मंदिर को धुलाने का प्रसंग और अम्बेडकर की राह

– डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

              नीतिश कुमार को हटा कर जीतन राम माँझी बिहार के मुख्यमंत्री बने थे । वैसे वे लम्बे अरसे से राजनीति में हैं और गाहे बगाहे मंत्री इत्यादि भी बनते रहते हैं , लेकिन नरेन्द्र मोदी की आँधी के आगे जब नीतिश कुमार के लिये मुख्यमंत्री रह पाना संभव नहीं लगा तो उन्होंने  व्यवहारिक बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुये जीतन राम माँझी को अपने स्थान पर मुख्यमंत्री बनाया था । उस समय उन्हें माँझी ही निरापद लगे होंगे । लेकिन जैसा कि मोहन राकेश के नाटक आषाढ़ का एक दिन का एक पात्र कहता है कि योग्यता किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का एक चौथाई भाग ही होती है , बाक़ी पूर्ति राज्य सत्ता करती है । जीतन राम माँझी भी लगता है राज्य सत्ता के माध्यम से उसी की पूर्ति में लग गये हैं । अब योग्यता का अर्थ सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही हो सकता है । सकारात्मक रास्ता लम्बा होता है , लेकिन उसके लिये लम्बा समय भी दरकार है । जीतन राम माँझी के पास और सब कुछ हो सकता है लेकिन समय की ही कमी है , शायद इसलिये उन्होंने छोटा किन्तु नकारात्मक रास्ता चुना है ।

             वे पिछले दिनों मधुबनी ज़िला के राजनगर विधान सभा क्षेत्र के अन्तर्गत के एक गाँव अनराधारी में परमेश्वरी देवी के मंदिर में दर्शन हेतु गये थे । उस दिन जन्माष्टमी का दिन था । उसके बहुत दिनों बाद उन्होंने इस बात पर दुख प्रकट किया कि उनके जाने के बाद लोगों ने उस मंदिर को और वहाँ की देव मूर्तियों को इसलिये नहलाया गया क्योंकि माँझी के आने से वह अपवित्र हो गया था । सौभाग्य से मुख्यमंत्री के साथ मंदिर दर्शन के समय जदयू के ही ग्राम विकास मंत्री नीतिश मिश्र और विधान परिषद के सदस्य विनोद कुमार सिंह भी थे । उन दोनों ने अपने ही मुख्यमंत्री के इन आरोपों पर आश्चर्य ही प्रकट नहीं किया बल्कि इसका ज़ोरदार तरीक़े से खंडन भी किया । उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को किसी ने ग़लत सूचना दे दी होगी क्योंकि मंदिर में मूर्तियाँ ही नहीं हैं । मंदिर में पिंडी रुप में देवी की स्थापना है और वह भी मिट्टी की बनी हुई है जिसे नहलाया ही नहीं जा सकता । रही बात मंदिर को धोने की , मंदिर में प्रतिदिन दो बार फ़र्श धोया जाता है , लेकिन उस दिन मुख्यमंत्री के आने के कारण मंदिर में इतनी गहमागहमी थी कि उसे धोया ही नहीं जा सका ।

              तब मुख्यमंत्री ने कहा कि मुझे राज्य के खनन व भू विज्ञान मंत्री राम लखन राम रमन ने बताया था । मुख्यमंत्री ने ज़ोर  देकर कहा कि कि उनके जाने के बाद मंदिर व मूर्तियों को धोया ही गया है । अब यह अलग बात है कि जिय मंत्री का नाम जीतन राम माँझी ले रहे थे , वह उस दिन के कार्यक्रम में उनके साथ था ही नहीं । लेकिन बाद में रमन ने भी इस बात से किनारा कर लिया और उसने कहा कि मैंने मुख्यमंत्री से कभी ऐसा नहीं कहा । लेकिन माँझी ने एक बार जो स्टेंड ले लिया सो ले लिया । आख़िर मुख्यमंत्री ठहरे । और मुख्यमंत्री भी ऐसे जिनकी ताजपोशी नीतिश कुमार ने ख़ुद छाँट कर करी हो । माँझी ने कहा कि मैं कभी झूठ नहीं बोलता । लेकिन माँझी यह नहीं बता पाये कि मंदिर में जब मूर्तियाँ ही नहीं हैं तो आख़िर धोया किसे गया ?

