अबूझमाड़ के सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ कर जहर घोलती ईसाई मिशनरी

अश्वनी मिश्र

छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ इलाका 3905 वर्ग किलोमीटर में फैला है। प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न यह क्षेत्र नक्सलियों और मिशनरियों के आपसी गठजोड़ के कारण अबूझ बन गया है। एक तरफ नक्सली वनवासियों के हाथों में बंदूक थमा रहे हैं, तो दूसरी ओर मिशनरी बाइबिल थमाकर उन्हें उनकी सदियों पुरानी सनातन संस्कृति से दूर कर रहे हैं। नक्सलियों और मिशनरियों नेे पूरे क्षेत्र का माहौल हिन्दू विरोधी बना दिया है। अबूझमाड़ नागालैण्ड की राह पर है। इस अबूझ पहेली को  समझना और सुलझाना समय की मांग हो गई है।
 
अबूझमाड़ ! शेष भारत के लिए आज भी अबूझा, अनजाना। छत्तीसगढ़ के पहाड़ी जंगलों का इलाका। गोंड, मुरिया, अबूझमाडि़या और हलबास लोगों की धरती। छत्तीसगढ़ के नारायणपुर, बिलासपुर और दंतेवाड़ा संभागों में बिखरा लगभग 1500 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र। ये हमारी-आपकी और मीडिया की नजर से ओझल रहने वाले उन भूभागों में से है जहां रोशनी को चुनौती देते वन न जाने कब से खड़े हैं। आजादी के बाद इन इलाकों की ओर जो अनदेखी हुई उसके परिणाम अब सामने आ रहे हैं। इन वनों और यहां के वासियों की पहचान और शांत जीवन दोनों भारी खतरे में है। इन भोलेभाले लोगों की पहचान छुड़ाकर बन्दूक थमाने का खेल खतरनाक रूप ले रहा है। प्रकृति पूजकों, शिव और शक्ति के इन सनातन उपासकों की परम्पराएं मिशनरियों के निशाने पर हैं। अथाह संपत्ति और वेतनभोगियों की फौज लेकर ‘रिलीजन’ के ठेकेदारों ने उन पर पूरी ताकत के साथ हमला बोल दिया है।
 
ये ऐसी लड़ाई है जिसमें होने वाला नुकसान तुरंत नहीं दिखता। अबूझमाड़ में पुरानी हो चुकी इस बीमारी के घाव अब दिखने लगे हैं। नारायणपुर जिले के बड़गांव में रहने वाली 19 वर्षीय राधा ने बताया,  ‘मैं 2009 में ईसाई बनी थी और चर्च जाना शुरू किया। इससे पहले मैं भगवान शंकर और देवी दुर्गा की पूजा करती थी। लेकिन जब से ईसाई बनी तब से मैं किसी को नहीं पूजती। न ही कोई  हिन्दू त्योहार  मनाती हूं। मुझे कोण्डागांव के पादरी ने ईसाई बनाया था। हर रविवार को गांव के चर्च में 50 के लगभग  पास-पड़ोस के लोग जीसस और मदर मैरी की प्रार्थना करने के लिए इकट्ठे होते हैं।’ ‘वहां प्रार्थना के अलावा और क्या होता है ,यह पूछने पर राधा कहती है, ‘प्रार्थना के बाद पादरी हमको  बताते हैं कि जो खुशी यीशु दे सकते हैं वह कोई भगवान नहीं दे सकते। अगर जीवन में खुशियां पानी हैं तो अन्य सब को छोड़कर  यीशु के पास आओ वह तुम्हारे सभी दुख हर लेंगे।  किसी भी देवता में जीसस जितनी ताकत नहीं है जो किसी का दुख हर सके।’ यह अबूझमाड़ की राधा की जुबानी है जबकि ऐसी सैकड़ों हजारों राधा और उनके परिवार हैं। किसी को भूत प्रेत, नरक आदि का भय दिखाकर तो किसी को झाड़- फूंक का लालच देकर, किसी को पैसे का लालच देकर  तो किसी को भावनात्मक रूप से ‘ब्लैकमेल’ करके ईसाई बनाया गया है। इन नवदीक्षित ईसाइयों में हिन्दू संस्कृति और वनवासी परम्पराओं के प्रति नफरत बोयी जा   रही है।
छिनती  पहचान
अबूझमाड़ में मिशनरियों के इन ताजा शिकारों के  मन में उनकी परम्परागत पहचान के खिलाफ ऐसा जहर भर दिया गया  है कि  अब वे अपनी  जन्म से ‘हिन्दू’ पहचान को भी छिपाने लगे  हैं। उनके सगे  सम्बन्धी – मित्र वगैरह, जो ईसाई नहीं बने हैं, उनको वेे हीन  भाव से देखते हैं और इसमें उनकी गलती भी क्या जब उनके ये तथाकथित नव मुक्तिदाता उन्हें ऐसा करने के लिए उकसाते है, ताकि कन्वर्जन की रफ्तार को बढ़ाया जा सके। इस महामारी का व्याप बहुत बड़ा है। वर्तमान में प्रदेश का शायद ही कोई वनवासी जिला मिशनरियों की वक्रदृष्टि से बचा हो । सब जगह उद्योग स्तर पर कन्वर्जन का धंधा चल रहा है। वनों की संस्कृति व कुटुम्ब परम्परा को तोड़ा जा रहा है। हिन्दू रीति-रिवाजों को जड़-मूल से नष्ट करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। बहुत सोचे-समझे ढंग से इन वनवासियों के  मनों में ‘गैर हिन्दू’ होने का जहर बोया जा रहा है। इन वनवासियों के बीच  मिशनरियों का सदी पुराना खेल है- ‘तुम हिन्दू नहीं हो।  तुम तो आदिवासी हो। तुम्हे शहर में रहने वाले इन हिन्दुओं से संघर्ष करना है।’
 
