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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

नंदपूर्ण विवेक का नाम है विवेकानंद

डॉ संजय पंकज

आत्मविश्वास और देवत्व से देदीप्यमान आनन, पवित्रता और पुरुषार्थ से चमकती आंखें, गौरव और दर्प से उन्नत सिर, चौड़ी छाती, कसी मांसपेशियां, दिशाओं को भुजाओं में समेट लेने की शक्ति से भरी हुई बाहें और दृढ़ता से धरती पर जमे पैर! यह है नर- नाहर योद्धा संन्यासी स्वामी विवेकानंद का दमकता हुआ बाहरी रूप। सम्मोहन और आकर्षण से आप्यायित छवि को छायाचित्र में देखते हुए बरबस ठहर जाती है आंखें और आंदोलित हो उठता है मन! उठने लगती हैं हजार-हजार तरंगें और आलोक से भर जाती है आत्मा! बचपन से ही अलौकिक तेज से संपन्न नरेन्द्र अद्भुत मेधा और विलक्षण प्रतिभा की जादुई दीप्ति से भीड़ में भी अपनी अलग पहचान सहज ही बनाए रखता था। उसमें जन्मजात ध्यान का गुण था। जिस निष्ठा और आस्था के वातावरण में नरेन्द्र का अवतरण हुआ उसे स्वाभाविक ढंग से भीड़ से भिन्न होना ही था, जो हुआ। कालक्रम में दैवयोग से युवा नरेंद्र शक्तिसिद्ध महान गुरु रामकृष्ण परमहंस का पारस स्पर्श पाकर कंचन हुआ और फिर विवेकानंद बनकर संपूर्ण विश्व को आलोकित करने की क्षमता से भर गया। यथासमय विश्वमंच पर विवेकानंद के माध्यम से विराट भारत अपने सत्य, यथार्थ और वैभव के साथ समग्रता में उजागर हुआ। ऐसा नहीं है कि विवेकानंद से पूर्व भारत की ज्ञानसंपदा, गौरवगाथा और सांस्कृतिक विभुता से विश्व अपरिचित था। मगर वह दौर लगातार भारत की पराधीनता का था। मुगलों के म्लेच्छ शासन और अंग्रेजी हुकूमत की नृशंसता से आक्रांत तथा त्रस्त भारत आत्महंता हीनता का शिकार हो गया था। बचपन से ही अपने बारे में नहीं बल्कि परिवेश और समाज के बारे में सोचने वाला नरेंद्र स्वामी विवेकानंद होते हुए भारत की दीनता और दरिद्रता को देखकर मर्माहत हुए। पीड़ाओं से संतप्त विवेकानंद उससे मुक्ति के लिए उतप्त और उत्प्रेरित हुए। समय आया तो उन्होंने विश्वभाल पर भारत की विराट पहचान का राजतिलक अंकित कर दिया। अपने संपूर्ण तेज के साथ जाग्रत भारत संसार में आलोकित हो उठा।
भारत को जीवंत सत्ता के रूप में देखते और अनुभूत करते हुए विवेकानंद सागर की उत्तेजित और उत्ताल लहरों के बीच स्थित कन्याकुमारी के पर्वत-खंड पत्थर-ढूह तक सागर की गर्जना को चुनौती देते हुए लहरों से लड़ते हुए पहुंचे थे। उनकी निडरता और निर्भीकता के सामने समुद्र भी नत हो गया। चट्टान पर टहलते हुए दूर सुदूर तक आक्षितिज फैले हुए समुद्र का उस युवा संन्यासी ने अवलोकन किया और वह ध्यान में डूब गया। ध्यान में दासता की जंजीर से जकड़ी हुई दुखी भारत माता की छवि को देख कर आर्तनाद कर उठे थे स्वामी विवेकानंद! विवेकानंद ध्यान में गहरे डूबते चले गए और खुलते चले गए भारत माता की मुक्ति के द्वार। सूर्योदय के साथ विवेकानंद का ध्यान टूटा। सब कुछ बदल गया था। आत्मविश्वास से आपादमस्तक भरा हुआ विवेकानंद का अलौकिक व्यक्तित्व भासमान हो उठा था। उनके भीतर समाहित हो गया था संपूर्ण भारत। उन्हेंं लगा कि उनका प्रबल पराक्रम और शौर्य ही स्वतंत्रचेता भारत को समस्त हीनता-ग्रंथियों से मुक्त कर देगा। उनकी धारणा दृढ़ हुई और वे निकल पड़े भारत-दर्शन के साथ ही भारत-जागृति के लिए। विवेकानंद अविराम चलते रहे अभिराम भारत के निर्माण के लिए। वे रुके नहीं, झुके नहीं, थके नहीं। चरैवेति चरैवेति को अपनी गति और धुन में बांधकर पथ के शूलों को भी फूलों में बदलते हुए वे चलते रहे, चलते रहे। उपनिषद् की जिस प्रेरक-पंक्ति – उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत – को उन्होंने अपना जीवन-मंत्र बना लिया था उसे कभी उन्होंने विस्मृत नहीं किया और उससे वे कभी डिगे भी नहीं। विवेकानंद ने जो लक्ष्य निर्धारित किया था उसे अपने संकल्प और साधना से सिद्धि तक पहुंचाया भी।
