अब मैं जो कहने जा रहा हूं…….

अभिरंजन कुमार

अमेरिका और अन्य प्रमुख पश्चिमी देशों को हम जितना गलिया लें, लेकिन उनके विज़न की दाद देनी पड़ेगी। वे बीस साल, पचास साल, सौ साल आगे की सोचकर काम करते हैं। हम लोग चार दिन आगे नहीं सोच पाते हैं। भारत जैसे मुल्क आज भी उनके हाथों के खिलौने भर हैं। हम सब रंगमंच की वो कठपुतलियां हैं, जिनकी डोर अमेरिका जैसे प्रभावशाली मुल्कों के हाथों में हैं।

मैंने कल ही कहा था कि कैलाश सत्यार्थी को सलाम है और उन्हें नोबेल पुरस्कार दिया जाना ख़ुशी की बात है, इसलिए अब मैं जो कहने जा रहा हूं, उसे सत्यार्थी के विरोध या द्वेष-ईर्ष्या आदि से जोड़कर न देखें। मैं नोबेल पुरस्कार की टाइमिंग देख रहा हूं। मैं यह देख रहा हूं कि ऐसे वक़्त में जब भारत भर में ज़्यादातर NGOs को लेकर तमाम सवालात उठ रहे हैं, उन्हें हो रही विदेशी फंडिंग और उसके पीछे की मंशा पर चिंता जताई जा रही है, भारत के एक NGO संचालक को नोबेल मिला है और इसे बैलेंस करने के लिए पाकिस्तान की एक बच्ची के साथ उसे बांट दिया गया है।

क्या अजीब इत्तेफ़ाक है कि भारत में पिछले तीन-चार साल में NGOs का ज़बर्दस्त उभार देखा जा रहा है। पहले NGOs ने रातों-रात कुछ नए हीरोज़ गढ़कर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया, जिसका एक-एक सीन किसी फिल्म के स्क्रीन-प्ले की तरह पहले से लिखा हुआ जान पड़ता था। कैसी टोपी होगी, कैसे कपड़े होंगे, किन-किन प्रतीकों का इस्तेमाल होगा, कौन-कौन भागीदार होंगे, कौन-कौन टार्गेट होंगे, क्या-क्या ड्रामे होंगे, मीडिया को कैसे खींचना है, युवाओं को कैसे लुभाना है, आलोचकों और तटस्थ समीक्षकों पर कैसे हमला करना है- सब स्क्रिप्टेड था।

ऐसा लग रहा था जैसे एक-एक दृश्य पर दुनिया के बड़े-बड़े दिमागों और इवेंट मैनेजरों ने मंथन किया है। बिल्कुल मिलते-जुलते नज़ारे दुनिया के कुछ अन्य देशों में बिल्कुल ताज़ा-ताज़ा दिखाई दिये थे, जिससे लगा कि हो न हो, इन सारे इवेंट्स की प्लानिंग और फंडिंग करने वाले लोग कॉमन हैं। उस वक़्त ऐसा माहौल बना दिया गया था कि अगर आप आंदोलन से जुड़े किसी व्यक्ति की निष्ठा पर सवाल उठाते या यह कहते कि एक कानून से किसी जनम भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता, तो फौरन आप चोर, भ्रष्ट और देशद्रोही करार दिये जाते।

