बहुत सो चुके, अब तो जगें

जागरण का समय आ ही गया है। जाने कितनी बार नए संकल्पों और नई भोर के साथ जागरण का संदेश देने वाले पर्व-त्योहार और नए-नए अवसर हमारे सामने आते रहते हैं। पर हम इतने आलसी हैं कि हर बार कल्पनाओं में खो जाते हैं, संकल्प लेते हैं, लक्ष्यों में खुद को बाँधते हैं, कुछ नया और अच्छा करने की सोचते हैं और कुछ घण्टों या दिनों बाद फिर उसी पुराने आलसी ढर्रे पर चल पड़ते हैं।

वर्ष में कितनी ही बार ऎसे मौके आते हैं जिनका उद्देश्य हमें जगाना ही होता है, हम कुछ उत्तेजित और प्रेरित होकर हलचल मचाते हैं और फिर जैसे थे वैसे ही पड़े रहते हैं। जाने हम कितने महा आलसी हो गए हैं कि साल भर में कितनी-कितनी बार जगाना पड़ता है, कितने-कितने तरीकों से हमारा जागरण होता है मगर हम हैं कि मरे या अधमरे की तरह पड़े रहते हैं।

हमें कुछ भी परवाह नहीं कि बाहर क्या हो रहा है, अपने घर या मोहल्ले के आस-पास क्या हो रहा है, क्षेत्र और देश की सीमाओं पर क्या हो रहा है। हम भले हमारी खटिया भली और चंद फीट पसरी हमारी चहारदीवारी भली।
हमें कौन जगा सकता है। जो सोया हो उसे तो कोई भी जगा सकता है, जो अपने स्वार्थों की नीम बेहोशी में जानबूझकर सोया पड़ा है, भोग-विलासों में शक्तिहीन-ऊर्जाहीन और स्खलित होकर मदहोशी में पड़ा है, उसे कौन जगा सकता है।
हममें से काफी सारे लोग हैं जिनकी आँखें खुली दिखती हैं और कान चौकन्ने, मगर हिलने-डुलने तक में मौत आती है। कोई हड्डी का टुकड़ा दिखा दे, गांधी छाप दिखा या सूंघा दे, या फिर हमारे सामने नरम-कोमल चमड़ी या गरम-गरम गोश्त परोस दे, तभी हमारा जागरण संभव हो पाता है अन्यथा हम न जगना चाहते हैं, न औरों को जगाना।
हमारी मनचाही वस्तुओं और व्यक्तियों को हमारे सामने परोसे बगैर हमें कोई नहीं हिला सकता। और इच्छित मिल जाए तो फिर हम ऎसे जग जाते हैं जैसे कि कुंभकर्ण के छह माह पूरे हो गए हों। हममें से खूब सारे ऎसे हैं जो हमेशा उनिंदा ही रहते हैं। कोई भंग की मस्ती में, तो कोई दारू की खुमारी में, कोई पदों और वैभव के अहंकारों में।
जात-जात के नशों की मौज-मस्ती में रमते हुए हमने आपको नींद और शिथिलता की खुमारी में धकेल रखा है। कई सारे ऎसे हैं जिनकी वजह से जानवरों की संख्या बढ़ने नहीं पा रही है, खूब सारे हर इलाके में ऎसे मिल जाएंगे जो क्षेत्र भर के मुर्गे-मुर्गियों के लिए साक्षात यमराज बने हुए हैं।

इन्हीं में से कई के बारे में यहाँ तक कहा जाता है कि ये लोग कुछ समय और बने रहे तो मुर्गों की समस्त प्रजातियों पर खतरा मण्डराने से कोई नहीं रोक सकता। शराब की लत से अपने जीवन को हमेशा आनंदित और बेपरवाह रहने वाले लोगों की अपने यहाँ कोई कमी नहीं है।

गाढ़ी कमायी से पीने वाले भी हैं, और हराम की पीने वाले भी। इसी तरह हराम का खाने और जमा करने वाले भी खूब हैं। दुनिया भर का सब कुछ हजम कर देने वाले ऎसे ही लोग हमेशा सोये पड़े रहने के इतने आदी हो गए हैं कि ऎसे लोग सरहद पर होते तो अपनी सरहदें कभी की नीलाम हो गई होती।
इन लोगों को न समाज की पड़ी है, न देश की। इनके लिए अपने खाने-पीने का मुफतिया इंतजाम ही सबसे बड़ी और सच्ची देश सेवा है। इनके लिए अपना जिस्म ही देश है जिसके लिए जो कुछ जायज-नाजायज करना पड़े, इनके लिए कोई वर्जना नहीं है।
जागरण का कोई सा संदेश हमारे आस-पास गूंजे, हम पर इसका कोई खास फर्क आज तक नहीं पड़ा है। पड़ा होता तो आज हम दुनिया में सिरमौर होते। सभी प्रकार का सामथ्र्य और क्षमताएं होने के बावजूद हम लोग कुछ कर नहीं पा रहे हैं, सिर्फ द्रष्टा भाव से देखते रहने को विवश हैं।
इसका मूल कारण यही है कि हम आलसी हो चुके हैं। दुनिया में हमसे बड़ा आलसी और कोई हो ही नहीं सकता। शीत निष्कि्रयता वाले जानवर भी शीत पूर्णता के बाद बाहर निकलते हैं मगर हम हैं कि साल भर दुबके रहते हैं।
यह आलस्य ही है जिसके कारण हम न खुद आगे बढ़ पा रहे हैं, न और कुछ कर पा रहे हैं। वक्त-बेवक्त खाना-पीना और सो जाना ही हमारे जीवन का लक्ष्य बनकर रह गया है। इसी परंपरागत आलस्य से मुक्ति देने के लिए जागरण का शंख साल भर में अनेक बार फूंका जाता रहा है।
बार-बार जगाने और चेतावनी देने के बाद भी हम नहीं जग पाएं, तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि भगवान ने हमारे भाग्य में दुर्भाग्य ही बदा हुआ है और इसी वजह से हम न उत्प्रेरित हो रहे हैं न प्रेरित। हमसे तो वे जानवर अच्छे, जो समय पर सोते हैं, समय पर जग जाते हैं और समय-असमय सबका ख्याल रखते हैं।
हमारी मर्यादाएं, समय का भान और अनुशासन सब कुछ जानवरों ने ले लिया है और हम जानवरों से भी गए बीते होकर मरे-अधमरे हो गए हैं। हमारे लिए जागरण के ये सारे संदेश बेमानी हैं जब तक हम अपने भीतर के आलस्य को बाहर न फेंक पाएं।
आज का दिन फिर हमें जगाने आया है। यह कहने आया है कि दैव जग गए हैं, इंसान क्यों सोया पड़ा है। जगें और जगाएँ, वरना सोते रहने का काम तो कोई भी कर सकता है। जागरण की यह वेला अबकि बार यों न बीत जाए।
बाहर भी रोशनी का दरिया आ धमका है और परिवेश में भी। अच्छे दिनों की आहट पाकर भी न जगें तो फिर सोते रहिएगा। आईये जगे, जगाएँ और देश को आगे बढ़ाएँ ….

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