स्त्री विरोधियों को नहीं है दैवी पूजा का अधिकार

Durga-mataनवरात्रि शक्ति पूजा का पर्व है जिसमें शक्ति की उपासना की जाती है। यह पूरा जगत अग्नि-सोमात्मक और शिव-शक्ति का ही प्रतीक है जिसमें शक्ति तत्व के बिना किसी भी प्रकार का स्पंदन तक कर पाने में न शिव समर्थ हैं न और कोई।

यह शक्ति ही है जो सृजन और विध्वंस की तमाम क्षमताओं का व्यवहार करती है। पृरुष और प्रकृति के संबंधों को जानने के लिए शिव-शक्ति की महिमा को जानना जरूरी है और इसमें भी जगदाधार शक्ति तत्व को जो जान लेता है वह स्वयं सिद्ध हो जाता है।

यह शक्ति सर्वत्र व्याप्त है जिसे जानने और आदर देने का नाम ही शक्ति उपासना है। स्त्री भी शक्तिस्वरूपा है और उसमें समाहित शक्ति तत्व को जो जान लेता है वह शिव अर्थात कल्याणकारी हो जाता है व सत्यं, शिवं, सुन्दरं का पता पा जाता है।

शक्ति उपासना के कई भेद हैं। शक्ति सभी तत्वों में और सर्वत्र व्याप्त है, उसको जानने और उसका अपना हो जाने की पद्धतियाँ भिन्न-भिन्न जरूर हैं लेकिन शक्ति तत्व की झलक पा जाने पर इंसान ही नहीं बल्कि चराचर जगत का कल्याण हो जाता है।

यह सम्पूर्ण शक्तितत्व स्त्री में समाहित है। जो स्त्री के इस दिव्य एवं ईश्वरीय तत्व को आदर सहित स्वीकार कर लेता है वह परम सत्य को पा जाता है। यही शक्ति प्रेम, आदर और सम्मान पाने पर महासृजन की भावभूमि रचती है और प्रताड़ना, शोषण एवं अपमान होने की स्थिति में संहार क्रम को अपना लेती है।

ज्ञान, बुद्धि और विवेकशील लोग इस महामाया को जानने की कोशिश करते हैं और शक्ति तत्व को पहचानने के यत्न में पूर्ण प्रेम, सम्मान और आदर-श्रद्धा का भाव रखते हैं और इस प्रकार उस परम सत्य की महिमा से आलोकित हो उठते हैं जो दैवदुर्लभ है।

अज्ञानता और दुर्भाग्य से हमने प्रेरणा की शक्तिपुंज स्त्री को वस्तु और भोग्या मान लिया है और यही कारण है कि पदार्थ बुद्धि की वजह से हम शक्ति तत्व के रहस्यों से अनजान ही नहीं बल्कि विमुख होते जा रहे हैं।  सकारात्मक चिन्तन और दैवीय भावभूमि वाले लोग स्त्री के शक्तितत्व की थाह पाने के उपक्रम करते हैं जबकि वे लोग विधर्मी, पशुबुद्धि और जड़ हैं जो शक्ति को जानने की बजाय वज्रमूर्ख बने रहते हुए स्त्री को हाड़-माँस का पुतला मात्र समझते हैं और ऎसे में वे स्त्री से जड़ता ही प्राप्त करते हैं।

ईश्वर ने स्त्री के रूप में प्रकृति का वरदान हमेंं दे रखा है जिसे जानकर हम वह सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं जो हमारी कल्पनाओें व इससे परे तक है। लेकिन स्त्री को शक्ति तत्व के रूप में समझ पाना सामान्य इंसानों के बस में नहीं है।  आजकल ऎसे दुर्बुद्धि और नालायक लोगों की संख्या में इजाफा होने लगा है जिनकी वजह से शक्ति तत्व हम पर कुपित होने लगा है। हो भी क्यों न, हम मनुष्य का व्यवहार छोड़कर हिंसक जानवरों, शराबियों और माँसाहारियों सा व्यवहार करने पर उतारू हो चले हैं। हमने अपनी मर्यादाओं, अनुशासन और इंसानियत तक को गिरवी रख दिया है या मामूली भूख-प्यास मिटाने के फेर में बेच डाला है।

आज की तमाम समस्याओं का मूल कारण यही है कि हममें से काफी लोगों ने स्त्री की महिमा को समझने और उससे जीवन कल्याण का सूत्र पाने की बजाय उसे भोग्या बना दिया है। हमारी पौरूषी मानसिकता ने स्त्री पर अधिकार जमाने को ही जीवन लक्ष्य  मान लिया है। जबकि दुनिया में वे सारे लोग पौरूषहीन कहे जा सकते हैं जो स्त्री को समझ तक नहीं पाए बल्कि उस पर अत्याचार, शोषण और प्रताड़ना ढाते रहे हैं।

