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संपादकीय

प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक और कांग्रेस

पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में चूक के प्रश्न को बहुत गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। इस घटना ने भारत की राजनीति के गिरते स्तर को सबके सामने खोलकर रख दिया है । ‘टंगड़ी मार’ राजनीति करने की राहुल गांधी की सोच प्रकट करने वाली यह घटना बताती है कि कांग्रेस के नेता को प्रधानमंत्री बनने की कितनी जल्दी है ? वह संवैधानिक रास्तों को न अपनाकर हिंसा के माध्यम से सत्ता को प्राप्त करने की युक्तियां खोज रहे हैं। गांधी की अहिंसा में विश्वास रखने वाले गांधीवादियों की ऐसी हालत को देखकर यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वास्तव में गांधी की अहिंसा की हत्या इन लोगों ने ही की है। वैसे गांधी स्वयं भी टंगड़ी मार राजनीति करने के अभ्यासी थे। उन्होंने सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल के साथ क्या किया था? – इसे सब जानते हैं।
  अपनी जिद के सामने गांधी ने कई लोगों की राजनीतिक हत्याएं कीं। ‘हत्या’, जिद और अहंकार के प्रतीक महात्मा गांधी के उसी गांधीवाद का अनुसरण करते हुए यदि राहुल गांधी भी देश की राजनीति में हिंसा के प्रवेश को सम्मिलित कर राजनीति की दिशा को बदलने की कोशिश कर रहे हैं तो उनका यह घृणास्पद प्रयास देश के लिए कभी भी अच्छा नहीं हो सकता। वैसे उनकी दादी राजनीति में हिंसा की प्रतीक रही हैं । लगता है संस्कारों का वही डीएनए राहुल गांधी के खून में बसा हुआ है।
     ज्ञात रहे कि पंजाब में पीएम नरेंद्र मोदी  की सुरक्षा में भारी चूक का यह मामला उस समय सामने आया जब 5 जनवरी को पंजाब के दौरे पर पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काफिले को कुछ प्रदर्शनकारियों ने सड़क के रास्ते हुसैनीवाला जाते समय रोक लिया। इस पर प्रधानमंत्री मोदी का काफिला यहां 15-20 मिनट रुका रहा। निश्चित रूप से इस काल में देश के प्रधानमंत्री के साथ कुछ भी होना संभव था।
      इस घटना से कई प्रश्न खड़े होते हैं पहला प्रश्न तो यही है कि प्रधानमंत्री के काफिले के यात्रा मार्ग की जानकारी केवल पंजाब पुलिस को थी तो उनकी यह जानकारी आम आदमी तक किसने पहुंचाई? यदि पंजाब पुलिस को यह स्पष्ट हो गया था कि कुछ प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री के यात्रा मार्ग को रोकेंगे और उस समय कोई भी घटना घटित हो सकती है तो उन्होंने समय रहते कदम क्यों नहीं उठाया अर्थात प्रदर्शनकारियों को प्रधानमंत्री के यात्रा मार्ग से अलग क्यों नहीं किया? यदि पंजाब पुलिस ने यह देख लिया था और समझ लिया था कि प्रदर्शनकारी किसान किसी भी कीमत पर प्रधानमंत्री के यात्रा मार्ग से हटने वाले नहीं हैं तो उन्होंने समय रहते प्रधानमंत्री का यात्रा मार्ग बदला क्यों नहीं ?  
