डाॅ. राजेन्द्र अवस्थी युवाओं की प्रेरणा और बड़े-बूढ़ों की लाठी थे : डाॅ. सरोजनी प्रीतम

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ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के जबलपुर चैप्टर द्वारा आयोजित हुआ वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. राजेन्द्र अवस्थी की 92वीं जयंती के अवसर पर अतरराष्ट्रीय संगोष्ठी

25 जनवरी, 1932 को जबलपुर के ज्योतिनगर गढा क्षेत्र में जनमे डाॅ. राजेन्द्र अवस्थी हिन्दी के प्रख्यात पत्रकार और लेखक थे। वे नवभारत, सारिका, नंदन, साप्ताहिक हिन्दुस्तान और कादम्बिनी के सम्पादक रहे। उनके स्तंभ ‘काल-चिंतन’ को विश्व-ख्याति मिली थी। उन्होंने अनेक उपन्यासों, कहानियों एवं कविताओं की रचना की। वह ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी रहे। दिल्ली सरकार की हिन्दी अकादमी ने उन्हें 1997-98 में साहित्यिक कृति से सम्मानित किया था। साहित्यकार डाॅ. राजेन्द्र अवस्थी की साठ से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हैं। उपन्यास, कहानी, निबंध, यात्रा-वृत्तांत के साथ-साथ उनका एक दार्शनिक स्वरूप है, जो शायद ही किसी कथाकार में देखने को मिलता है। उनके उपन्यासों में ‘सूरज किरण की छाँव’, ‘जंगल के फूल’, ‘जाने कितनी आँखें’, ‘बीमार शहर’, ‘अकेली आवाज’ और ‘मछलीबाजार’ शामिल हैं। ‘मकड़ी के जाले’, ‘दो जोड़ी आँखें’, ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ और ‘उतरते ज्वार की सीपियाँ’, ‘एक औरत से इंटरव्यू’ और ‘दोस्तों की दुनिया’ उनके कविता-संग्रह हैं। उन्होंने ‘जंगल से शहर तक’ नाम से यात्रा-वृत्तांत भी लिखा है। वे विश्व-यात्री हैं। दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं, जहाँ अनेक बार वे न गए हों। उनका निधन 30 दिसंबर, 2009 को हुआ।

संगोष्ठी के प्रारंभ में जबलपुर के डाॅ. राजकुमार तिवारी सुमित्र ने डाॅ. अवस्थी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि
लिपिक के रूप में अपना लेखन शुरू करनेवाले अवस्थी जी के भीतर एक छटपटाहट थी। फिर वे सम्पादन में आए और उन्हें वहाँ कुछ सन्तुष्टि महसूस हुई। अपने सम्पादनकाल में उन्होंने देश-विदेश के लेखकों को प्रोत्साहित किया। उनका काल-चिंतन पाठकों और विद्वानों को खूब पसंद आया।

जबलपुर के युवा कवि दीपक तिवारी ‘दीपक’ ने उनकी कविता ‘पावस ऋतु’ का पाठ किया : ‘ओ पावस के पहले बदल/तुम धोने आये मटमल अम्बर का मटमैला आँचल/तुम रोते हो पागल/धरती में जब मुस्कानें फूट रहीं।’

हैदराबाद की वरिष्ठ लेखिका और अवस्थी जी की साहित्यिक यात्रा की पथिक डाॅ. अहिल्या मिश्र ने उनके संगठनकर्ता रूप और नव लेखकों को प्रोत्साहित करनेवाले अभिभावक लेखक के रूप में उन्हें याद किया।

सेन्ट एन्स कॉलेज फाॅर वुमन, मेंहदीपट्टनम, हैदराबाद की हिन्दी-विभाग की अध्यक्ष और  लेखिका डॉ. अर्चना झा ने उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को रेखांकित करते हुए कहा कि बाजारवाद के बावजूद उन्होंने साहित्यिक पत्रकारिता में नए कीर्तिमान् बनाए। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से आंचलिकता में आधुनिकता को उतारा है। उनमें मनुष्यत्व भी था और देवत्व भी। उनका लेखन तमाम विशेषणों से परे रहा है।