मेरे जैसे लोग कन्फ्यूज़ हो गए थे कि अगर इस देश में इतने सारे ईमानदार लोग हैं, तो फिर बेईमानी और भ्रष्टाचार है कैसे? फिर तो भ्रष्ट लोगों को ईमानदारी मिटाने के लिए आंदोलन करना चाहिए, न कि ईमानदार लोगों को भ्रष्टाचार मिटाने के लिए। उन दिनों भ्रष्ट लोग भी टोपी पहनकर ईमानदारी पर भाषण दे रहे थे, भ्रष्टाचार जैसे गंभीर सवाल पर दूध-पीते बच्चों की फोटो खिंचाई जा रही थी और छुट्टी के दिन पिकनिक मनाकर पूरा का पूरा परिवार क्रांतिकारी कहलाने लगता था।
इस घटना के बाद हमने देखा कि यह देश अचानक ही स्त्री-अधिकारों के लिए जाग उठा। रेव-पार्टियों का आयोजन करने और उसमें हिस्सा लेने वाली पीढ़ी, तमाम किस्म के नॉनवेज़ चुटकुलों, पोर्न लिटरेचर और फिल्मों के उपभोक्ता और दूसरों की बहन-बेटियों को “माल” समझने वाले लोग भी मोमबत्तियां जलाकर स्वयं को स्त्री-अधिकारों का पुरोधा घोषित कर लेते थे।
फिर हमने देखा कि NGO चलाने वाले लोग व्यवस्था-परिवर्तन की लड़ाई छोड़कर देश में सत्ता-परिवर्तन की लड़ाई में जुट गए। पूरी दुनिया से उन्हें पैसे मिलने लगे। कुछ पैसा उन्होंने वेबसाइटों पर दिखाया, बहुत सारा नहीं दिखाया। जब वे आइडियोलॉजी के सवाल पर दूसरे राजनीतिक दलों जितने ही ढुलमुल, मौकापरस्त, दिग्भ्रमित और पथभ्रष्ट दिखाई दिये, तो लोगों को समझ आया कि हो न हो, दाल में कुछ काला ज़रूर है।

यह सच है कि आज भारत में NGOs की एक ताकतवर लॉबी नक्सलवादियों को शह देती है। आतंकवाद पर ख़ामोश रहती है और फ़ौज की मुख़ालफ़त करती है। भारत की परिवार-व्यवस्था को ध्वस्त करने और स्त्री-आज़ादी के नाम पर महिलाओं को भ्रष्ट करने में जुटी हुई है। एक बड़ी लॉबी यह भी चाहती है कि देश की तमाम महिलाएं अपने कपड़े उतार दें और समूचा भारत एक वृहत सेक्स-मंडी में तब्दील हो जाए। यही आधुनिकता है, यही प्रगतिशीलता है, यही आज़ादी है, यही तरक्की है, यही आत्म-निर्भरता है।
बच्चों के लिए भी हज़ारों-लाखों NGOs काम कर रहे हैं, फिर भी हर लाल-बत्ती पर बच्चे भीख मांगते हैं, हर खान-खदान-ढाबे-फैक्टरी में बच्चे काम करते हैं, हज़ारों बच्चे ग़ायब कर दिये जाते हैं, अनगिनत की सेक्स करके हत्याएं कर दी जाती हैं। एक सुरेंद्र कोली पकड़ में आया, हज़ारों-लाखों सुरेंद्र कोली पकड़ से बाहर हैं। मैंने आज तक नहीं सुना कि किसी NGO की कोशिश से चाइल्ड-ट्रैफिकिंग-मर्डर-रेप जैसे जघन्य अपराधों से जुड़े किसी बड़े सरगना को फांसी पर लटका दिया गया हो।

बहरहाल, भारत में यह NGOs के उभार और सक्रियता का दौर है और इस नोबेल पुरस्कार की टाइमिंग से इतना कन्फर्म हो रहा है कि इसे दुनिया के प्रभावशाली मुल्कों, ख़ासकर अमेरिका का संरक्षण-समर्थन हासिल है। भारत के NGOs और अमेरिका-पोषित नोबेल का यह लिंक आज एक पुरानी घटना से भी स्थापित हो रहा है। नक्सलवाद से नाता रखने के आरोपी डॉक्टर विनायक सेन, जिन्हें भारत में भी कम ही लोग जानते थे, उनकी रिहाई के लिए दुनिया के 22 नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने हस्ताक्षर अभियान चलाया था।

क्या यह माना जाए कि दुनिया भर के नोबेल पुरस्कार विजेता किसी एक ताकतवर लॉबी के इशारे पर काम करते हैं? क्या यह ताकतवर लॉबी अमेरिका की है? आख़िर अमेरिका की मंशा क्या है? क्या सचमुच वह भारत में मानवाधिकारों, बच्चों के अधिकारों, महिलाओं के अधिकारों आदि के प्रति जागरूकता लाना चाहता है और भारत को भ्रष्टाचार-मुक्त बनाना चाहता है या फिर उसकी नीयत कुछ और ही है?

