यूक्रेन को लेकर युद्ध के लिए जिम्मेदार परिस्थितियां

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मेजर जनरल अशोक कुमार (रि.)

रूस के लड़ाकू हेलिकॉप्टर यूक्रेन की सीमा से कुछ ही दूरी पर रविवार को उड़ान भरते हुए देखे गए। पश्चिमी देशों ने यूक्रेन में अपनी एंबेसी खाली कर दी हैं। कई एयरलाइंस वहां के लिए फ्लाइट्स रद्द कर चुकी हैं। इन हालात में भी तीन साल पहले चुने गए यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लोदिमीर जेलेंस्की रूस के साथ अच्छे रिश्तों की उम्मीद जता रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन से उन्होंने रविवार को बात की और उन्हें अपने देश बुलाया। इस उम्मीद में कि वह आएंगे तो रूस के साथ तनाव कम करने में मदद मिलेगी। अमेरिका पहले ही अपने राजदूत वहां से बुला चुका है, इसलिए बाइडन शायद ही कीव जाएं।
नाटो से नाराजगी
अमेरिका ने चेतावनी दी है कि रूस कभी भी यूक्रेन पर हमला कर सकता है। वहीं, यूक्रेन के राष्ट्रपति अभी भी उसी रणनीति पर कायम हैं, जिस पर वह महीनों से चल रहे हैं। वह लगातार कह रहे हैं कि घबराने की जरूरत नहीं है। इधर, रूस और रूस समर्थक सुरक्षा बलों ने यूक्रेन की घेराबंदी कर रखी है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन ने तनाव खत्म करने के लिए दो मांगें रखी हैं। पहली, यूक्रेन नाटो समूह में शामिल ना हो। दूसरी, पूर्वी यूरोप से नाटो की सेनाओं को हटाया जाए।
पहली नजर में ये मांगें ठीक लग सकती हैं, लेकिन मामला इतना सहज नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना होगा। बात द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत की है। तब जर्मनी और सोवियत यूनियन मिलकर दूसरों से जंग लड़ रहे थे। उन्होंने युद्ध की शुरुआत 1939 में पोलैंड से की। यह दोस्ती तब टूटी, जब हिटलर ने सोवियत यूनियन पर 22 जून 1941 को हमला कर दिया।