वैसे ईसाई मिशनरियों के कुकृत्यों को जानने और देखने के लिए नारायणपुर-ओरछा (अबूझमाड़) सटीक स्थान है। ‘हर गांव चर्च-हर हाथ बाइविल’ के गुप्त नारे के साथ लोभ, लालच और छल प्रपंचों से वनवासी समदुाय के  हजारों बंधुओं  को गुप्त (क्रिप्टो किश्चियन) अथवा प्रकट रूप में  ईसाई बनाया जा चुका है। अकेले नारायणपुर जिला ही नहीं प्रदेश के लगभग 8 जिलों बस्तर, नारायणपुर, बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा, कोंडागांव, महासमुंद  एवं जगदलपुर में ईसाई मिशनरियों का कार्य अपने चरम पर है।  सेवा के बाने में कन्वर्जन का खेल  खुलेआम खेला जा रहा है।
नारायणपुर में  नागालैंड वाला षड्यंत्र
राजधानी रायपुर से लगभग 340 किमी. की दूरी पर नारायणपुर जिला है। आमतौर पर हमारे मन में एक जिले की जिस प्रकार की कल्पना होती है उससे यह जिला बिल्कुल भिन्न है।  वनों से घिरा हुआ यह क्षेत्र प्राकृतिक संपदा के मामले में धनी है। पहाड़ और वनों से यह पूरा क्षेत्र आच्छादित है। सागौन के वन इस क्षेत्र की पहचान हैं। रायपुर से  सिर्फ सड़क रास्ता ही जाने के लिए है। मैं भी बस से नारायणपुर सुबह पहुंचा और किसी तरह ठहरने के लिए स्थान का इंतजाम हुआ। वैसे ठहरने के लिए होटल या विश्राम गृह खोजने पर भी मिलना यहां संभव  नहीं है। यह सिर्फ इसलिए क्योंकि यह क्षेत्र पूर्ण तरीके से नक्सल-मिशनरी प्रभावित है और लोगों में एक डर का सामान्य तौर पर माहौल बना रहता है। नारायणपुर से अबूझमाड़ की सीमा लगभग 15 किमी़ दूरी से प्रारम्भ हो जाती है। धीमा -धीमा सरकता दिन, टूटी-फूटी सड़कें, ऊंचे-नीचे रास्ते, किलोमीटरों तक सिर्फ वन ही वन, निर्जन क्षेत्र, नक्सलियों का मौन आतंक, दबी जुबान में सुनाई  जाने वाली  नक्सली बर्बरता की कहानियां और मिशनरियों की सरगर्मियां। 
 
अबूझमाड़ की प्रमुख जनजाति माडि़या है और उपजाति अबूझमाडि़या। वैसे यहां गोंड, हल्बा एवं कुछ अन्य वनवासी जातियांे की भी ठीकठाक संख्या है। एक दुकान पर नारायणुपर के ही स्थानीय निवासी राजेन्द्र कुमार देशमुख से भेंट हुई। 65 की उम्र पार कर चुके देशमुख शिक्षक पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। जब उनसे ईसाई मिशनरियों के षड्यंत्रपूर्ण कार्य के विषय में पूछा तो वे कहते हैं, ‘यहां मिशनरियां हिन्दुओं को कन्वर्ट करने के लिए अंधाधुंध पैसा झोंक रही हैं। अगर इस क्षेत्र पर ध्यान नहीं दिया गया तो नारायणपुर नागालैंड बन जायेगा।’ उनकी बात यूं ही खारिज नहीं की जा सकती। वे आगे और बताते हैं कि’ इस क्षेत्र में  गांव के  गांव आज ईसाई हो गए हैं। नारायणपुर जिले के वनवासी लोगों को कन्वर्ट करके  एक गांव बसाया गया है जिसका नाम ‘शान्ति नगर’ है। अधिकतर गांव जहां पर मिशनरियों की वक्रदृष्टि पूरी तरह से पड़ी वहां 80 प्रतिशत हिन्दू आज ईसाई बन चुके हैं और तो और गढ़बंगाल गांव में 70 प्रतिशत जनसंख्या अब ईसाइयों की है।’
 
