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आतंकवाद

मौलानाओं की मनमर्जी चले तो पाकिस्तान में नहीं बचेगा एक भी मुसलमान

मिलिंद

‘पाकिस्तान’ में जब ‘अहमदियों’ को ‘गैर-मुस्लिम’ करार दिये जाने की बात चल रही थी तब इसे सरकारी रूप से स्वीकृति देने के लिए उस समय की हुकूमत ने एक ‘कमीशन’ बनाया। कमीशन का नाम दिया गया- “मुनीर कमीशन”
इस ‘कमीशन’ ने जब अपनी रिपोर्ट सौंपी तो उस रिपोर्ट में उसने लिखा कि “इस्लाम के अलग-अलग फ़िरके के सारे मौलानाओं की परिभाषाओं को अगर सही माना जाए तो ‘पाकिस्तान’ में एक भी ‘मुसलमान’ नहीं बचेगा। वो इसलिए क्योंकि हरेक फ़िरके के मौलानाओं ने अपने अलावा तमाम दूसरे फ़िरके वाले को ‘काफ़िर’ और ‘मुरतद’ (दीन से खारिज़) करार दिया हुआ है”।
‘मुनीर कमीशन’ की ये रिपोर्ट एक तरह से ‘इस्लाम’ के अंदर की फिर्काबंदी की रिपोर्ट भी है और ये बात सच है कि कई बार तो एक फ़िरके ने दूसरे फ़िरके को न सिर्फ ‘काफ़िर’ और ‘मुरतद’ घोषित किया बल्कि उनको ‘बाजिबुल- क़त्ल’ भी घोषित किया है और इन द्वेषों ने चलते ‘इस्लामिक जगत’ में शियाओं, खारजियों, नेचरी आदि और सबसे अधिक ‘अहमदी मुस्लिमों’ के कत्लेमान, उनके साथ लूटपाट, भेदभाव, उनकी बेटियों के साथ बदसलूकी का लंबा इतिहास है।
पर क्या आपने कभी सुना है कि इनमें से कोई भी अपनी बदहाली के लिए कभी अपने ‘मज़हब’ या उसकी तालीम को जिम्मेदार मानता है? क्या कभी सुना है इनमें से कोई कहता हो कि ‘इस्लामिक व्यवस्था’ उसके इस दुर्भाग्य का जिम्मेदार है?
कभी नहीं सुना होगा बल्कि अकीदे की पुख्तगी में शिया और अहमदी तो सबसे आगे रहने की कोशिश करते हैं।
अब थोड़ा आगे चलते हैं………..
‘मध्यपूर्व’ के देशों में इतनी मारधाड़ हुई। ‘कुवैत’ और ‘ईराक’ का झगड़ा हुआ, ‘अरब’ और ‘यमन’ का झगड़ा हुआ, ‘ईरान’ और ‘अरब जगत’ का टकराव आपको पता ही हैं। ‘सीरिया’ से लाखों मुस्लिम निर्वासित हुए, ‘यमन’ से हुए, ‘कुवैत’ से हुए पर निर्वासन के बाद वो जहाँ भी गए अपने ‘दीन’ के साथ और भी पुख्तगी से जुड़ गए। उनके जेहन में रत्ती भर भी ये ख्याल नहीं आया कि उनके साथ हुई ज्यादती का जिम्मेदार उनका “मज़हबी अकीदा” है और इसलिए उन्हें अपना मज़हब छोड़ देना चाहिए।
अब इसके बरअक्स अपने यहाँ क्या है?
आप आये दिन देखते हैं कि हमारे यहाँ के कथित नीची जाति के लोग और कई बार तो कुछ तो कथित ऊँची जाति के समझे जाने वाले लोग भी अपनी बदहाली का कारण ‘हिन्दू धर्म’ और ‘हिन्दू धर्म’ की व्यवस्था को मानते हैं और इसलिए हमलोग आये दिन अखबार में ख़बरें पढ़ते हैं कि आज इसने धमकी दी कि वो हिंदूवादी व्यवस्था से बाहर निकलकर कोई और धर्म चुनेगा तो किसी ने कहा कि हम हिंदूवादी व्यवस्था के कारण पीड़ित और संतप्त हैं। फूले और पेरियार इसलिए हमारे यहाँ ही सबसे अधिक हुए।
गरीब हर मज़हब में है पर ‘ईसाई’ केवल ‘हिन्दू’ ही बनता है इसके पीछे भी कारण यही है। चाहे वो ‘शिया’ हो, ‘अहमदी’ हो या जो भी पीड़ित, संतप्त ‘मुस्लिम’ है उसे ये लगता है कि हमारा मज़हब गलत न तो है और न ही हो सकता है। गलती हमारे मज़हब में नहीं है बल्कि गलत हम पर अत्याचार करने वाला कानून, या इंसान, या व्यवस्था है……..और इसलिए वो अपने मज़हब पर पूरी पुख्तगी से जमा हुआ रहता है भले उसका क़त्ल हो जाये, उसकी बेटी लूट जाये या उसके साथ जो कुछ भी अघटन घटित भी हो जाये।