              माँझी ने इस कांड की जाँच करवाने का निर्णय किया । सभी ने इसका स्वागत किया । सरकार ने दरभंगा मंडल के आयुक्त और आई.जी पुलिस को जाँच का काम सौंपा । अब कुछ दिन पहले इन दोनों ने भी लम्बी जाँच और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान कलमबन्द करने के उपरान्त अपनी रपट दे दी है । इस रपट के अनुसार मुख्यमंत्री द्वारा मंदिर पर लगाये गये आरोपों में कोई दम नहीं है और ये निराधार हैं । मिट्टी की पिंडी पर घी का लेखन होता है , उसे पानी से धोया नहीं जाता । इस रपट पर अभी तक जीतन राम माँझी चुप हैं , लेकिन इस पूरे प्रकरण से जो प्रश्न उठे हैं वे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं , जिन पर निश्चय ही विचार किया जाना चाहिये ।

                  अब जब यह पूरी तरह सिद्ध हो चुका है कि मंदिर को धोने का आरोप बिल्कुल बेबुनियाद है और माँझी ने यह आरोप भी मंदिर में जाने के लगभग एक मास से भी ज़्यादा समय बीत जाने पर लगाया है , तो प्रश्न पैदा होता है कि आख़िर माँझी यह सारा नाटक क्यों कर रहे हैं ? बाबा साहेब आम्बेडकर ने राम मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर बहुत बड़ा आन्दोलन छेड़ा था । महाराष्ट्र के उस मंदिर में उस समय दलितों को प्रवेश नहीं दिया जा रहा था । आम्बेडकर को उस आन्दोलन से कोई राजनैतिक लाभ नहीं होने वाला था , बल्कि शायद राजनैतिक दृष्टि से तो शायद उन को नुक़सान ही हो रहा था । लेकिन आम्बेडकर के लिये राजनैतिक लाभ की बजाय हिन्दू समाज की सामाजिकता समरसता ज़्यादा महत्वपूर्ण थी । उन्होंने हिन्दू समाज को उस आन्दोलन के माध्यम से बार बार झकझोरा था । लेकिन माँझी आज २०१४ में आम्बेडकर के दिखाये मार्ग के बिल्कुल विपरीत आचरण कर रहे हैं । आम्बेडकर समाज की भीतरी दरारें भरने के लिये अपने राजनैतिक हितों की बलि चढ़ा रहे थे और माँझी राजनैतिक हितों के लिये समाज में दरारें बनाने का काम जानबूझकर कर रहे हैं । वे जो कुछ कर रहे हैं , उससे उन्हें हो सकता है कुछ राजनैतिक लाभ मिल जाये लेकिन इससे सामाजिक समरसता में दरारें पड़ सकती हैं और ताज्जुब का विषय है कि यह काम मुख्यमंत्री ख़ुद कर रहे हैं । यदि माँझी के साथ सचमुच कुछ ऐसा हुआ होता तो निश्चय ही सारे हिन्दू समाज को एक साथ खड़े होकर उसका विरोध करना चाहिये था । मंदिर के पुजारी को या कुछ लोगों को इस प्रकार की समाज विरोध हरकतें करने का कोई अधिकार नहीं है । लेकिन यदि कोई व्यक्ति , चाहे वह मुख्यमंत्री ही क्यों न हो , अपने तुच्छ राजनैतिक हितों के लिये ऐसे समाज विरोधी कार्य में संलग्न होता है तो निश्चय ही उसके विरुद्ध भी कार्यवाही होनी चाहिये । जीतन राम माँझी अगले विधान सभा चुनावों को ध्यान में रखते हुये अपनी रणनीति बना रहे हैं लेकिन इसका आघात न जाने हिन्दू समाज को कितनी गहराई तक घायल करेगा । माँझी बाबा साहेब आम्बेडकर के दिखाये रास्ते को छोड़ कर उन लोगों के चंगुल में फँस रहे हैं जो राजनैतिक हितों के लिये कुछ भी करने को तैयार रहते हैं ।

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