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आज का चिंतन

ओ३म् “वेदों का काव्यानुवाद करने वाले विद्वान श्री वीरेन्द्र राजपूत के निवास पर यज्ञ सम्पन्न”

श्री वीरेन्द्र राजपूत उत्तराखण्ड राज्य के देहरादून नगर व राजधानी में निवास करते हैं। श्री वीरेन्द्र राजपूत जी ने वेदों का काव्यानुवाद किया है। इन्होंने यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का काव्यानुवाद का कार्य पूर्ण कर लिया है।यह सभी काव्यानुवाद अनेक खण्डों में उनकी ओर से एव कुछ आर्य संस्थाओं की ओर से प्रकाशित किए जा चुकें हैं। सम्प्रति वह ऋग्वेद का काव्यानुवाद कर रहे हैं। ऋग्वेद का काव्यानुवाद 10 खण्डों में प्रकाशित करने की योजना है। ऋग्वेद का प्रथम दशांश का लोकार्पण आज दिनांक 1-1-2022 को अमरोहा में ऋषिभक्त तथा आर्यावर्त केसरी पाक्षिक पत्र के सम्पादक एवं प्रकाशक डा. अशोक आर्य जी द्वारा किया गया है। ऋग्वेद काव्यानुसाद के प्रथम दशांश में ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के 107 सूक्तों का काव्यानुवाद प्रस्तुत किया गया है जिसमें 1149 मन्त्रों का काव्यानुवाद सम्मिलित है। इस कार्य को करने में काव्यानुवाद के रचनाकार कवि श्री वीरेन्द्र राजपूत जी का लगभग 1 वर्ष का समय लगा है। श्री वीरेन्द्र राजपूत जी द्वितीय दशांश प्रस्तुत करने की योजना भी बना चुके हैं। इस भाग में ऋग्वेद प्रथम मण्डल के सूक्त संख्या 108 से 191 तक के सभी सूक्तों का काव्यानुवाद होगा। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद काव्यानुवाद के द्वितीय दशांश में ऋग्वेद के दूसरे मण्डल के 1 से 38 सूक्तों के 191 मन्त्रों का काव्यानुवाद कर कुल 1214 मन्त्रों का काव्यानुवाद प्रस्तुत किया जायेगा।

वेद-कवि श्री वीरेन्द्र राजपूत जी का जन्म पिता श्री उमराव सिंह शेखावत एवं माता श्रीमती मीनावती जी के यहां ग्राम झुझेला, पोस्ट फीना, जनपद बिजनौर, उत्तर प्रदेश में दिनांक 20 नवम्बर, 1939 ईसवी को हुआ था। वर्तमान में वह 82 वर्ष की अवस्था प्राप्त कर चुके हैं। उनका शरीर भी कुछ शिथिल हो चला है। अभी जो कार्य शेष है उसमें अनुमानतः 9 वर्ष से अधिक समय का कार्य शेष है। श्री वीरेन्द्र राजपूत जी चाहते हैं कि उन्हें कुछ ऋषि भक्त ऐसे कवि मिल जायें जो ऋग्वेद के शेष कार्य के 7 या 8 भाग का काव्यानुवाद करने का दायित्व ले लें। दूसरे भाग सहित अन्तिम दसवें भाग का काव्यानुवाद वह स्वयं करने का प्रयत्न करेंगे। उन्होंने हमें बताया कि दसवें मण्डल के अन्तिम भाग में वह ऋग्वेद के अन्तिम 1159 मन्त्रों का काव्यानुवाद प्रस्तुत करेंगे। अभी तक उन्हें इस कार्य के लिए कोई वैदिक-कवि सुलभ नहीं हुआ है। इसकी चर्चा श्री वीरेन्द्र राजपूत जी ने आज हमारे साथ की। पहले भी वह इस विषय में हमसे चर्चा कर चुके हैं। हम यह भी बता दें कि श्री राजपूत जी की धर्मपत्नी बहिन सुशीला राजपूत जी विगत कई वर्षों से व्हील चेयर पर हैं। उनके सभी कार्य भी श्री वीरेन्द्र राजपूत जी ही करते हैं। सम्प्रति वह अपनी सुपुत्री व जामाता के देहरादून के मोहित नगर स्थित निवास पर रहते हैं। अन्य कार्यों को करने के साथ वह चार या पांच मन्त्रों व कभी कभी कुछ अधिक मन्त्रों का काव्यानुवाद कर लेते हैं। ईश्वर की उनको यह बहुत बड़ी देन है। इस आयु में भी वह जिस तत्परता से कार्य कर रहे हैं, वह युवा विद्वानों के लिए भी प्रेरणादायक कही जा सकती है।

आज श्री वीरेन्द्र राजपूत जी की धर्मपत्नी माता सुशीला राजपूत जी का 75 वां जन्म दिवस था। इस उपलक्ष्य में उन्होंने अपने निवास पर एक वैदिक यज्ञ का अनुष्ठान किया। यज्ञ के पुरोहित आर्यसमाज के विद्वान पं. वेदवसु शास्त्री जी थे। पण्डित जी ने प्रभावपूर्ण तरीके से यज्ञ सम्पन्न कराया। उन्होंने वैदिक सिद्धान्तों पर अपने विचार भी प्रस्तुत किये। इस यज्ञ में वीरेन्द्र राजपूत जी का पूरा परिवार पुत्र श्री सौरभ कुमार आर्य, पुत्र-वधु, उनकी पुत्री व जामाता सहित उनके स्थानीय सम्बन्धीगण आदि सम्मिलित हुए।

