्ण योगदान है। ऐसा कहने में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है कि यदि अंतरराष्ट्रीय मानचित्र और मंचों पर आज भारत का सम्मान पूर्ण स्थान है तो इसमें रूस का विशेष योगदान है। यदि रूस ना होता तो धर्मनिरपेक्ष भारत को पाकिस्तान और अमेरिका सहित उनके मित्र देश अब तक बड़े गहरे – गहरे घाव पहुंचा सकते थे।
   20 फरवरी 1957 की घटना है जब नेहरू के शासनकाल में ही ऑस्ट्रेलिया, क्यूबा, यूके और अमेरिका की ओर से संयुक्त राष्ट्र संघ में यह प्रस्ताव लाया गया कि उसे भारत और पाकिस्तान के साथ बातचीत करके इस समस्या का समाधान करना चाहिए। प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि दोनों देश विवादित क्षेत्र से अपनी अपनी सेनाओं को पीछे हटा लें। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र को कश्मीर में अस्थाई रूप से अपने सुरक्षा बल नियुक्त करने चाहिए । यदि ऐसी स्थिति आती तो निसंदेह इससे भारत की संप्रभुता के लिए बहुत बड़ा संकट आ जाता।
इस प्रस्ताव के विरुद्ध और सोवियत संघ ने अपने वीटो के अधिकार का प्रयोग किया और इस प्रस्ताव को पारित नहीं होने दिया। उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष स्वीडन के थे । अपनी रणनीति के अंतर्गत भारत को लाभ पहुंचाते हुए उनके देश ने भी इस प्रस्ताव पर होने वाले मतदान से दूर रहना ही उचित समझा था।
   गोवा , दमन और दीव में भारत द्वारा जब सैन्य बलों का प्रयोग किया गया तो उस पर फ्रांस ,तुर्की, ब्रिटेन और अमेरिका ने आपत्ति व्यक्त की थी । भारत के इस कदम को पूर्णतया गलत और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के विपरीत बताते हुए 18 दिसंबर 1961 को सुरक्षा परिषद में ये सभी देश मिलकर एक प्रस्ताव लाए थे। जिसमें मांग की गई थी कि भारत को अपने सैन्य बल हटाकर 17 दिसंबर से पहले की स्थिति बहाल करनी चाहिए।
तब  सोवियत संघ, श्रीलंका, लाइबेरिया और यूएई ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए भारत का साथ दिया । जिससे यह प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया था और भारत को सुरक्षा परिषद में बहुत बड़ी राहत मिली थी। उस समय फ्रांस, टर्की ,ब्रिटेन और अमेरिका के साथ कई देश मिलकर भारत का विरोध कर रहे थे। ऐसे में रूस का समर्थन मिलना उस समय भारत के लिए किसी औषधि से कम नहीं था। रूस के द्वारा उठाए गए उस समय के इस कदम से गोवा का भारत में आराम से विलय संभव हो पाया था, अन्यथा इस पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी भारत के लिए खतरनाक व्यवधान उत्पन्न कर सकती थी।
  अमेरिका अपनी दादागीरी और बनियागीरी दोनों साथ-साथ चलाता रहा है जब उसे किसी देश को धमकाना होता है तो वह  दादागीरी का सहारा लेता है और जब उसे अपने हथियार बेचने होते हैं तो वह बनियागीरी का दामन थाम लेता है। यह भी स्पष्ट है कि जब वह बनियागीरी कर रहा होता है तो वह उस देश के साथ अपनी सहानुभूति दिखाता है। पर जैसे ही सौदा पूरा हो जाता है तो वह धमकाने की स्थिति में आ जाता है। भारत के साथ  भी अमेरिका के संबंध कुछ इसी प्रकार की नीति पर आधारित रहे हैं। कश्मीर के मुद्दे को लेकर वह कई बार भारत के विरुद्ध सुरक्षा परिषद में या संयुक्त राष्ट्र में ऐसे कार्यों या गतिविधियों में संलिप्त रहा है जो उसके चाल, चरित्र और चेहरे पर संदेह उत्पन्न करती रही हैं। एक बार उसने आयरलैंड को कश्मीर के मुद्दे पर उकसाकर सुरक्षा परिषद में भारत और पाकिस्तान की सरकारों से कश्मीर विवाद को सुलझाने की मांग का समर्थन प्रस्तुत करवाया था। जिसमें दोनों देशों की सरकारों से ऐसा परिवेश सृजित करने की मांग की गई थी कि वह बातचीत के माध्यम से इस समस्या का समाधान खोज लें। उस समय भी सोवियत संघ ने भारत का साथ दिया और इस प्रस्ताव को पारित नहीं होने दिया।