विवेकानंद के व्यक्तित्व और विचार में निराशा, नकारात्मकता तथा कालिमा नहीं है। उन्होंने चुनौतियों को स्वीकारते हुए, परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए, पथ की बाधाओं से लड़ते हुए जीवन भर अराजक शक्तियों को ललकारा। साहस और धैर्य के साथ विषम समय से पंजा भिड़ाया। भारत के विरुद्ध हर निरंकुश विचार की छाती पर अपना अंगद पांव जमाया। शिव की अभयंकरता, राम की मर्यादा, कृष्ण के वैराट्य, शंकराचार्य के वैराग, बुद्ध की करुणा और रामकृष्ण परमहंस के सत्य निदर्शन के चैतन्य स्वरूप स्वामी विवेकानंद भारत की आत्मा के दिग्दर्शन थे। उन्हें किसी का भय नहीं था; मृत्यु का भी नहीं! महाकाल की हर गति से वे परिचित थे। अपनी गहन साधना में डूब कर उन्होंने सत्य को देखा, जाना और समझा था। जीवन और मृत्यु के शाश्वत चक्र का रहस्य उन्हें ज्ञात था। तरुणाई में उनके भीतर उठे हुए संशय और भ्रम को महान गुरु रामकृष्ण परमहंस ने अपने अंगूठे के स्पर्श से दूर कर दिया था और उन्हें जीवन के यथार्थ का बोध कराते हुए ईश्वरीय शक्ति का साक्षात्कार कराया था। इसलिए स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व और कृतित्व में कहीं भी द्वंद्व नहीं है। उन्होंने पूर्ण विश्वास के साथ सदा ही अपने विचारों को रखा और प्रतिपादित किया। भक्ति और ज्ञान के संतुलन के बीच स्वामी विवेकानंद ने अपने तर्क को भी विवेक सम्मत ढंग से प्रस्तुत किया है। भारतीय अस्मिता की पहचान और प्रवक्ता विवेकानंद सनातन धर्म की वैज्ञानिकता, तत्वदर्शी चिंतन तथा सत्य के ओजस्वी व्याख्याता थे। यह सत्य है कि वे भारत की आत्मा तथा हिंदू हृदय सम्राट थे और हैं भी मगर वे तमाम संकीर्णताओं से ऊपर उठे हुए विश्व बंधुत्व की उदात्त चाहना और भावना से भरे हुए थे। मनुष्य की असीम संभावनाओं में विश्वास रखने वाले स्वामी जी मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए संपूर्ण जीवन समर्पित रहे। उनके चिंतन, मनन और दर्शन जीवन-सौंदर्य के व्यावहारिक निरूपण तथा मानवीय मूल्य के स्थापन के लिए बड़े ही विश्वसनीय और कारगर हैं।
विवेकानंद ने कबीर की तरह जो देखा और अनुभूत किया उसे ही स्थापित करने का सतत प्रयास किया। – ‘स्वतंत्रता आत्मा का संगीत है’ – जैसी अवधारणा के स्वामी जी सब की स्वतंत्रता के आग्रही और पक्षपाती थे। उन्हें किसी को भी विवशता में वश में रखना स्वीकार्य नहीं था। धार्मिक रूढ़ियों, संकीर्णताओं और जटिलताओं पर उन्होंने प्रहार करते हुए हर मनुष्य के भीतर परम सत्ता के दर्शन किए। हर धर्म, मजहब तथा पंथ के हर उदार विचार और मानवीय मूल्य का उन्होंने स्वागत किया। भेदभाव और छुआछूत से परे स्वामी विवेकानंद ने शीर्ष औदात्य और परम सत्य का संस्पर्श किया। उनके जिस गुरु ने दरिद्र में नारायण के दर्शन किए उसी दृष्टि का विस्तार करते हुए स्वामी जी ने संसार के प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर के शरीर और मंदिर के रूप में देखते हुए सदा प्रणम्य माना। भारतीय समृद्ध ऋषि- परंपरा, वैभवशाली ज्ञान-संपदा और पूज्य विश्व- मनीषा के संवेदनशील संवाहक स्वामी विवेकानंद आत्मबोध के ऐसे सम्मोहक ऊर्जा-केंद्र थे जो मृत्यु पर्यन्त मनुष्य के उद्धारक और मसीहा बने रहे। उन्होंने कभी पलायन नहीं किया संघर्ष किया। परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके दो-दो हाथ किया। विराट मनुष्य की महान जययात्रा स्वामी विवेकानंद युगद्रष्टा, युगस्रष्टा युगपुरुष थे और हैं। केवल भारत के युवाओं के लिए ही नहीं संपूर्ण संसार के युवाओं के लिए सबसे बड़े प्रेरणा पुरुष के रूप में स्वामी विवेकानंद सर्वश्रेष्ठ आदर्श हैं। जीवमात्र के लिए सम्यक दृष्टि का अर्थ क्या होता है इसे समझने के लिए विवेकानंद के साहित्य और जीवन को जानना जरूरी है। जगत के सारे प्राणी परम सत्ता के ही स्वरुप हैं – यह कोई गूढ सूत्र नहीं बल्कि सत्य सिद्धांत है और इसका ज्ञान विवेकानंद का व्यक्तित्व-कृतित्व कराता है। विवेकानंद ने जो सात्विक संकल्प लिया उसे अपनी अटल साधना से निश्चित सिद्धि तक पहुंचाया। मनुष्य दृढ़ता से जो सोचता है वही होता है। विवेकानंद स्वयं को ईश्वर के द्वारा भेजे गए विशेष प्रयोजन को सिद्ध करने वाले दूत के रूप में मानते और स्वीकारते थे इसीलिए वे मृत्यु से भी कभी डरे नहीं। शिकागो के विश्व धर्म संसद में भी अकालतांडव विरोध के बावजूद उन्होंने पूरी निडरता से सिंहावलोकन करते हुए अपने सत्य-दर्शन को पूरे भारतीय शौर्य के साथ प्रस्तुत किया था जिससे संसार आश्चर्यचकित भी हुआ और प्रभावित हुआ। भारतीय विचारों से विश्व को आलोकित करने वाले आनंदपूर्ण विवेक का नाम है स्वामी विवेकानंद।

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