  कांग्रेस के नेता और विशेष रूप से राहुल गांधी इस घटना के बारे में अपनी ओर से चाहे जितनी सफाई दें पर एक बात स्पष्ट है कि राहुल गांधी का छिछोरापन अब देशवासियों को रास नहीं आ रहा है। वह कदम – कदम पर झूठ, छल, फरेब और तुच्छ राजनीति का प्रमाण पहले भी देते रहे हैं , लेकिन सत्ता स्वार्थ के लिए वह इतना गिर जाएंगे , यह तो किसी ने सोचा नहीं था ? अब जब उनका असली चेहरा सामने आ ही गया है तो देश के सभी राजनीतिक दलों को राजनीति के इस गिरते स्तर के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार मानकर राजनीतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर कुछ ठोस निर्णय लेने के लिए सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए। यह अच्छी बात है कि ‘आप’ ने प्रधानमंत्री की सुरक्षा में हुई चूक के मामले में सरकार के साथ खड़े होने का संकेत दिया है।
  राजनीति के प्रति गंभीर चिंतन रखने वाले लोगों ने राहुल गांधी को उस समय ही समझ और परख लिया था जिस समय उन्होंने अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कुछ कागजों को फाड़ कर फेंक दिया था। देश के प्रधानमंत्री के प्रति ऐसा भाव रखने वाले राहुल गांधी कितने छिछोरे हो सकते हैं ? – इस बात की जानकारी देश को मिल तो चुकी थी और उसका परिणाम भी देश के मतदाताओं ने अगले चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से हटाकर राहुल गांधी और उनकी पार्टी को चखा दिया था परंतु इसके उपरांत भी राहुल गांधी की छिछोरी राजनीति का यह सिलसिला रुका नहीं। वह निरंतर गिरते गए।
   वास्तव में कांग्रेस के गांधी नेहरू परिवार के लोगों ने देश को अपनी जागीर समझ लिया है। इनके दिमाग खराब हो चुके हैं। इनकी सोच यह बन गई है कि देश को चलाना केवल हमको आता है, और देश की जनता चाहे जो जनादेश दे हम उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। इंदिरा गांधी की तानाशाही की यह प्रवृत्ति गांधी नेहरू परिवार का आज भी पीछा नहीं छोड़ रही है। वैसे गांधी और नेहरू स्वयं भी किसी तानाशाह से कम नहीं थे । उन्हें भी कोई अन्य चेहरा अपने सामने उभरता हुआ अच्छा नहीं लगता था। राहुल गांधी की रगों में चाहे बेशक इसी प्रकार का डीएनए समाया हो पर अब देश का मतदाता बहुत जागरूक हो चुका है। कांग्रेस की मूर्खता और पापों का बोझ ढोते – ढोते आम आदमी की कमर टूट चुकी है। मां भारती घायल है और जितने छल प्रपंच रच रचकर इन्होंने सत्ता के सहारे देश के बहुसंख्यक के साथ अन्याय किया है उसका हिसाब अब चुकता हो रहा है। जिस समय निर्णय सुनाया जा रहा हो उस समय वादी प्रतिवादी चाहे जितने चिल्लाएं, उनकी कोई जज सुनता नहीं है। यही स्थिति इस समय कांग्रेस की बन चुकी है । जनता की अदालत में खड़ी कांग्रेस को इस समय उसके किए पापों का परिणाम सुनाया जा रहा है। बार – बार चुनाव में हारती कांग्रेस अब इस समय पूर्णतया बौखला चुकी है। उसी बौखलाहट का परिणाम है पंजाब में प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक का यह मामला।
    कांग्रेस की ओर से कहा गया है कि पंजाब में जिस कार्यक्रम स्थल पर प्रधानमंत्री को जाना था वहां कुर्सियां खाली पड़ी थीं। जिसकी सूचना पाकर प्रधानमंत्री निराश होकर पंजाब से लौट आए। जिसे अब वह सुरक्षा में चूक का मामला कहकर प्रचारित कर रहे हैं । कांग्रेस का यह कुतर्क लोगों के गले नहीं उतर रहा है। ऐसा कहकर वह यह दिखाना चाहती है कि पंजाब में हुए किसान आंदोलन का प्रभाव यह है कि प्रधानमंत्री को लोग सुनने की तो बात छोड़ो, देखने तक को तैयार नहीं हैं। जबकि राहुल गांधी को स्वयं अपनी पार्टी के विषय में सोचना चाहिए । देश में हुए किसी भी सर्वे में यह नहीं बताया जा रहा है कि पंजाब में कांग्रेस फिर सरकार बनने जा रही है। कांग्रेस ने अपने अंतर्कलह से बहुत कुछ खो लिया है। पर इसके उपरांत भी कांग्रेस के नेता उससे कोई शिक्षा लेने को तैयार नहीं हैं।