ओरछा तक पहुंचकर ही यह समझ में आने लगता है कि मिशनरी आक्रमण के चलते इस क्षेत्र की सनातन पहचान  मटियामेट होने को है। ओरछा के आगे बीहड़ वनांचल जहां पहुंचना बेहद कष्टप्रद है।  उन स्थानों पर क्या होगा इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है । यहां प्रचुर संसाधनों से लैस मिशनरी सबको धता बताते हुए अपने पांसे फेंकने में लगे हैं। यहां मिट्टी के बने चर्च तेजी से खड़े हो रहे हैं और आंगाओं के घर अब उजड़ने लगे हैं। परम्परा से जंगल में सम्माननीय गायताओं,माझियों और गुनियाओं का सम्मान समाज के भीतर से योजनाबद्घ ढंग से समाप्त किया जा रहा है।  छत्तीसगढ़ के वनांचलों  में पूरी साठगांठ के साथ यह खेल  जारी है।
 
टूट रहे हैं कुटुंब
जिन लोगों को ईसाई बनाया जाता है उन्हें बरगलाया जाता है कि अब वो अपने कुटुंब के दूसरे सदस्यों को भी ईसाई बनने के लिए दबाव डालें।  ऐसे बहुत से परिवार यहां मिलते हैं जो ईसाई बने हैं और अपने सम्बन्धियों द्वारा बनाए जा रहे दबाव से बेहद तनाव में हैं। घरों में झगडे हो रहे हैं।  परिवार टूट रहे हैं। सोनबाई उसेंडी अपने घर के मुख्य द्वार पर बूढ़ाबाबा (भगवान शंकर) का एक बड़ा चित्र लगाए हुए हैं। उनसे ओरछा में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों पर पूछा तो वे कहती हैं ‘यहां पर मिशनरियों का तांता लगा रहता है। अभी कुछ दिन पहले ‘बाम्बे वाली’ नाम से एक महिला पादरी आई थी और लगभग वह इस क्षेत्र में 2 वर्ष तक रहीं। वे इस क्षेत्र में घर-घर जाकर प्रचार करती थीं और लोगों को कन्वर्ट करती थीं। इस पादरी महिला ने माड़ में 2 वर्ष में ही सैकड़ों लोगों को ईसाई बना दिया।’ वे आगे बताती हैं कि ‘मिशनरियों की हालत यह है कि जिस घर में उन्हें नई लड़की दिख जाती है उस घर पर उनकी निगाह बनी रहती और यह निगाह तब तक बनी रहती है जब उसके गले में क्रॉस न पहना दें ।’
 
सोनबाई भरे गले से कहती हैं, ‘मेरे परिवार के तीन सदस्यों को इन लोगों ने ईसाई बना दिया। जो रोज आकर मुझसे लड़ते हैं और ईसाई बनने के लिए जोर देते हैं। लेकिन मैंने उन्हें मना कर दिया है और कहा कि मैं अपने धर्म में ही जिऊंगी और अपने ही धर्म में मरूंगी। हमारा तो एक ही देव है वह है बूढ़ाबाबा। मुझे बड़ा दुख होता है कि जब लोग अपने धर्म को छोड़कर ऐसे स्थान पर जाते हैं जहां कोई किसी का नहीं है। जिस दिन आप ईसाई बन जाते हैं मिशनरी उस दिन  जीवन को मझधार में  ही छोड़कर चले जाते हैं और तब आप कहीं के नहीं रहते हो।’
 
निशाने पर वनवासी
मुरिया, गोड़ ,उरांव, माडि़या, पनक, राऊत, मरार, महारा, हलवा, साहू, यादव, खसिया, लोहार ये सभी जातियां वनवासी समाज की प्रमुख जातियों में से एक हैं। सरकार की ओर से इन्हें संरक्षित करने की बात समय-समय पर सामने आती रहती है। लेकिन जब अबूझमाड़ में आप प्रवेश करते हैं तो अधिकतर गांवों में देखने को मिलता है संरक्षण की बात तो इतर है जबकि मिशनरियों के निशाने पर यही जातियां हैं।  इन्हीं जातियों के सबसे ज्यादा लोग कन्वर्ट हो रहे हैं। अबूझमाड़ क्षेत्र के रहने वाले ननकूराम वनवासी जातियों के मिशनरी निशाने की बात पर कहते हैं, ‘ इन जातियों में अशिक्षा का घोर अभाव है। लोग न के बराबर पढ़े हुए हैं और जो थोड़ा बहुत  पढ़ लिख जाते हैं वे यहां रहना पसंद नहीं करते।  यहां के लोग अभी भी 18वीं शताब्दी जैसे साधनों में जीवन यापन कर रहे हैं।’
 