‘कादम्बिनी’ पत्रिका में राजेंद्र अवस्थी के सहकर्मी रहे सुजीत वाजपेयी ने कहा कि मैं उनके कॉलम ‘काल-चिंतन’ का पहला श्रोता हुआ करता था। कार्यालय से बाहर उनसे बड़ा मित्र नहीं हो सकता। वे नवोदित रचनाकारों को प्रेरित करते थे, प्रश्रय देते रहे।

नाॅर्वे के प्रवासी भारतीय लेखक डाॅ. सुरेशचंद्र शुक्ल ने अनेक संस्मरणों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश या फिर उत्तर प्रदेश दोनों में से किसी भी सरकार को यह प्रस्ताव देना चाहिए कि देश के प्रतिष्ठित लेखक डाॅ. राजेंद्र अवस्थी के नाम साहित्यकारों को प्रतिवर्ष पुरस्कार प्रदान किया जाए।

जबलपुर के वरिष्ठ साहित्यकार आचार्य भगवत दुबे ने उनके लेखन और चिंतन में निहित दार्शनिक पक्ष को उद्घाटित किया। उन्होंने कहा कि वे संस्कारधानी जबलपुर के जीवंत संस्कार थे।

डिबाई, उत्तर प्रदेश की वरिष्ठ लेखिका डाॅ. रजनी सिंह ने कहा कि वे एक कुशल सम्पादक थे, जिनके मार्गदर्शन में तीस वर्षों तक ‘कादम्बिनी’ फलती-फूलती रही। उन्होंने सम्पादकत्व, पत्रकारिता और व्यक्तिगत मानवीय सम्बन्धों को जीवित रखा।

जबलपुर के वरिष्ठ मनीषी विद्वान् आचार्य कृष्णकान्त चतुर्वेदी ने अपने उद्बोधन में अवस्थी जी के प्रारम्भिक लेखन का उल्लेख करते हुए, उनके विभिन्न लेखकीय पड़ाव की चर्चा की। उन्होंने कहा कि सर्जनशीलता और निर्भीकता दोनों ही उनके लेखन में बाल्यावस्था से ही मुखरित होती दिखाई पड़ती है। ‘जो अभी तक नहीं कहा गया’ उस दृष्टि से राजेन्द्र अवस्थी जी को पाठ करने की आवश्यकता है।

राजलक्ष्मी कृष्णम ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय देते हुए उनके पत्रकारीय जीवन की चर्चा की और उनकी पत्रकारिता को बहुत जीवंत बतलाया।

महासमुंद, छत्तीसगढ़ की वरिष्ठ लेखिका प्रो. अनसूया अग्रवाल ने कहा कि अवस्थी जी का लेखन उनके सम्पादकत्व के चलते कहीं टूटा नहीं, बल्कि विभिन्न धाराओं में उनका लेखन चलता रहा। वे दोनों ही भूमिकाओं में उत्कृष्ट रहे। उनको भ्रमण का बहुत शौक था। उनकी जीवन-दृष्टि इसी भ्रमण से आती है। घूमन्तु प्रवृत्ति के चलते वे बस्तर पहुँचे और वहीं से उनके आंचलिक लेखन की शुरुआत होती है। उनके लेखन में आदिवासी विमर्श है और ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म-परिवर्तन कराने की चालबाजी को उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से अनैतिक कर्म बताया।

जबलपुर की डाॅ. नीना उपाध्याय ने कहा कि राजेन्द्र अवस्थी जी को हिन्दी-साहित्य का एकमात्र विशिष्ट यायावर कहा जाता है। उन्होंने विश्व में लगभग अधिकांश देशों की यात्रा की। उन्हें ‘राहुल सांकृत्यायन विश्व यात्री सम्मान’ भी प्राप्त हुआ।