     सारा देश यह जानता है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के आने वाले चुनावों में कांग्रेस के लिए तो सारा उत्तर प्रदेश ही खाली पड़ा है । उसकी कुर्सियों पर बैठने के लिए लोग तैयार नहीं हैं। उधर राजस्थान भी अगले चुनावों में कांग्रेस के हाथों से जाने वाला लगता है। ऐसे में प्रधानमंत्री की किसी सभा में कुर्सी खाली पड़ी हैं या भरी हैं- इस पर ध्यान देने की बजाय कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के लिए आवश्यक है कि वह अपने लिए देखें कि लोग उन्हें केवल एक मस्खरा समझकर सुनने को आते हैं या फिर सुनने वाली भीड़ को वह अपनी पार्टी के लिए वोटों में भी बदल पाते हैं? यदि नहीं बदल पा रहे हैं तो उन्हें अपने आप से ही यह सवाल पूछना चाहिए कि  ऐसा वह क्यों नहीं कर पा रहे हैं ? कांग्रेस के लिए समय अंतर्मंथन का है। छिछोरी राजनीति के माध्यम से राजनीति को और भी अधिक पथभ्रष्ट कर देने की  राह पर यदि कांग्रेस चली तो इसकी आग सबसे पहले उसी को भस्म करेगी।
    राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस को जनादेश का सम्मान करना सीखना चाहिए। उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि जिन लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंपी है, वह भी इसी देश के रहने वाले हैं। लोकतंत्र में किसी भी पार्टी को सरकार बनाने का अधिकार होता है। परंतु इसके लिए संवैधानिक और लोकतांत्रिक उपायों का सहारा लेना ही श्रेयस्कर माना जाता है। कांग्रेस को संवैधानिक और लोकतांत्रिक उपायों का सहारा लेकर जनता जनार्दन का समर्थन जुटाना चाहिए। इसके लिए ठोस राजनीति और ठोस रणनीति पर काम करने के लिए उसके पास कई विकल्प हैं। राजनीति में शोर-शराबे को स्थान देकर उसी के आधार पर सत्ता तक पहुंचने की जिस राजनीति को राहुल गांधी कर रहे हैं उसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता। वह आत्महत्या की डगर पर बढ़ते जा रहे हैं। उनकी सोच बन गई है कि जनता स्वयं ही मोदी को सत्ता से हटा देगी और उस समय एक विकल्प के रूप में केवल वह ही एक चेहरा होंगे। जबकि अब उनके साथी अर्थात विपक्षी दल भी उन्हें एक ‘चेहरा’ मानने को तैयार नहीं हैं। यहां तक कि कांग्रेस के भीतर भी यदि निष्पक्ष सर्वे कर लिया जाए तो पता चल जाएगा कि वहां भी उनके विरोध में लोग अधिक निकलेंगे। ऐसे में राहुल गांधी यदि अब भी कोई सुनहरा सपना देख रहे हैं तो इसे उनका एक और छिछोरापन ही कहा जाएगा।
   वैसे प्रधानमंत्री का राजनीति का सफाई अभियान निरंतर प्रगति पथ पर है। बड़े-बड़े सूरमा अपने-अपने स्थानों पर बैठे या खड़े खड़े ही कांप हैं । उनके पैरों के नीचे की धरती खिसकती जा रही है । उन्हें यह दिख रहा है कि अगले चुनावों में वह संसद में पहुंच नहीं पाएंगे। क्योंकि भ्रष्टाचार और दूसरे ऐसे ही देश विरोधी कार्यों के चलते उनकी राजनीति इस समय डांवाडोल हो चुकी है। लोग धीरे-धीरे बहुत कुछ समझ गए हैं । कच्ची राजनीति से बने कच्चे मकान धड़ाधड़ गिरते जा रहे हैं। लोग यह देखकर हैरान हैं कि जिन मकानों को वह बड़े मजबूत समझते थे वह भी पानी लगते ही कागज की नाव की तरह गलते जा रहे हैं। देश के मतदाता यह समझ रहे हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है ? अब उनका कागज की नाव और कच्चे मकानों से विश्वास उठ गया है। वह समझ गए हैं कि मकान किस तरह के बनने चाहिए और कैसी नाव होनी चाहिए ? देश का आम आदमी तो बहुत कुछ समझ गया है, पर पता नहीं राहुल गांधी कब समझेंगे ?

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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