हमारे पूछने पर श्री वीरेन्द्र राजपूत जी ने बताया कि उनके भाई-बहिनों में सबसे बड़ी उनकी बहिन शान्ति देवी जी थी। वह दिवंगत हो चुकी हैं। बहिन से छोटे एक भाई श्री वीर सिंह जी थे। यह वैराग्य वृत्ति के थे परन्तु माता की जिद पर इन्होंने विवाह कर लिया था। उनके तीन पुत्र हैं। श्री वीर सिंह जी ने जीवन भर आरएसएस के प्रचारक के रूप में अपनी सेवायें दीं। श्री वीरेन्द्र राजपूत जी की शिक्षा अमरोहा तथा मुरादाबाद में हुई है। वह तीन विषयों हिन्दी, इतिहास तथा समाजशास्त्र में एम.ए. हैं। उन्होंने राजकीय इण्टर कालेज, रामपुर में अध्यापन कार्य किया है। श्री राजपूत जी ने काव्य लेखन का जो कार्य किया है उसके लिये उन्हें अनेकसंस्थाओं ने सम्मानित भी किया है। वह मुरादाबाद की अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति तथा सागर तंरग प्रकाशन द्वारा साहित्यश्री, साहित्यार्जुन, हिन्दी गौरव तथा शब्द भास्कर सम्मान से आदृत हैं। अखिल भारत साहित्य संगम, आयड, उदयपुर-राजस्थान का वर्ष 2016 का काव्य कौस्तुभ सम्मान भी उन्हें दिया गया था। दयानन्द मठ, दीनानगर-पंजाब में 12 जनवरी, सन् 2006 ईसवी को उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में सम्मान दिया गया। वैदिक वानप्रस्थ आश्रम, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश द्वारा 1 अप्रैल 2012 को भी उन्हें उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त भी लगभग आधा दर्जन संस्थाओं द्वारा वह सम्मानित किये गये हैं। उनका सम्पर्क मोबाइल नम्बर 9412635693 है।

हम अनुभव करते हैं कि श्री वीरेन्द्र राजपूत जी ने चार वेदों के काव्यानुवाद का जो कार्य किया है वह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह कार्य परमात्मा की प्रेरणा, उसके द्वारा प्रदत्त सामथ्र्य तथा शक्ति से ही हो सका है। आर्यसमाज का यह सौभाग्य है कि उसके पास एक ऐसा कवि है जो चारों वेदों का कविता में अनुवाद कर सकता है। इसके लिए उनका सभी आर्य संस्थाओं द्वारा सम्मान किया जाना चाहिये। श्री वीरेन्द्र राजपूत जी में काव्य रचना की जो प्रतिभा है वह हमें अद्भुत अनुभव होती है। वेदों के काव्यानुवाद का इतना वृहद एवं महद कार्य इससे पूर्व किसी ऋषिभक्त विद्वान द्वारा नहीं किया जा सका। ईश्वर करे की उनके द्वारा किया जा रहा कार्य सम्पूर्णता को प्राप्त हो और ऐसा होने पर उन्हें सन्तोष लाभ हो सके। भविष्य में क्या छिपा है, कहा नहीं जा सकता।

श्री वीरेन्द्र राजपूत जी का रचा हुआ जो प्रमुख साहित्य अब तक प्रकाशित हुआ है उसका विवरण इस प्रकार हैः

1- बांध सर कफन चलो सन् 1962 में।
2- दयानन्द महिमा सन् 1995 में।
3- दयानन्द सप्तक सन् 1999 में।
4- दयानन्द शतक सन् 2002 में।
5- प्रभु को नमन हमारा सन् 2000 में।
6- मंगल सूत्र सन् 2001 में।
7- बन्दा बैरागी, खण्ड काव्य सन् 2002 में।
8- सामवेद शतक सन् 2002 में।
9- खण्ड काव्य ‘तारा टूटा’ सन् 2002 में। यह वैदिक मनीषी पं. गुरुदत्त जी के जीवन एवं कार्यों पर है।
10- एक कर्मयोगी जीवन संघर्ष, खण्ड काव्य, 2004 में।
11- वैदिक विनय पत्रिका
12- यजुर् गीत माला
13- शूरता की सप्तपदी, खण्ड काव्य
14- प्रभु के गीत

चार वेदों के काव्यार्थ के 10 भाग प्रकाशित हो चुके हैं। शेष भागों पर कार्य चल रहा है।

हमने आज श्री राजपूत जी से उनकी दो निजी कवितायें भी प्राप्त की हैं। इसे हम पृथक से फेस बुक पर प्रस्तुत करेंगे।

इसी के साथ हम इस लेख को विराम देते हैं और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि श्री वीरेन्द्र राजपूत जी व उनकी धर्मपत्नी माता सुशीला राजपूत जी दीर्घकाल तक स्वस्थ एवं सुखी रहें। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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