वे एक बार को बार-बार ध्यान दिलाते हैं कि  इस क्षेत्र में जानबूझकर के ऐसा माहौल तैयार किया गया है कि लोग आगे न बढ़ सकें। यहां आकर वनवासी लोगों को कोई भी कुछ भी बता देता है वह सच मान लेते हैं। चूंकि कोई सही गलत बताने वाला नहीं है इसलिए मतलबी लोग जैसा कहते हैं ये  करते चले जाते हैं। मिशनरियां हिन्दू  परम्पराओं और संस्कृति पर चोट करती हैं। यहां तथाकथित आदिवासी बनाम हिन्दू नामक पाठ पढ़ाया जाता है । हिन्दुओं से घृणा करना सिखाया जाता है। दरअसल ( प्रथम वासी या मूल वासी) शब्द अंग्रेज देकर गए हैं। पाठ्यक्रमों में आयोंर् के आक्रमण का जो कपोल कल्पित सिद्धांत ठूंसा गया है वह ऐसे लोगों के बहुत काम आता है।  मिशनरी और नक्सली दोनों ही इन्हें समझाते हैं कि तुम लोग ‘आदिवासी’ हो , भारत पर आयोंर् ने हमला करके यहां के लोगों को जंगलों में खदेड़ दिया था। वे आर्य हमलावर हिन्दू हैं और तुम लोग मूल निवासी यानी आदिवासी।
परम्पराओं को मिटाने पर आमादा उन्मादी
गांव पखूरपारा के निवासी ठाकुर रामेश्वर सिंह कहते हैं कि’ ईसाई मिशनरियां गांव के लोगों से  कहती हैं कि आप कोई भी हिन्दू सूचक चिन्ह न ही बांधेंगे और न ही लगाएंगे। भगवान सिर्फ यीशु हैं और कोई नहीं। वह परम्परा जो हजारों सालों  से चली आ रही है ये लोग उसे नष्ट कर रहे हैं। जो धार्मिक व पारम्परिक यात्राएं यहां होती चली आ रही थीं वे अब बंद होने की स्थिति में हैं। जिन बूढ़ाबाबा(शंकर) को हम पूजते थे अब उन्हीं के खिलाफ सुनने को विवश हैं। मिशनरियों के लोग इन क्षेत्रों में एक छद्मयुद्घ  लड़ रहे हैं।’ बस्तर के तुलसीदास के रूप में विख्यात साहित्यकार एवं पत्रकार रामसिंह ठाकुर (84) जिन्होंने दो पुस्तकें, रामचरित मानस एवं श्रीमद्भगवद्गीता का हलवी में अनुवाद किया है। वे कहते हैं कि ‘अंग्रेज यहां तराजू (व्यवसाय) लेकर आए थे लेकिन मिशनरी अब ‘माला’ लेकर आए हैं। वे सेवा के नाम का ढोंग रचाकर कन्वर्जन का खेल वनवासी लोगों के साथ खेल रहे हैं।
 
हाल के  दिनों में इनकी गतिविधियां बढ़ गई  हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि नारायणपुर मिशनरियों का गढ़ बन रहा हो।’  वे माड़ की संस्कृति को बताते हुए कहते हैं कि ‘यहां के देवी-देवता एक जीवित परम्परा हैं। वे भव्य नहीं हैं, धनाढ्य नहीं हैं, बड़े-बड़े महलों और मंदिरों के भीतर आसीन नहीं हैं, लेकिन यहां की  अनुपम संस्कृति के मान बिन्दु हैं। इन्हीं देवताओं में बस्तर की जनजातियां ईश्वर का दिव्य रूप देखती हैं। बस्तर भूमि का अपना मातृसत्तात्मक देव परिवार है। देवी दंतेश्वरी के साथ इस परिवार में पाटदेव प्रमुख हैं। इसके साथ ही देवी के सहायक देवी- देवताओं के स्थान गांव-गांव में हैं। यह मिट गए तो ये अंचल  कुरूप हो जाएगा। 
 
प्रदेश में मिशनरियों के फैलते पैर
प्रदेश के महासमुंद, जगदलपुर, नारायणपुर, बस्तर, सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर, जिले जो पूरी तरीके से वनवासी बहुल हैं। इन जिलों में आज स्थिति यह है कि गांव-गांव चर्च खड़े हो रहे हैं या किसी न किसी ईसाई के घर में चर्च का रूप देकर गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। प्रकाश में आते आंकड़ों की मानें तो प्रदेश के जगदलपुर जिले की स्थिति यह है कि लगभग 40 प्रतिशत जमीनें मिशनरियों की हो गई हैं और इसी की आड़ में कन्वर्जन का खेल हो रहा है। कमोबेश कुछ इसी प्रकार का हाल नाराणपुर का है। नारायणपुर के निवासी गौतम गोलक्षा कहते हैं कि आज का हाल और मिशनरियों की गतिविधियों को देखकर ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ का यह जिला भी दूसरा नागालैंड होगा। एक दूरगामी रणनीति के तहत मिशनरियां इस क्षेत्र में अंधाधुध तरीके से वनवासियों को कन्वर्ट करने में लगी हैं और उन्होंने इस कार्य में अत्यधिक सफलता भी पाई है। जिले के अधिकतर गांवों में इन्होंने हिन्दुओं को ईसाई बना दिया है या उनका ‘ब्रेनवास’ कर दिया है। गोलक्षा कहते हैं कि जब उन्हें कुछ हिन्दुओं को ईसाई बनाने में सफलता नहीं मिलती है तो वह वनवासी समाज के मनों में जहर बो देते हैं। उन्हें लगने लगता है कि हम हिन्दू नहीं है। वे वनवासी समाज के मनों में हिन्दू न होने का भान करा देते हैं और ‘आदिवासी’ एवं हिन्दू के बीच खाई को बढ़ा देते हैं ।
 