क्या अमेरिका की दूरगामी योजना भारत को अस्थिर करने की है या विदेशी फंडिंग और पुरस्कारों से पोषित-महिमामंडित NGOs के ज़रिेए भारत की सरकारों पर लगातार दबाव बनाए रखने की है? क्या अमेरिका यह चाहता है कि एक तरफ भारत की सरकारों को बाज़ार-समर्थक ग़रीब-विरोधी नीतियां अपनाने के लिए बाध्य किया जाए, दूसरी तरफ़ भारत के NGOs को यहां के आम अवाम में उनके ख़िलाफ़ और व्यवस्था के ख़िलाफ़ असंतोष भड़काने के काम में लगाया जाए?

या अमेरिका यह चाहता है कि भारत में NGOs की पोल खुले और उसपर नकेल कसे जाने की कोई कोशिश हो, इससे पहले ऐसा माहौल तैयार कर दो कि NGOs पर सवाल खड़े करते ही आपको देशद्रोहियों और ईर्ष्यालु लोगों की कतार में खड़ा कर दिया जाए? अगर नोबेल पुरस्कार समेत कथित रूप से प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की ज़रा भी विश्वसनीयता होती, तो आज ये सवाल मन में लाते हुए भी ग्लानि महसूस होती, लेकिन उनकी विश्वसनीयता है नहीं, तो संदेह क्यों न हो?

ज़रा उस दौर को भी याद करिए, जब पश्चिमी देशों को भारत में बाज़ार तैयार करना था, तो उसे भारत की हर लड़की ख़ूबसूरत दिखाई दे रही थी। पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने अमेरिका-पोषित अर्थनीति को ताज़ा-ताज़ा कबूल किया था और उसके ठीक बाद मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स जैसे सारे पुरस्कार भारत की झोली में आकर गिरने लगे थे। अब भारत ने ख़ुद ही बाज़ार के रास्ते में लाल कालीन बिछा दी है और प्रधानमंत्रीगण प्राइवेट कंपनियों के सीईओ की तरह दुनिया भर में घूम-घूमकर बिजनेस की बातें कर रहे हैं, तो भारत की लड़कियों को पुरस्कृत करने की ज़रूरत ही नहीं है।

क्या मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन और मिस वर्ल्ड ऐश्वर्या राय से पहले (1994) और मिस यूनिवर्स लारा दत्ता और मिस वर्ल्ड प्रियंका चोपड़ा (2000) के बाद भारत की लड़कियां ख़ूबसूरत नहीं थीं और नहीं हैं? 1994 से पहले सन्नाटा क्यों था और 2000 के बाद सूखा क्यों पड़ा है? ज़रा सोचिएगा।

मेरे मन में इन अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों को लेकर कई तरह के सवालात हैं। मेरे मन में नोबेल शांति पुरस्कारों की भी अधिक विश्वसनीयता नहीं है। अमेरिका का राष्ट्रपति बनते ही जिस तरह से इसे बराक ओबामा के चरणों में समर्पित कर दिया गया था, उससे साफ़ हो गया था कि यह अमेरिका का “बपौती पुरस्कार” है और अमेरिका इसे अपने तात्कालिक और दूरगामी राजनीतिक और कूटनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए “ट्रैप” और “लालच” के तौर पर बांटता है।

परम दानव समुदाय की पोलखोल के फेसबुक प्रोफाइल से

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