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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

18 57 के भारत के पहले स्वाधीनता संग्राम के वीर बलिदानी बख्तावर सिंह

मुकेश मोलवा

मालवा की धीर, वीर और रत्नगर्भा धरती की तासिर है जिसने शूरवीर योद्धाओं को जन्म दिया ऐसे ही शूरनायक बख्तावर सिंह भी हुए जिनका जन्म मालवा में हुआ। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महती भूमिका अदा करने के कारण यह योद्धा पहचाना गया।
विक्रम के शौर्य की जननी मालवा की माटी जहां भोज की महानता के अक्षुण्ण चिन्ह गर्वित हो महाकाल की स्तुति कर सनातन का दम्भ भरते है, कालिदास के मेघदूत से रघुवंश के मर्यादित आचरण में सिमटते अभिज्ञान शाकुंतलम के भरत जब सिंघो के दांत गिनकर अटखेलिया करते है तो कभी क्षिप्रा दानवीर कर्ण का मुक्तिधाम हो जाती है, वीर दुर्गादास राठौड़ जीवन के अंतिम क्षण जहां महाकाल की आराधना कर बीता दिया करते है तो कभी मुंज सरोवर के सुमन कालिका को अर्पित हो जाया करते है।
अवंतिका उत्कर्ष की कथा कहती है तो धारा उसका अनुमोदन करती है इंदुर ने अहिल्या के पराक्रम को पाला है तो कभी बलिदान का वह दृश्य भी देखा जब स्वयं काल भी नतमस्तक हो गए, काल के गर्भ में पलता इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय 1857 के स्वर्णिम पृष्ठ में अमझेरा रियासत को वन्दनीय कर देता है, जब भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बंगाल के बरहमपुर में बजा। उत्तरप्रदेश के मेरठ में शंखनाद हुआ तो क्रांति के इस हवन में मालवा की अमझेरा रियासत के राजा बख्तावरसिंह ने समिधा होना तय कर अधिष्ठात्री माँ अमका झमका को कहा- हे माँ मुझे परतंत्रता की बेड़ियों को काटने और हथकड़ियों को तोड़ने का बल प्रदान कर घोर दिगमूढता की घड़ी में साहस का एक ऐसा दीप जला जो तमतोम का नाश कर सके।
महादेव की सौगंध फिरंगी बख्तावरसिंह की तलवार के वार नही सहन कर पाएंगे..हर हर महादेव.. वीर बख्तावरसिंह जिनका जन्म 14 दिसम्बर 1824 को हुआ और 1831 को शासन सम्भालना पड़ा और सुशासन की देशभक्त चिंगारी 1857 में शोला बन चुकी थी।
माँ नागणेच्या की आराधना में जब कुछ मांगा तो बख्तावरसिंह ने भारतमाता की स्वतंत्रता ही मांगी…भोपावर स्थित अंग्रजो की छावनी को मात्र तीन घन्टे में जलाकर राख कर देने के पश्चात माही के तट पर झिरणेश्वर महादेव का अभिषेक करने वाले उस योद्धा ने मानपुर की फिरंगी छावनी को आग के हवाले कर माँ आशापुरा के चरणों मे विनत होकर मंडलेश्वर की ओर कूच किया।
जहां स्वयं माँ नर्मदा अपने लाड़ले की प्रतीक्षा में हिलोरे मार रही थी.. ईस्ट इंडिया कम्पनी की छावनी को भस्मीभूत कर वीर बख्तावरसिंह ने राजराजेश्वर के समक्ष महामृत्युंजय का जाप किया। अपने घोड़ो को ऐड देकर जब वह शूरवीर अपने सिपहसालार के साथ अमझेरा में प्रविष्ट होता उसके पूर्व गुप्तचर ने सूचना दी कि अमझेरा को फिरंगियों ने नजरबंद कर लिया है।
वह महाबली विंध्य की तराई में अपने गुप्त किले लालगढ़ में जाकर आगे की रणनीति बनाता है। एक ही जूनून एक ही जज़्बा एक ही लक्ष्य एक ही ध्येय भारत की आजादी किंतु नियति के आगे सब धरा का धरा ही रह जाने वाला था।
तत्कालीन गद्दार रजवाड़ो ने अंग्रेजों की खूब सहायता कर बदले में उपहार स्वरूप अनेक जागीर प्राप्त की और उनके षडयंत्र के शिकार बख्तावर सिंह जी हुए।जब उन्हें महू में वार्ता के लिए बुलाकर कैद कर लिया गया। उन पर राजद्रोह का झूठा मुकदमा दायर कर असीरगढ़ के किले में कैद कर दिया गया पर फिरंगी शासक बख्तावरसिंह जैसे जगदम्बा के सिंह सपूत को लेकर भयभीत थे अतः 10 फरवरी 1858 को इंदौर के एमवाय हॉस्पिटल अवस्थित नीम के पेड़ पर प्रातः 9 बजे उस महावीर को फांसी दी जाने लगी तब एक चमत्कारी घटना ने फिरंगी अधिकारियों के रोंगटे खड़े कर दिए। अंग्रेज थर्राने लगे…जल्लाद के होंठ फड़फड़ा उठे, अचानक फांसी का फंदा टूट जाने ने ब्रिटिश कर्मचारी हक्के बक्के रह गए,नियमो की अनदेखी की गई, उस क्रांति के पुजारी को पुनः फांसी पर चढ़ाया गया और उस वीर ने बलिदान की परंपरा का आगे बढ़कर सत्कार किया। स्वयं फंदा अपने हाथों से पहना ज्यो फूलों की माला हो और हर हर महादेव बोलकर अनन्त की यात्रा पर चला गया। 1857 की क्रांति का यह अजेय योद्धा आज भी पहचान की प्रतीक्षा में है।

लिपटकर मातृभूमि ने जब बख्तावर सोया होगा
तब इस मालव माटी का हर एक कण रोया होगा।

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