 
बच्चा नहीं होता तो दुआ लो…
बच्चा नहीं होता तो दुआ लो, स्वास्थ्य ठीक नहीं होता तो दुआ लो, खुशी नहीं मिलती तो दुआ लो, सुखी जीवन जीना हो तो दुआ लो। बुखार न उतरे तो दुआ लो। यह खेल अबूझमाड़ में अशिक्षित और वनवासी लोगों के मध्य खेला जा रहा है। यहां एक दो व्यक्ति के ऐसे किस्से प्रचलित किए जाते हैं और उन्हें बताया जाता है कि चर्च में जाने और उनकी प्रार्थना करने से सब ठीक हो जायेगा और सारी विपदाएं दूर हो जाएंगी। और जब यह किस्सा प्रचलित हो जाता है तो ईसा मसीह की भेड़ों की संख्या बढ़ाने वालों की दुकान चल निकलती है।
 
ओरक्षा के रास्ते में एक महिला गुदरी, रायनार निवासी ने मेरी गाड़ी को हाथ दिया। गाड़ी रोककर मेरे साथी ने उससे पूछा कि कहां जाना है तो उसने (माडि़या भाषा) में कहा कि वह ओरछा जाना चाहती है। वह पास के ही गांव की रहने वाली थी। मेरे साथी ने उसकी भाषा को समझा और बताया कि वह गर्मी से परेशान है और चलते-चलते थक चुकी है। मैंने हां की और गाड़ी में बैठा लिया। कुछ दूर चलने के बाद मैंने उससे पूछा कि आप ओरछा क्यों जा रही हैं? तो उसने बताया  कि वह अपने बच्चे, जो बुखार से तप रहा था, के लिए दुआ और दवा लेने के लिए चर्च जा रही है। वह 3 साल पहले से ईसाई बनी थी और अब उसका पूरा परिवार ईसाई बन चुका है। पादरियों की दुआ से इलाज की सचाई को शिक्षित व्यक्ति तो समझ सकता है लेकिन अनपढ़ लोग दिन प्रतिदिन  इस जाल में फंस रहे हैं। यहां के चचोंर् में जो दवाई की पुडि़या बांटी जाती है उस पर जीसस का चित्र होता है। बीमार और उसके परिवार को बताया जाता है कि दवा में चर्च की दुआ है। अंधविश्वास निर्मूलन के लिए कौन आने वाला है यहां।
 
मिशनरियों का प्रमुख केन्द्र ओरछा
 
 
नारायणपुर जिले से लगभग 50 किमी. की दूरी पर ओरछा तहसील स्थिति है। यह क्षेत्र पूरी तरीके से नक्सली एवं मिशनरी प्रभावित है और मुख्य धारा से बिल्कुल  कटा हुआ है। स्थिति यह है कि इस क्षेत्र में पहुंचने के बाद ऐसा लगता है कि हम कहीं दूसरी दुनिया में आ गए हैं। अशिक्षा का घोर वातावरण है। यहां के समाज को देश और दुनिया के विषय में सामान्य रूप से कुछ नहीं पता। इसी ओरछा की स्थिति यह है कि आज 65 प्रतिशत हिन्दू लगभग कन्वर्ट हो चुके हैं। यह सभी ‘क्रिप्टो किश्चियन’ हैं। सरकारी कागजों में वनवासी और समाज में ईसाई बनकर यह षड्यंत्रपूर्ण कार्य कर रहे हैं। यह क्षेत्र बहुत ज्यादा बड़ा तो नहीं है लेकिन फिर भी यहां पर ज्ञात रूप में 3 छोटे-बड़े चर्च चलते हैं। लेकिन अज्ञात रूप से घरों में दर्जनों चर्च संचालित हैं।  माड़ के अंदर के गांव गोदाड़ी, मरदेल, रायनार, टुड़ावेड़ा, टूलूर, भटमपारा में सैकड़ों लोग कन्वर्ट होकर ईसाई बन चुके हैं। ओरक्षा के ही एक सरकारी संस्थान में वर्षों से कार्यरत बैजनाथ (नाम परिवर्तित) कहते हैं कि यहां मिशनरियां और नक्सलियों के विरोध में बोलना यानी अपनी जान से हाथ धोना है। खुलेआम यहां मिशनरियों को नक्सली कार्य करने देते हैं। वे इस क्षेत्र में अपनी मनमर्जी कर रही हैं और जिस भी क्षेत्र में कार्य करने लगती हैं उस क्षेत्र को कन्वर्ट करके ही मानती हैं।’
 
