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आज का चिंतन

“अपने जन्मदिवस और विवाह-वर्षगांठ आदि अवसरों पर सबको परोपकार-कर्म यज्ञ करना चाहिये” ========

ओ३म्

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वर्तमान समय में जन्म दिवस एवं विवाह की वर्षगांठ धूमधाम से मनाने का प्रचलन काफी अधिक हुआ है। ग्रामीण अंचलों में शायद यह कम होगा, परन्तु नगरों में यह प्रायः सभी परिवारों में मनाया व आयोजित किया जाता है। फेसबुक आदि पर भी बहुत से लोग इस अवसर पर अपने मित्रों व परिचितों को बधाईयां व शुभकामनायें आदि देते दिखाई देते हैं। जन्म दिन सहित विवाह की वर्षगांठ आदि सभी अवसरों को मनाते हुए मनुष्य को अग्निहोत्र यज्ञ अवश्य करना चाहिये। यदि ऐसा करेंगे तो इन दिवसों को मनाना सार्थक होगा।यदि जन्म दिवस आदि अवसरों पर यज्ञ नहीं करेंगे तो यज्ञ न किये जाने से एक कमी बनी रहेगी और अग्निहोत्र यज्ञ से जो लाभ होते हैं, उनसे मनुष्य वंचित हो जायेगा। यज्ञ से होने वाले लाभ न होना ही मनुष्य की हानि है। अतः हमें यज्ञ को जानना चाहिये।

यज्ञ में हम ईश्वर के दिए ज्ञान वेद के मन्त्रों से ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना करते हैं। वेदमन्त्रों के गान, पठन तथा उसके अर्थों पर विचार व चिन्तन से अधिक उत्तम ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना नहीं हो सकती, ऐसा हम समझते हैं। उदाहरण के लिए हम स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना के आठ मन्त्रों को प्रस्तुत कर सकते हैं। स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना का प्रथम मन्त्र बानगी के रूप में यहां प्रस्तुत करते हैं। मन्त्र है ‘‘ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद्भद्रं तन्न आसुव।।” मन्त्र का ऋषि दयानन्द जी का किया हुआ अर्थ है ‘हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता, समग्र ऐश्वर्ययुक्त, शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर! आप कृपा करके हमारे समस्त दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों को दूर कर दीजिए और जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव और पदार्थ है, वह सब हमको प्राप्त कीजिए।” इसी प्रकार से अन्य सात मन्त्रों से भी स्तुति, प्रार्थना व उपासना करने से ईश्वर से मेल, संगति, ज्ञानप्राप्ति व ज्ञानवृद्धि तथा स्तोता के गुण, कर्म व स्वभाव में सुधार होता है। ईश्वर हमारे दोषों को दूर करते हैं तथा हमें सद्गुणों से युक्त करते हैं। हमारा सर्वविध कल्याण होता है। परमात्मा से हमारा मित्र व बन्धु सहित माता व पिता का सम्बन्ध है, जो अधिक सार्थक व सुखद होता व बनता है। अतः ईश्वर की नित्य स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना करने सहित अग्निहोत्र यज्ञ करने का विधान है। सभी को यज्ञ कर्म सहित उपासना कर्म को नित्य व जीवन के प्रमुख अवसरों पर अवश्य करना चाहिये।

मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता ज्ञान है। सत्य एवं शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति वेद एवं वैदिक साहित्य के अध्ययन से प्राप्त होती है। यदि हम जन्म दिवस आदि अवसरों पर अपने गृहों पर यज्ञ का आयोजन करेंगे तो इससे हमें वेदों के स्वाध्याय की प्रेरणा मिलेगी और इस प्रेरणा का परिणाम हमारे अज्ञान का नाश तथा ज्ञान व गुणों की वृद्धि होगा। यज्ञ करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य एवं धर्म है। कर्तव्य व धर्म इसलिये है कि यज्ञ करने से वायु, जल, अन्न तथा पर्यावरण के दोषों का निवारण होता है और हमें शुद्ध वायु, जल तथा अन्न आदि की प्राप्ति होती है। अग्निहोत्र यज्ञ में जिन गोघृत व ओषधीय पदार्थों की आहुति दी जाती हैं वह अग्नि में जलने से सूक्ष्म होकर आकाशस्थ वायु में चहुंओर फैल जाते हैं जिससे वायु के प्रायः सभी दोष दूर होकर वायु शुद्ध व लाभप्रद बनती है। इससे हमारे हृदय व फेफड़ों में शुद्ध वायु पहुंचने से हम स्वस्थ रहते हैं। रोगों का आक्रमण कम होता है। हम सुखों का अनुभव करते हैं तथा हमारी आयु वृद्धि होती है।