हमारे यहाँ वाले हमेशा अपने दुर्भाग्य का कारण ‘हिन्दू धर्म’ को मानते हैं इसका कारण ये है कि हमने उनके अंदर कभी ये बोध ही पैदा नहीं किया कि हिंदुत्व के “ठेकेदार”, हिंदुत्व के “स्टेक-होल्डर” कोई ब्राह्मण, ठाकुर, भूमिहार, लाला या बनिया नहीं है बल्कि इस हिन्दू धर्म के पूरे के पूरे हिस्से से ‘स्टेक होल्डर’ तुम भी नहीं बल्कि तुम ही हो। अगर तुम्हारे साथ कुछ अन्याय, अनाचार, अश्पृश्यता हो रहा है तो वो ‘हिन्दू धर्म’ की गलती नहीं है बल्कि वो ‘हिन्दू समाज’ का दोष है जो चीजों की मनमानी व्याख्या कर रहा है और इसके लिए तुमको अपनी बदहाली के लिए हिन्दू धर्म को जिम्मेदार नहीं मानना है।
इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि हमें कम से कम अब अपने धर्म के अंदर यह व्यवस्था पैदा करना है कि हममें से हरेक को ये लगे कि हिन्दू धर्म उसका ही है और इसके नाम पर कोई भी अश्पृश्यता का, या छुआछूत का या किसी भी तरह का कोई जन्मना श्रेष्ठता का कोई बोध पालता है तो गलत वो है हिन्दू धर्म नहीं।
‘इस्लाम’ के अंदर की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती ये है कि उसने अपने मानने वालों में ये बोध बड़ी सफलता से पैदा कर दिया कि तुम….और केवल तुम इस्लाम के अकेले के “स्टेक होल्डर” हो और कोई भी इसकी गलत व्याख्या करके तुमको इससे बाहर नहीं कर सकता।
‘गुरुदत्त’ ने अपने ‘उपन्यास’ ‘अस्ताचल की ओर’ की भूमिका में एक जगह लिखा है –
“अशोक के काल को शांति का काल कहा जाता है परंतु वह काल जनमानस में बुद्धि-विहीनता का काल भी था। उस काल में बौद्ध भिक्षुओं और विहारों के महाप्रभुओं की तूती बोलती थी। दूसरी ओर ‘समुद्रगुप्त’ के काल में अनपढ़ रुढ़िवादी लोगों का बोलबाला था। परिणाम में दोनों काल देश और समाज को पतन की ओर द्रुतगति से ले जाने वाले सिद्ध हुए थे।”
गुरुदत्त जो लिख रहे हैं, उस गलती को इस्लाम नहीं करता इसलिए उसके यहाँ आज तक आप अंगुली पर गिने जाने लायक नाम ही खोज पाएंगे तो उसकी व्यवस्था से खिन्न हुए बाकी सब इस दावे के साथ जीते हैं कि “दीन” केवल उनका है जो सौ फीसद सही है……..बाकी लोग गलत हो सकते हैं।
गुरुदत्त के उपरोक्त कथन का सार-संक्षेपण और हमारे लिए लर्निंग लेशन ये है कि अब वक़्त आ गया कि हम हिंदुत्व की ठेकेदारी किसी एक या कुछ को न देकर अपने दावे छोड़ें और सबको कहें कि ये हिन्दू धर्म मेरा है तो तुम्हारा भी है और इसके ठेकेदार तुम भी हो…और उतने ही हो जितने हम हैं……हिन्दू धर्म के नाम पर की गई गलत व्याख्याओं को तुम बेशक नकारो पर हिन्दू धर्म को नहीं……
सीधे अर्थों में ये कि जिस दिन हमने हिन्दू के सभी वर्ग में ये बोध करा दिया कि हिन्दू धर्म के भले-बुरे के अकेले के “स्टेक- होल्डर” केवल तुम हो और इसके रक्षण और संवर्धन तुम्हारा कर्तव्य है…..हमारी समस्याओं का निराकरण हो जायेगा।
हाँ, इसके कारण आंतरिक रूप से भले हममें कुछ संघर्ष हो जायेगा पर बाहरियों के लिए फिर “हिंदुत्व” का किला हमेशा के लिए अभेद हो जायेगा।

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