असल में नक्सलियों और मिशनरियों की यह गुप्त संधि है। केरल, नागालैंड, मुम्बई और दिल्ली से इन स्थानों पर ईसाई प्रचारक आते हैं और यहां पर वह अपना काम कर चलते बनते हैं। ओरछा के ही उच्च प्राथमिक विद्यालय में तैनात शिक्षक दिवाकर प्रसाद द्विवेदी कहते हैं,’मैं यहां पर दशकों से कार्य कर रहा हूं। ईसाई मिशनरियां यहां पर गरीबी और अशिक्षा पर वार कर रही हैं। यहां हाल के दिनों में मिशनरियों का अंधाधुंध आना जारी है।’
बंदूक और बाइबिल की साठगांठ
अबूझमाड़ में नक्सलियों और मिशनरियों का गठजोड़ स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। नक्सली सब कुछ जानकर भी इनके कार्य में कोई रोड़ा उत्पन्न नहीं करते । कारण साफ है कि दोनों का मतंव्य एक ही है। देश के खिलाफ छद्म युद्ध। मिशनरियां वनवासी क्षेत्रों के सामाजिक ताने- बाने को अपने तरह से व्याख्यायित करके बौद्धिक लड़ाई को हथियार के तौर पर प्रयोग कर रही हैं जिसकी आड़ में वह ऐसा बुन रही हैं जिससे आंचलिक पहचान और गरिमा  शनै-शनै मटियामेट हो जाए। दुर्भाग्य से इनके पीछे वे लोग अधिक हैं, जिनका निहितार्थ कन्वर्जन  है। उत्तरपूर्व और झारखण्ड के साथ जो हुआ वही अब छत्तीसगढ़ के कई जिलों में दोहराने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। यह क्षेत्र चूंकि लाल-आतंकवाद के सीधे प्रभाव में है, वहां की सामाजिक अवस्थिति भय, अराजकता, पलायन तथा किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्थिति में है।  ऐसे में बड़ी ही असानी से यहां पर नक्सलवादी वनवासियों के हाथों में बंदूक थमा रही हैं तो मिशनरियां बाईबल पकड़ा रही हैं। वनवासी क्षेत्र के धार्मिक तानेबाने को समझने से पहले उस राजनीति को भी जानना होगा कि अचानक क्या हुआ कि वह अंचल में सामाजिक दरारें पैदा हुईं। बस्तर के निवासी और लेखक राजीव रंजन प्रसाद इसी मुद्दे को केन्द्र में लेकर कहते हैं कि यहां जारी विचारधारा की लड़ाई जिन दरारों को चौड़ा करने के उद्देश्य से लड़ी जा रही है उसमें से एक पक्ष धार्मिक भी है। नक्सली और मिशनरी सहसम्बद्घता के साथ यहां के अंदरूनी क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। आज स्थिति यह है कि वनवासी पलायन करने को बाध्य हो रहे हैं वहां आश्रय ढूंढते अन्य क्षेत्रों के ऐसे वनवासी पहुंच रहे हैं जो वस्तुत: ईसाई हो गये हैं?
 
क्या यह सोचा समझा रास्ता निकाला गया था एक व्यापक समाज के धार्मिक तानेबाने को बदलने का? इसकी संवाद में गहरे उतरने पर नक्सली और ईसाई मिशनरी गठजोड़ भी सामने आता है। शुभ्रांशु चौधरी की किताब(उसका नाम वासु नहीं) में मिलता है। किताब में नक्सलवादियों के साक्षात्कारों को आधार बनाकर प्राप्त सूचनाओं का संग्रहण है। एक नक्सलवादी साक्षात्कार के हवाले से वे लिखते हैं कि-उरांव नामक आदिम जाति के लोग एक दशकपूर्व  उत्तरी छत्तीसगढ़ से बस्तर पलायन करने लगे। उरांव के साथ ईसाई मिशनरियां भी आईं और हमारे बहुत से लोग ईसाई बन गए। उनके मत परिवर्तन के कारण तर्क संगत नहीं थे। कोई कहता कि यीशु ने मेरे बेटे को ठीक किया तो कोई सुख प्राप्ति की बात बताता। उस समय हमारे ईसाई मिशनरियों से मतभेद गहरे नहीं थे। हमें उनके कार्य से कोई कठिनाई नहीं थी। लेकिन हमने मत परिवर्तन के लिए मना कर दिया।  लेकिन शायद बाद में मुझे गलती का अहसास हुआ और वर्ष 2003-04 के बाद हमने उनके साथ हाथ मिला लिया। अब हमें मिशनरियों के काम, काम करने के तरीके, जंगल के भीतर फैलते चचोंर् और इन सब के कारण तेजी से बदलती जा रही आदिवासी संस्कृति से कोई शिकायत नहीं है।
 
आज माड़ में ऐसा लगता है कि चर्च और ईसाई ऐसे रह रहे हैं जैसे वह युगों से यहीं के निवासी हों। सवाल उठता है कि आखिर मिशनरी और माओवादी गठजोड़ के पीछे कहीं वह कथित विदेशी पैसा भी तो नहीं, जिसका एक बड़ा भाग वह अपने कार्य और नक्सलियों के देशविरोधी कार्य को करने के लिए देते हैं? आखिर धर्म को अफीम मानने वाले लोगों को हिन्दू देवी-देवताओं से शिकायत है लेकिन क्रिश्चियन देवता के वे आश्रयदाता स्वयं बन गये हैं? यह ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक विरासत बस्तर के वनवासियों की साझा है। गैर वनवासी समाज में सवार्ेच्च सम्मान प्राप्त देवी दंतेश्वरी को राजनीति कभी बांट सकेगी, यह कल्पना से परे है।
 