इसके बाद सोवियत यूनियन ने अपनी हिफाजत के लिए युद्ध किए। वह जर्मनी और उसके सहयोगियों के खिलाफ खड़ा हुआ। यह लड़ाई जापान में अमेरिका के एटम बम गिराए जाने के बाद जर्मनी और उसके सहयोगी देशों के समर्पण के साथ खत्म हुई। महत्वपूर्ण बात यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध में साझी विजय के बावजूद अमेरिका और सोवियत यूनियन दो धड़ों में बंट गए। दोनों दुनिया में अपना-अपना प्रभाव बढ़ाने में जुट गए।
नाटो इसका एक माध्यम बना, जिसकी अमेरिका के नेतृत्व में 1949 में स्थापना हुई। इसमें पहले 12 देश शामिल थे- बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लग्जमबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, ब्रिटेन, और अमेरिका। 18 फरवरी 1952 और 6 मई 1955 के बीच तीन और देशों को नाटो में शामिल किया गया। इनमें पश्चिम जर्मनी भी शामिल था। इससे सोवियत यूनियन की चिंता और बढ़ी, क्योंकि पूर्वी जर्मनी सोवियत समर्थक था।
1955 में ही वारसा पैक्ट हुआ। यह समझौता अल्बेनिया (1968 तक), बुल्‍गारिया, चेकोस्लोवाकिया, पूर्वी जर्मनी, हंगरी, पोलैंड, रोमानिया और सोवियत संघ के बीच हुआ। अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध शुरू हो चुका था, जो समय के साथ बढ़ता चला गया। आज यूक्रेन की जो हालत है, उसे 1991 की घटनाओं से भी जोड़कर देखना जरूरी है। असल में, 1988 से सोवियत संघ का शुरू हुआ विघटन 26 दिसंबर 1991 को पूरा हुआ। तब सोवियत संघ टूटकर 15 देशों में बंट गया। इसमें सबसे बड़ा देश रूस है। 1991 में वारसा पैक्‍ट भी खत्म कर दिया गया।
1988 से 1991 के बीच जब सोवियत संघ विघटन की तरफ बढ़ रहा था, वहीं 1990 में पश्चिम जर्मनी और पूर्वी जर्मनी का विलय हो गया। माना जाता है कि इस विलय के समय मौखिक समझौता हुआ था कि नाटो अपना विस्तार पूर्वी यूरोप में नहीं करेगा, लेकिन पश्चिमी देशों ने यह वादा नहीं निभाया। वहीं, रूस में जब येल्तसिन ने 1999 में राष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दिया तो पूतिन शुरू में कार्यवाहक और बाद में राष्ट्रपति बने। तब से लेकर आज तक वह रूस की शीर्ष सत्ता में हैं। कभी प्रधानमंत्री तो कभी राष्ट्रपति के रूप में।
पूतिन का रूस की शीर्ष व्यवस्था में इतने वर्षों तक रहना और उनके द्वारा रूस को केंद्र में रखते हुए सोवियत संघ के गौरवशाली इतिहास को पुनर्स्थापित करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है। रूस ने 1994 के बाद तातरस्तान की स्थिति बदली। उसके बाद चेचन्या पर आक्रमण किया, जो शुरू में 1994 से 1996 तक चला, लेकिन पूतिन के सत्ता संभालने के बाद दोबारा 2000 में युद्ध शुरू हो गया। आज चेचन्या में रूस समर्थित सरकार है। 2014 में रूस ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया, जो सामरिक रूप से रूस के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।
यूक्रेन को आज पूतिन की सेना ने इसलिए घेरा है क्योंकि उसने नाटो में शामिल होने का निर्णय लिया है। 21 फरवरी 2019 में यूक्रेन ने अपने संविधान में बदलाव करके नाटो समूह में शामिल होने के अपने रास्ते को वैधानिक जामा पहनाया। इसकी अति तब हुई, जब जून 2021 में यूक्रेन को नाटो समूह में शामिल होने का रास्ता प्रशस्त होने लगा। यह शायद रूस के सुरक्षा हितों से सीधा संघर्ष था क्योंकि यूक्रेन को नाटो के सदस्य देश के रूप में मान्यता मिलते ही संगठन की दस्तक सीधे रूस के पश्चिमी किनारे पर होने वाली थी। गौरतलब यह भी है कि नाटो ने अपना लगातार विस्तार किया है। उसके लगभग 30 सदस्य देश हैं, जिनमें 10 वारसा पैक्ट में शामिल थे।
चीन की चालबाजी
यूक्रेन को लेकर टकराव बढ़ने के बीच चीन भी अपनी चालें चल रहा है। ताइवान, पूर्वी लद्दाख और दक्षिणी चीन सागर में संबंधित मुद्दों पर घिरा चीन शायद इसी तरह के अवसर की तलाश में था। चीन ने कूटनीतिक चाल चलते हुए पूतिन को विंटर ओलंपिक्स में बुलाया। यहां दोनों देशों ने संयुक्त बयान में कहा कि उनके संबंधों की कोई सीमा नहीं है। इसका मतलब यह है कि दोनों देश अमेरिका से लड़ने के लिए तैयार हैं, युद्ध चाहे यूक्रेन में हो या ताइवान में। इसी बीच, इमरान खान भी चीन पहुंचे। वह रूस की यात्रा भी करने वाले हैं। रूस, चीन और पाकिस्तान के बीच बनता यह नया समीकरण भारत के लिए चिंता का विषय है।

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