रेहाना ! हमें माफ़ करना…

 -फ़िरदौस ख़ान

एक लड़की जो जीना चाहती थी… अरमानों के पंखों के साथ आसमान में उड़ना चाहती थी, लेकिन हवस के भूखे एक वहशी दरिन्दे ने उसकी जान ले ली. एक चहकती-मुस्कराती लड़की अब क़ब्र में सो रही होगी… उसकी रूह कितनी बेचैन होगी… सोचकर ही रूह कांप जाती है… लगता है, उस क़ब्र में रेहाना जब्बारी नहीं, हम ख़ुद दफ़न हैं…

रेहाना ! हमें माफ़ करना… हम तुम्हारे लिए सिर्फ़ दुआ ही कर सकते हैं…

 

ग़ौरतलब है कि तमाम क़वायद के बावजूद दुनियाभर के संगठन 26 साल की ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को नहीं बचा सके. रेहाना को 25 अक्टूबर को फांसी दे दी गई. रेहाना पर इल्ज़ाम था कि उसने 2007 में अपने साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश करने वाले ख़ुफ़िया एजेंट मुर्तजा अब्दोआली सरबंदी पर चाक़ू से वार किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी. रेहाना को साल 2009 में क़त्ल का क़ुसूरवार पाया गया था. क़ानून मंत्री मुस्तफ़ा पी. मोहम्मदी ने अक्टूबर में इशारा किया था कि रेहाना की जान बच सकती है, लेकिन सरबंदी के परिजनों ने रेहाना की जान बचाने के लिए पैसे लेने से इंकार कर दिया. रेहाना की मां ने जज के सामने अपनी बेटी रेहाना की जगह ख़ुद को फांसी दे दिए जाने की गुहार लगाई थी.

पेशे से इंटीरियर डिज़ाइनर रेहाना को फांसी से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम चलाई गई, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी. मानवाधिकार संगठन ऐमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस आदेश को बिल्कुल ग़लत ठहराते हुए कहा कि हालांकि रेहाना ने सरबंदी को रेप की कोशिश करते वक़्त चाक़ू मारे जाने की बात मानी, लेकिन उसका क़त्ल कमरे में मौजूद एक अन्य व्यक्ति ने किया था.

 रेहाना ने फांसी से पहले अपनी मां को एक ख़त लिखकर अपनी मौत के बाद अंगदान की ख़्वाहिश ज़ाहिर की. इस ख़त को रेहाना की मौत से दूसरे दिन 26 अक्टूबर को सार्वजनिक किया गया.  अपने ख़त में रेहाना लिखती है-

 मेरी प्रिय मां,

आज मुझे पता चला कि मुझे किस्सास (ईरानी विधि व्यवस्था में प्रतिकार का क़ानून) का सामना करना पड़ेगा. मुझे यह जानकर बहुत बुरा लग रहा है कि आख़िर तुम क्यों नहीं अपने आपको यह समझा पा रही हो कि मैं अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी पन्ने तक पहुंच चुकी हूं. तुम जानती हो कि तुम्हारी उदासी मुझे कितना शर्मिंदा करती है. तुम क्यों नहीं मुझे तुम्हारे और अब्बा के हाथों को चूमने का एक मौक़ा देती हो?

 मां, इस दुनिया ने मुझे 19 साल जीने का मौक़ा दिया. उस मनहूस रात को मेरा क़त्ल हो जाना चाहिए था. मेरी लाश शहर के किसी कोने में फेंक दी गई होती और फिर पुलिस तुम्हें मेरी लाश को पहचानने के लिए लाती और तुम्हें मालूम होता कि क़त्ल से पहले मेरा रेप भी हुआ था. मेरा क़ातिल कभी भी पकड़ में नहीं आता, क्योंकि हमारे पास उसके जैसी ना ही दौलत है, और ना ही ताक़त. उसके बाद तुम कुछ साल इसी तकलीफ़ और शर्मिंदगी में गुज़ार लेतीं और फिर इसी तकलीफ़ में तुम मर भी जातीं, लेकिन किसी अज़ाब की वजह से ऐसा नहीं हुआ. मेरी लाश तब फेंकी नहीं गई, लेकिन इविन जेल के सिंगल वॉर्ड स्थित क़ब्र और अब क़ब्रनुमा शहरे-जेल में यही हो रहा है. इसे ही मेरी क़िस्मत समझो और इसका इल्ज़ाम किसी पर मत मढ़ो. तुम बहुत अच्छी तरह जानती हो कि मौत ज़िन्दगी का अंत नहीं होती.

 तुमने ही कहा था कि आदमी को मरते दम तक अपने मूल्यों की रक्षा करनी चाहिए. मां, जब मुझे एक क़ातिल के तौर पर अदालत में पेश किया गया, तब भी मैंने एक आंसू नहीं बहाया. मैंने अपनी ज़िन्दगी की भीख नहीं मांगी. मैं चिल्लाना चाहती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया, क्योंकि मुझे क़ानून पर पूरा भरोसा था.

 मां, तुम जानती हो कि मैंने कभी एक मच्छर भी नहीं मारा. मैं कॉकरोच को मारने की जगह उसकी मूंछ पकड़कर उसे बाहर फेंक आया करती थी. लेकिन अब मुझे सोच-समझकर क़त्ल किए जाने का मुजरिम बताया जा रहा है. वे लोग कितने पुरउम्मीद हैं, जिन्होंने जजों से इंसाफ़ की उम्मीद की थी. तुम जो सुन रही हो कृपया उसके लिए मत रोओ. पहले ही दिन से मुझे पुलिस ऑफ़िस में एक बुज़ुर्ग अविवाहित एजेंट मेरे स्टाइलिश नाख़ून के लिए मारते-पीटते हैं. मुझे पता है कि अभी ख़ूबसूरती की कद्र नहीं है. चेहरे की ख़ूबसूरती, विचारों और आरज़ुओं की ख़ूबसूरती, ख़ूबसूरत लिखावट, आंखों और नज़रिये की ख़ूबसूरती और यहां तक कि मीठी आवाज़ की ख़ूबसूरती.

 मेरी प्रिय मां, मेरी विचारधारा बदल गई है, लेकिन तुम इसकी ज़िम्मेदार नहीं हो. मेरे अल्फ़ाज़ का अंत नहीं और मैंने किसी को सबकुछ लिखकर दे दिया है, ताकि अगर तुम्हारी जानकारी के बिना और तुम्हारी ग़ैर-मौजूदगी में मुझे फांसी दे दी जाए, तो यह तुम्हें दे दिया जाए. मैंने अपनी विरासत के तौर पर तुम्हारे लिए कई हस्तलिखित दस्तावेज़ छोड़ रखे हैं.

 मैं अपनी मौत से पहले तुमसे कुछ कहना चाहती हूं. मां, मैं मिट्टी के अंदर सड़ना नहीं चाहती. मैं अपनी आंखों और जवान दिल को मिट्टी बनने देना नहीं चाहती, इसलिए प्रार्थना करती हूं कि फांसी के बाद जल्द से जल्द मेरा दिल, मेरी किडनी, मेरी आंखें, हड्डियां और वह सब कुछ जिसका ट्रांसप्लांट हो सकता है, उसे मेरे जिस्म से निकाल लिया जाए और इन्हें ज़रूरतमंद व्यक्ति को तोहफ़े के तौर पर दे दिया जाए. मैं नहीं चाहती कि जिसे मेरे अंग दिए जाएं, उसे मेरा नाम बताया जाए और वह मेरे लिए प्रार्थना करे.

लेखिका स्‍टान न्‍यूज ऐजेंसी की संपादक हैं।

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