अकेले नारायणपुर में ही मिशनरियों के 13 चर्च हैं और  मांड के गांवों में उन्होंने 50 से ज्यादा छोटे-बड़े चर्च बना रखे हैं, हजारों लोग हिन्दू से ईसाई बन चुके हैं।
 
 
क्रिप्टो क्रिश्चियन यानी छद्म ईसाई
क्रिप्टो क्रिश्चियन मतलब ‘छुपे  ईसाई।’ ये नवदीक्षित ईसाई सरकारी प्रपत्रों पर अपने को हिन्दू (वनवासी) दिखाते हैं लेकिन  होते हैं असल में ईसाई। चंूकि संविधान द्वारा प्रदत्त यह सुविधा कन्वर्जन कर लेने से स्वत: ही समाप्त हो जाती है। इसलिए मिशनरी इन लोगों को धोखाधड़ी भी सिखाते हैं। यानी सरकारी कागज में हिन्दू और  वास्तविक जीवन में ईसाई। इस प्रकार ये लोग  वंचित समाज और वनवासी समुदाय को मिलने वाली सभी सुविधाओं का लाभ लेते रहते हैं।
 
 
मिशनरियों का ‘सॅाफ्ट टारगेट’ हिन्दू नवयुवतियां
छत्तीसगढ़ के जो जिले पूरी तरह से वनवासी हैं उन स्थानों पर मिशनरियों ने अपना एक आसान निशाना  तय कर रखा है। वे  इन क्षेत्रों में 15  से 20 वर्ष की नवयुवतियों को शिकार बना रहे हैं। अशिक्षा, निर्धनता व चिकित्सा साधनों के अभाव का लाभ उठाकर , बरगलाकर वे इन लड़कियों को बड़ी ही आसानी के साथ ईसाई बना रहे हैं। दूरदराज इलाकों की इन लड़कियों को फुसलाना आसान होता है।  इसी का फायदा मिशनरी उठाते हैं।  कई युवतियां मानव तस्करी का शिकार हो जाती हैं। इन जंगलों के बाहर जो आधुनिक जंगल हैं वहां खो जाने के बाद इनमें से ज्यादातर कभी वापस नहीं लौट पातीं । छोटे-छोटे गांवों  के नयी उम्र के लड़कों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।   उन्हें देश के प्रमुख चचोंर् में घुमाने के लिए ले जाया जाता है। शहर की चमक-दमक दिखाकर फुसलाया  जाता है कि ईसाई बनने से कितनी भव्य जीवन शैली हासिल हो जाती है। ईसाई बनने वाले इन किशोरों को  पहला लक्ष्य दिया जाता है उनका अपना परिवार,  फिर आस-पड़ोस के घर।
 
‘जाति व्यवस्था की खाई पाटना जरूरी’
हमारी जातिव्यवस्था के कारण आज वनवासी समुदाय समाज से दूर होता चला जा रहा है। इन्हें समय-समय पर दबाया गया है और इनके साथ अन्याय किया गया है। इन्हें उच्च वर्ण द्वारा दबाया गया, इनके जल, जंगल और जमीन पर कब्जा किया गया। इसके कारण वह विपन्न ही बना रहा और आज भी उसकी यही हालत है। हमारी सरकारों ने उनके संसाधनों पर एक तरीके से डाका डाला है और जिन चीजों पर उनका हक है उनसे उनको बेदखल किया है। इसी का परिणाम है कि इन क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों की पैठ बढ़ी है। वे वनवासियों को शिक्षा और चिकित्सा के बहाने कन्वर्ट करते हैं। मिशनरी जानते हैं कि यहां पर आसानी के साथ वे अपने लक्ष्य को पा लेंगे और बड़ी संख्या में लोगों को कन्वर्ट कर लेंगे। हमारी सरकारें उनके बच्चों को शिक्षा- चिकित्सा नहीं दे पा रही हैं,जिसके कारण वे कन्वर्ट हो रहे हैं। आज स्थिति यह है कि ईसाई देशों से बेहिसाब पैसा इन क्षेत्रों के लिए आ रहा है। मिशनरी इसी पैसे के बल पर वनवासी लोगों को कन्वर्ट करने में लगे हुए हैं। क्योंकि ईसाई देशों को पता है कि भारत की कहानी क्या है। उनको पता है कि यहां जाति व्यवस्था की खाई इतनी चौड़ी है कि किसी को भी बड़ी आसानी से कन्वर्ट किया जा सकता है।
 