  4 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान सीमा पर युद्ध विराम की लागू करने की मांग करते हुए अमेरिका के नेतृत्व में एक प्रस्ताव लाया गया था। उसका विरोध भी रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) ने ही किया था । अपनी वीटो पावर का प्रयोग करते तत्कालीन सोवियत संघ ने उस प्रस्ताव को भी पारित नहीं होने दिया था।
तत्कालीन जनसंघ के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने रूस के इस कदम का स्वागत किया था और रामलीला मैदान में आयोजित की गई एक रैली को संबोधित करते हुए बड़े ही हर्ष के साथ उन्होंने उद्घोष किया था कि ‘मौजूदा संकट में जो साथ देगा, वह हमारा दोस्त है। विचारधारा की लड़ाई बाद में लड़ ली जाएगी।’ अटल बिहारी वाजपेयी ने न केवल अपनी पार्टी के और रूस की कम्युनिस्ट विचारधारा के विचारधारात्मक विरोध को इस प्रकार प्रकट किया था बल्कि उनका संकेत भारत और रूस की राजनीतिक विचारधाराओं के प्रतिगामी होने की ओर भी था जिसको दरकिनार कर रूस हमारा साथ दे रहा था। यह बात उस समय और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती थी जब अमेरिका एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते भारत के कहीं अधिक निकट था। वह इस निकटता को एक ओर रखकर एक लोकतांत्रिक देश को ही कुचलने या दबाने का बार-बार प्रयास करता देखा जा रहा था। रूस ने भारत का साथ देकर 4 दिसंबर 1971 को अमेरिका को यह आभास करा दिया था कि वह भारत के साथ चट्टान की भांति खड़ा है।
5 दिसंबर 1971 को अर्जेंटिना, बेल्जियम, बुरुंडी, इटली, जापान, निकारागुआ, सियरा लियोन और सोमालिया द्वारा भारत-पाकिस्तान सीमा पर युद्धविराम लागू करने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तुत किया गया था। सोवियत संघ के सहयोग से उसकी भी वही स्थिति हुई थी जो अबसे पूर्व के प्रस्तावों की हुई थी। फिर 14 दिसंबर 1971 को सैन्य वापसी की मांग का एक प्रस्ताव अमेरिका और उसके सहयोगियों की ओर से लाया गया। उसे भी सोवियत संघ ने अपनी भी तो पावर का प्रयोग करते हुए पारित नहीं होने दिया था।
    आज जबकि नाटो देश अपने-अपने राजनीतिक पूर्वाग्रहों के चलते रूस को नीचा दिखाने की गतिविधियों में लंबे समय से लगे रहे हैं और कभी उसी के एक हिस्सा रहे यूक्रेन को उसके खिलाफ उकसाकर युद्ध की परिस्थितियों तक ले आए हैं तो इस समय युद्ध से जूझते हुए रूस को भारत का नैतिक समर्थन बहुत बल प्रदान कर रहा है। भारत को अपने मित्र का सहयोग करना चाहिए। यद्यपि हम मानवता की समृद्धि और उन्नति के लिए भारत सरकार से यह भी कहना चाहेंगे कि युद्ध की विभीषिकाओं में अनावश्यक देश को ना उलझाया जाए। इसके साथ ही यदि अपने कूटनीतिक व रणनीतिक प्रयासों के माध्यम से इस युद्ध को शांत किया जा सकता है तो भारत अपनी पूर्ण क्षमता और सामर्थ्य के साथ इसे रोकने की दिशा में काम करे। क्योंकि यह युद्ध ना तो रूस के हित में है , ना ही यूक्रेन के हित में है और ना ही संसार के किसी अन्य देश के हित में है । हर समस्या का समाधान शांति की मेज पर ही होता है । इसे सारा संसार भली प्रकार जानता है । इस युद्ध के लिए भी भारत सहित संसार के वे सभी देश प्रयास करें जो युद्ध ना तो चाहते हैं और ना ही युद्ध को किसी समस्या का समाधान मानते हैं। ऐसे प्रयासों को शीघ्रातिशीघ्र करना चाहिए। क्योंकि यदि क्रोध के वशीभूत होकर रूस ने या दूसरे देशों के उकसावे में आकर यूक्रेन ने इस युद्ध को परमाणु युद्ध में परिवर्तित कर दिया तो संसार का अस्तित्व भी समाप्त हो सकता है । इसलिए गंभीर लोगों को गंभीर जिम्मेदारी और गंभीर सोच का परिचय देते हुए प्रयास भी गंभीर ही करने चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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