वायु की शुद्धि से वर्षा जल की भी शुद्धि होती है और शुद्ध वायु तथा शुद्ध वर्षा जल से खेतों में शुद्ध अन्न उत्पन्न होता है। इस प्रकार गृहस्थियों द्वारा यज्ञ करने से यज्ञ करने वाले तथा यज्ञ के निकटवर्ती लोगों को लाभ होता है। यज्ञ से जो जो लोग लाभान्वित होते हैं उसका पुण्य व लाभ यज्ञकर्ता मनुष्य को परमात्मा अपने विधान से देता है। यज्ञ करने वाले मनुष्य को सुख की प्राप्ति होती है। वह रोगों से मुक्त रहकर स्वस्थ जीवन व्यतीत करते हैं। धर्म उसी को कहते हैं जिससे धर्म करने वाले तथा उसके सम्पर्क में आने वाले सभी मनुष्यों को सुख प्राप्त हो। यज्ञ से क्योंकि सभी मनुष्यों व प्राणियों को सुख प्राप्त होता है, अतः यज्ञ करना धर्म सिद्ध होता है। धर्म विषयक यह भी सत्य सिद्धान्त है कि जो मनुष्य धर्म के काम करता है अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म भी उसकी रक्षा करता है। जो धर्म की रक्षा नहीं करता, धर्म भी उसकी रक्षा नहीं करता। मनुष्य को इसका विचार करना चाहिये और धर्म में प्रवृत्त होना चाहिये अन्यथा ऐसा भी हो सकता है कि धर्म के कार्यों को न करने के कारण मनुष्य उसके परिणामस्वरूप अनेक प्रकार की हानियों को प्राप्त हो सकता है जिसका उसे ज्ञान ही नहीं होता। हमें जीवन में जो दुःख प्राप्त होते हैं, उसका कारण व आधार हमारे सत् व असत् कर्म ही हुआ करते हैं। सत् कर्म धर्म तथा असत् कर्म अधर्म हुआ करते हैं। अतः यज्ञ से जुड़ कर और वैदिक साहित्य यथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का स्वाध्याय कर हमें धर्म का ज्ञान व धर्म कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। यदि हम अपने जन्म दिवस व विवाह वर्षगांठ आदि के अवसरों पर अग्निहोत्र यज्ञ आदि परोपकार के कार्य करेंगे तो निश्चय ही हमें सुख व कल्याण की प्राप्ति होगी। हमारे परिवार व मित्र भी हमसे प्रभावित व लाभान्वित होंगे और इससे भी हमें पुण्य व सुखों की प्राप्ति होगी। अतः हमें अपने जन्म दिवस आदि अवसरों पर अग्निहोत्र यज्ञ अवश्य ही करना चाहिये।

वैदिक धर्म में विधान है कि सभी गृहस्थियों को प्रतिदिन प्रातः व सायं अपने घरों में यज्ञ करना चाहिये। यज्ञ करने से घर के भीतर की वायु गर्म होकर ऊंचे रोशनदानों, खिड़कियों व दरवाजों से बाहर चली जाती है तथा बाहर की शुद्ध वायु भीतर आती है। यज्ञ के धूम से रोग किटाणुओं का नाश होता है। शरीरस्थ कीटाणु भी यज्ञ करने से दूर हो जाते और रोगी मनुष्य स्वस्थ होते हैं। यह सब विज्ञान सम्मत कार्य व क्रियायें हैं जिन्हें सभी शिक्षित बन्धुओं को समझना व करना चाहिये। वैदिक साहित्य का अध्ययन करने पर इन तथ्यों का ज्ञान होता है।

जब हम प्राचीन साहित्य रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं तो हमें विदित होता है कि हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि, राम तथा कृष्ण आदि महापुरुष अग्निहोत्र यज्ञ किया करते थे। प्राचीन काल में गुरु व आचार्य अपने शिष्यों द्वारा उन्हें समिधायें प्रदान करने पर प्रसन्न होते थे अतः जब भी कोई शिष्य या मनुष्य किसी आचार्य के पास जाता था तो वह अपने साथ यज्ञ की समिधायें लेकर जाता था। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राचीन काल में यज्ञ का कितना महत्व था और किस मात्रा वा संख्या में यज्ञ किये जाते होंगे? महाभारत काल के बाद वैदिक संस्कृति व परम्पराओं के पोषक आचार्य चाणक्य तथा ऋषि दयानन्द जी आदि सभी यज्ञों के पोषक थे। महाभारत के बाद यज्ञों की क्रियाओं में विकृतियां आ गई थी जिसके परिणामस्वरूप अहिंसा पर आधारित बौद्ध एवं जैन मतों की स्थापना हुई थी। इन सब विकृतियों को ऋषि दयानन्द ने अपने अतुल वैदुष्य, वेदों के ज्ञान तथा विवेक बुद्धि से दूर किया था और यज्ञ से सभी प्रकार की हिसा को दूर कर इन्हें पूर्ण अहिंसक व विज्ञानसंम्मत कृत्य बनाया था। ऋषि दयानन्द जी ने यज्ञ की विधि तथा सोलह संस्कारों की पुस्तक भी हमें प्रदान की है। ऋषि दयानन्द के साहित्य को पढ़कर हम यज्ञ का सत्यस्वरूप जान सकते हैं और इससे लाभान्वित भी हो सकते हैं।

