उपनिषद में वर्णित राजा अश्वपति की प्रेरक कथा

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उपनिषद रहस्य
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🌷उपनिषद् की प्रेरक कथा🌷

छान्दोग्य-उपनिषद् में एक कथा आती है।
भारत में महाराजा अश्वपति उस समय राज्य कर रहे थे। एक बहुत बड़ा वैश्वानर यज्ञ उनकी राजधानी में होने वाला था। पाँच महानुभाव ब्रह्मज्ञान की खोज में राजा अश्वपति के पास पहुँचे। राजा ने उन्हें कहा कि आपको भी उतना ही धन मिलेगा, जितना दूसरे ऋषियों को मिलेगा, परन्तु ब्राह्मण ने धन लेने से इन्कार किया। तब महाराजा अश्वपति ने सोचा होगा कि इस अस्वीकृति का कारण यह हो सकता है कि उन्होंने समझा होगा कि राजा हूँ; हर प्रकार का धन मेरे कोष में आता है; इसलिए ये ब्राह्मण और महात्मा मेरा दान नहीं लेते। इन्हें सन्देह है कि यह धन अच्छे लोगों का कमाया हुआ नहीं। तभी आगे बढ़कर पूरे आत्मविश्वास के साथ उन्होंने कहा―सुनिये महात्मागण !

न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः ।
नानाहिताग्निर्नाविद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कुतः ।।

“हे विद्वान् ब्राह्मणो ! मेरे देश में कोई भी चोर नहीं, दूसरे के धन को छीनने वाला नहीं। यहाँ कोई कंजूस नहीं। कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो दान न देता हो। कोई ऐसा नहीं जो शराब पीता हो। ऐसा भी कोई नहीं जो प्रतिदिन यज्ञ न करता हो। कोई मूर्ख, अनपढ़ या अविद्वान् भी नहीं। यहाँ कोई पुरुष व्यभिचारी (चरित्रहीन) नहीं , तब व्यभिचारिणी स्त्री कैसे हो सकती है?”

यह घोषणा है जो अध्यात्मवाद के मार्ग पर चलने वाला और दूसरों को इस मार्ग पर चलाने वाला ही कर सकता है। संसार में अन्य राजा-महाराजा और शासक भी तो हुए हैं। आज भी विद्यमान हैं। उनमें से कोई भी ऐसी घोषणा करने का साहस कर सकता है? क्या वह अपने ह्रदय पर हाथ रखकर कह सकता है कि मेरे राज्य में कोई चोर नहीं, कोई डाकू नहीं, शराबी, कंजूस या अनपढ़ और चरित्रहीन नहीं? बहुत बड़े राज्य हैं आज। बड़े विधान-विज्ञान के आविष्कार भी बहुत हैं, परन्तु क्या कोई ऐसा भी राष्ट्र है जहाँ कोई व्यक्ति दुराचारी न हो? बहुत-से ‘वाद’ आज संसार में विद्यमान हैं―साम्यवाद, पूँजीवाद, गणतन्त्रवाद, राज्यवाद, या किसी भी वाद को मानने वाला, किसी देश का मुखिया क्या ऐसी बात कह सकता है? क्या यह घोषणा कर सकता है कि हमारे देश में कोई भी बुरा व्यक्ति नहीं? ऐसी घोषणा केवल महाराजा अश्वपति ही कर सकता था जो अध्यात्मवाद के रहस्य को समझता था। वह स्वयं इस मार्ग पर चलता था, दूसरों को चलाता था।

मैंने देखा कि आज संसार के जितने रोग हैं उन्हें दूर करने की यदि कोई ओषधि है तो वह अध्यात्मवाद है। श्वेताश्वतर-उपनिषद् का ऋषि घोषणा करता है―

यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः ।
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ।।
भावार्थ―“जब मनुष्य आकाश को चमड़े की भाँति लपेट सकेंगे, तब परमात्मा को जाने बिना दुःखों का अन्त भी हो सकेगा।” अर्थात् जैसे आकाश को चर्म की भाँति लपेटना असम्भव है, ऐसे ही आत्मा-परमात्मा को जाने बिना दुःखों से बचना असम्भव है।दुःख भी एक नहीं, दो नहीं, सभी दुःखों की समाप्ति हो जायेगी। यह है प्रत्येक व्याधि की चिकित्सा, प्रत्येक रोग की ओषधि !

सब रोगों की, सब दुःखों की, सब कष्टों की एक ही चिकित्सा है―अध्यात्मवाद। जब कभी संसार पर संकट आया है, जब कभी दुःखों के बादल इस प्रकार उमड़े हैं कि उसे दूसरा कोई मार्ग नहीं मिला, तब अध्यात्मवाद ने ही उसकी रक्षा की है।

(महात्मा आनन्द स्वामी)

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