वरिष्ठ कवि और समाजशास्त्री डाॅ. श्याम सिंह शशि ने अपने सुदीर्घ सम्बन्धों का उल्लेख करते हुए कहा कि मेरा पहला परिचय उनसे यायावरी रूप में ही हुआ। मेरे लेखन में सीधे तौर पर एक मित्र के रूप में उनका योगदान अद्भुत रहा। डाॅ. शशि ने कहा कि चूँकि उनका जन्मस्थान जबलपुर है, इहलिए मध्य प्रदेश सरकार को उनके नाम से एक पुरस्कार प्रारंभ करना चाहिए और साथ ही उनका एक सम्पूर्ण वाङ्गमय भी प्रकाशित करना चाहिए।

वरिष्ठ कवयित्री डाॅ. सरोजनी प्रीतम अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में पुरानी स्मृतियों को याद कर भावुक हो गईं और अवस्थी जी के साथ की देश-विदेश की लम्बी साहित्यिक यात्राओं की चर्चा की। उन्होंने कहा कि अवस्थी जी युवाओं की प्रेरणा और बड़े-बूढ़ों की लाठी थे। आज ऐसा लग रहा था कि बस आप सबको सुनते जाएँ। आज इस कार्यक्रम के माध्यम से पुराने स्मृतियों को जीने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि सरकारें चाहे जो भी व्यवस्था करे, अवस्थी जी के लिए उनके पाठक ही उनका पुरस्कार हैं।

ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के महासचिव और अवस्थी जी के सुपुत्र डाॅ. शिवशंकर अवस्थी ने कहा कि पुत्र होने के नाते मैं अधिक भावुक हो गया हूँ। इस कार्यक्रम के माध्यम से उनका सामूहिक रूप आप सबमें नजर आ रहा है। ऐसा लगता है, वे हमारे आस-पास हैं और कहीं से अचानक चले आएँगे।
संगोष्ठी का संचालन डाॅ. उषा दुबे ने किया डाॅ. शिवशंकर अवस्थी ने सबका धन्यवाद ज्ञापन किया। आयोजन में डाॅ. सुदेश भाटिया, डाॅ. हरिसिंह पाल, डाॅ. मुकेश अग्रवाल, डाॅ. विजय शंकर मिश्र, संदीप शर्मा, डाॅ. ममता सिंह, चेतन बाछोतिया, अशोक अवस्थी, अंजलि अवस्थी,  डाॅ. अशोक कुमार ज्योति, डाॅ. आशा मिश्रा ‘मुक्ता’, मोनिका जायसवाल, भूपेन्द्र कुमार भगत, कल्पना पाल, वैशाली कोंडल, अमित यादव, डाॅ. नरेन्द्र परिहार, डाॅ. रेखा कक्कड़, डाॅ. प्रभा शर्मा, जयप्रकाश ‘विलक्षण’, प्रियंका सोलंकी सहित सौ से अधिक साहित्यकार-शोधार्थी उपस्थित थे।

1 thought on “डाॅ. राजेन्द्र अवस्थी युवाओं की प्रेरणा और बड़े-बूढ़ों की लाठी थे : डाॅ. सरोजनी प्रीतम

  1. नमस्कार महोदय,
    मैं राजेन्द्र अवस्थी जी के ऊपर शोध कर रही हूँ। मुझे उनके व्यक्तित्व एवं उनके रचनाओं पर जानकारी चाहिए। अवस्थी जी से संबंधित कुछ खास तथ्य मुझे अभी तक प्राप्त नहीं हो पा रहा है। कृपया मेरी सहायता करें। अगर आपके पास उनसे एवं उनके रचनाओं से संबंधित कुछ तथ्य अथवा पुस्तक उपलब्ध है तो कृपया मुझे प्राप्त कराएँ।

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