जन्मदिवस तथा विवाह की वर्षगांठ पर परिवारों में अग्निहोत्र-यज्ञ एवं परोपकार के कार्य अवश्य होने चाहियें। जो बन्धु यज्ञ करना जानते हैं, वह स्वयं भी विधि पूर्वक यज्ञ कर सकते हैं। जो बन्धु यज्ञ करना नहीं जानते उन्हें चाहिये कि वह आर्यसमाज के पुरोहित जी को बुलाकर यज्ञ करवा लें। वैदिक विधि से किये जाने वाले यज्ञ में अनावश्यक पदार्थ क्रय नहीं करने पड़ते। मात्र घृत, समिधा तथा ओषधियुक्त हवन सामग्री से हवनकुण्ड में यज्ञ हो जाता है। अगर व्यय की दृष्टि से देंखे तो यज्ञ में 200 ग्राम घृत जिसका मूल्य 100 रुपये होता है तथा हवन सामग्री का मूल्य 50 रुपये में यज्ञ हो जाता है। यज्ञ में आवश्यक शेष वस्तुएं एवं पदार्थ सभी गृहस्थियों में उपलब्ध होते हैं। इनके अतिरिक्त पुरोहित जी को उचित दक्षिणा देनी होती है जो यजमान की सामर्थ्य वा देश, काल व परिस्थिति के अनुरूप दी जानी चाहिये। यज्ञ को पुण्यकारी श्रेष्ठतम कर्म कहा जाता है। यज्ञ से जो पुण्य अर्जित होता है वह हमारे कर्म संचय में जमा हो जाता है जो वर्तमान, कालान्तर तथा परजन्म में हम सबको अनेक प्रकार के सुख व लाभ देता है। दर्शन ग्रन्थ सहित आर्यसाहित्य को पढ़कर इस विषय में आश्वस्त हुआ जा सकता है। हम यहां यह अवश्य कहना चाहते हैं कि हमें यह मानव जन्म हमारे पूर्वजन्मों के कर्मों, जो सत्य व पुण्य पर आधारित थे, प्राप्त हुआ है। यज्ञ आदि पुण्य कर्मों को करने से हमारा वर्तमान, भावी जीवन तथा परजन्म अवश्य ही उन्नत व सुखदायक बन सकते हंै। अतः हमें ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए योगियो तथा धर्म-कर्म के मर्मज्ञ विद्वानों व आचार्यों की बातों पर विश्वास कर अपनी दिनचर्या बनानी चाहिये। इससे हमें सुख व कल्याण प्राप्त होगा और भविष्य व परजन्म में इस बात का क्लेश व दुःख नहीं होगा कि हमने शुभ, पुण्य, यज्ञीय कर्म आदि नहीं किये थे। अतः जन्म दिवस तथा विवाह की वर्षगांठ आदि अवसरों पर सब मनुष्यों को यज्ञ अवश्य करना चाहिये। हम स्वयं भी यज्ञ करें और अपने मित्र समुदाय को भी ऐसा करने को कहें जिससे समाज से असत्य तथा हिंसा आदि की दुष्प्रवृत्तियां दूर होकर सुख व शान्ति का वातावरण उत्पन्न हो। हम यह भी बता दें कि यज्ञ करना किसी एक समुदाय या मत के लोगों के लिए ही अभीष्ट नहीं है अपितु इसे मानवमात्र को करना चाहिये। यह ध्यान रहे कि समस्त संसार व ब्रह्माण्ड में ईश्वर केवल एक ही है और वह सब प्राणियों को जन्म व मृत्यु का दाता तथा न्यायकारी है। हमारे कर्मों के आधार पर ही हमें भविष्य व परजन्म में जन्म व सुख व दुःख प्राप्त होंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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