जिस स्त्री को परिवार और परंपराओं की मुखिया व संवाहक होना चाहिए, उसे हमने हाशिये पर ला कर खड़ा कर दिया है। धन्य थे वे लोग जिनका नाम ही स्त्रीत्व के प्रति आदर सूचक हुआ करता था और स्त्री शक्ति का नाम पुरुष से पूर्व अंकित होता था। मसलन – सीताराम, राधेश्याम, लक्ष्मीनारायण…. आदि-आदि। जब तक यह परंपरा रही, तब तक हम चरम उत्कर्ष पर रहे, जबसे हमने स्त्री को हमसे दूर करने की कोशिश शुरू कर दी, तभी से पतनोन्मुखी होने लगे।

हमारी संस्कृति और आदर्शों में नारी को सदैव पूज्य और आदरणीय माना गया है लेकिन पाश्चात्यों और विधर्मियों के प्रभाव में आकर हमने भी उन नालायकों के स्त्री विरोधी और नारी दमनकारी विचारों को अंगीकार कर लिया और अपना मिथ्या पौरूष दिखाने के यत्नों में जुटे हुए हैें।

स्त्री और शक्ति के पारस्परिक संबंधों को जो समझ लेता है वह अज्ञान के सारे पाशों से मुक्त हो जाता है। नवरात्रि वह पर्व है जो हमें शक्ति तत्व को जानने, पहचानने और जागृत करने का अवसर प्रदान करता है। इन नौ दिनों में हम दैवी मैया के प्रति समर्पित भक्ति भाव दर्शाते हैं।

प्रकारान्तर से यह भक्ति देवी स्वरूप में हमारे आस-पास विद्यमान समस्त स्ति्रयों  के प्रति दिली आदर और सम्मान की अभिव्यक्ति ही कही जा सकती है। दैवी साधना करने वालों को दैवी की कृपा तभी प्राप्त हो सकती है जबकि दैवी पूजा करने वाला व्यक्ति स्त्री मात्र के प्रति प्रेम, आत्मीयता, आदर-सम्मान और श्रद्धा का भाव रखे।  किसी भी स्त्री के प्रति जरा सी भी अनादर भरी सोच रखने वाले लोगों को दैवी मैया से कृपा की आशा नहीं रखनी चाहिए बल्कि इस प्रकार के ढोंग और दोहरे एवं दिखावटी चरित्र का प्रदर्शन करने से दैवी मैया कुपित ही होती है।

जो लोग अपनी दादी, नानी, बुआ, माँ, पत्नी, बहन और अपने आस-पास की, अपने क्षेत्र की अथवा अपने संपर्क में आने वाली किसी भी प्रकार की स्त्री के प्रति अनादर करते हुए दुर्भावना रखते हैं, प्रताड़ित करते हैं, शोषण करते हैं, कड़वे वचन बोल कर दुःखी करते हैं, स्ति्रयों की कमाई खाते हैं, स्ति्रयों को कमाई और भोग-विलास का साधन समझते हैं, स्ति्रयों पर दबाव डालकर उनके नाम पर धंधे करते हैं, स्ति्रयों के बारे में बुरा चिंतन करते हैं, ऎसे तमाम लोगों को दैवी पूजा का तनिक भी अधिकार नहीं है।

इन लोगों को दैवी पूजा से पहले महीने भर तक गौमूत्र, गंगाजल और तुलसी का सेवन करना चाहिए, विधि-विधान से हैमाद्रि स्नान करना चाहिए, और सभी प्रकार के प्रायश्चित करने के बाद ही देवी पूजा अपनानी चाहिए और जीवन भर के लिए यह संकल्प लेना चाहिए कि आयंदा किसी भी स्त्री के प्रति अनादर या असम्मान का किंचित मात्र भी भाव नहीं रखेंगे।

स्त्री विरोधियों को न सिर्फ दैवी बल्कि किसी भी देवता के पूजन का अधिकार भी नहीं है क्योंकि प्रत्येक देव के साथ देवी का शाश्वत संबंध है और ऎसे में स्त्री का अनादर देवों को भी प्रिय नहीं होता। आजकल स्ति्रयों का अनादर करने वाले खूब सारे लोग अपने आपको महान दैवी भक्त और सिद्ध माने हुए हैं जबकि ऎसे लोगों से दैवी हमेशा कुपित रहती है। व्यक्तिगत साधना और ईश्वरीय चिंतन में तीव्रता के लिए भी स्त्री यानि की शक्ति का आदर सर्वश्रेष्ठ उत्प्रेरक ही है, ऎसा महापुरुषों का अनुभव भी है। दैवी साधना न भी हो पाए, तब भी स्त्री के प्रति सम्मान का भाव अपने आप में शक्ति उपासना का अंग है। यही सत्य है।

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