भोले लोगों को ठगने की ‘चंगाई सभा’
एक बड़ा हॉल़.़ हॉल में छत से मंच पर पड़ती हुई रोशनी़.़। सैकड़ों की संख्या में मंच के सामने बैठे हुए लोग़.़। मंच पर मौजूद हाथ में माइक लिए हुए एक पादरी, जो ‘परमात्मा के बेटे जीसस’ की शरण में आने पर बड़ी से बड़ी बीमारियों और भूत-प्रेत भगाने का दावा कर रहा है। नाटक शुरू होता है़.़अचानक भीड़ में से एक महिला खड़ी होती है। कुछ ही मिनट में महिला जोर से चिल्लाने लगने लगती है़.़ सिर पटकती है़, बाल को हवा में घुमाती है। पादरी महिला को मंच पर लाता है। उसकी समस्या को समझता है और उससे भी पूछता है। लोगों का मजमा लगा होता है। उनके सामने ही पादरी प्रार्थना करने लगता है ‘कम आउट इन द नेम ऑफ जीसस’ और तेजी से चिल्लाता है कि शैतान उस महिला को छोड़ दे़। वह प्रभु की शरण में आ चुकी है। महिला धीरे-धीरे शांत हो जाती है और कहती है कि मैं ठीक हो गई। मैं ठीक हो गई।
 
पादरी कहता है, जीसस अपने सब बच्चों पर दया करता है। जो भी उसकी शरण में आएगा उसके दुख दूर होंगे। पटकथा को आगे बढ़ाते हुए पादरी हिन्दुओं को बरगलाते हुए कहता है कि हिन्दू-देवी देवताओं की मूर्ति घर में रखने के कारण उसके अंदर बुरी आत्मा घुस गई है। उन्हें जाते ही घर से बाहर फेंक दो। ठीक होने का दावा करने वाली महिला भी कहती है कि यह सब जीसस की वजह से हुआ है-‘थैंक यू जीसस- होले लुइया।’ असल में यह दृश्य मिशनरियों द्वारा ‘भेड़ संख्या’ बढ़ाने के लिए होने वाली चंगाई सभाओं का है। चंगाई सभा की पूरी पटकथा पहले से तैयार होती है। पटकथा के किरदार पहले से भीड़ में शामिल होते हैं। कब, क्या और क्यों बोलना है हर चीज तय होती है। इसमें जीसस के नाम से चमत्कार का दावा किया जाता है और इस चमत्कार को दिखाने के लिए आस-पास के लोगों को बुलाया जाता है विशेष तौर से  विकलांग, नेत्रहीन व असाध्य बीमारियों से ग्रसित लोगों को। मिशनरियों द्वारा सभा में यह  दावा  किया जाता है कि अब जीसस के चमत्कार से सब चंगे हो जाएंगे़..,जीसस सभी बीमारियों को दूर कर देंगे़.़।  बस यहीं से शुरू होता है ईसाई मिशनरियों का खेल चंगाई सभा में कन्वर्जन करने का।
 
गांव के गांव बन रहे ईसाई
अबूझमाड़ के अधिकतर गांव कन्वर्जन के शिकार हो रहे हैं। जिले के पालकी, बिजली बागडोगरी, सीतापाल, कुकड़ाझोर, खड़का गांव, छिपरैल, टिमना, गढ़बंगाल, ताडूपाल, करलख्खा,ओरछा, रेमाबंड, जंबरी, मरकाबेड़ा, कोंगेरा, बेनूर, टिन्नार, ऐड़का, राजापुर, चिपरैल, डोंगर, बेरईबेड़ा, गंराजी, देवगांव,भुंजमेटा, कापसी, फरसगांव, बाकुलवाही, चांदागांव, छोटेडोंगर, धौड़ाई सहित अनेक वनवासी गांवों में  मिशनरियों ने अपने जाल को फैला रखा है। अधिकतर वनवासी गंावों में मिशनरियों ने चर्च बना रखे हंै और जहां चर्च नहीं बनाया है वहां पर यह किसी घर को चर्च का रूप देकर अपनी पूरी गतिविधि संचालित करते हैं। अशिक्षा के कारण इन गांवों में वनवासी समाज का अधिकतर हिस्सा हिन्दू से ईसाई बन चुका है या फिर बनने की कगार पर है।
 
 केरल से  आता है पैसा…
‘मैं आश्रित दास, लाखागढ़, जिला महासमुंद के बिलिवर्स चर्च का पादरी हूं। मैंने 17 फरवरी को लाखागढ़ के सैकड़ों हिन्दुओं को पैसे का लालच देकर ईसाई बनने पर जोर दिया और उन्हें ईसाई समाज के चुनाव कार्यक्रम में ले गया।  इस पूरे कार्यक्रम में जितना भी पैसा खर्च हुआ उसे नेल्सन ताण्डी ने वहन किया। मुझे चर्च के ही नेल्सन ताण्डी, अनूप ताण्डी व माइकल पीटर ने कहा था कि हिन्दुओं को लालच देकर ईसाई मत में लाओ। मुझे पूरी जानकारी है कि हिन्दू से ईसाई बनाने के लिए अथाह पैसा केरल के त्रिवल्ला से आता है और उसी से मुझे वेतन मिलता है।’  यह बात आश्रित दास ने पुलिस को दिए शपथ पत्र में स्वीकारी है।
 
यह पूरा मामला 17 फरवरी, 2015 का है। उस दिन ईसाई समाज के मतदान कार्यक्रम में अनेक हिन्दुओं की एक सूची बनाकर ईसाई नामों से चिपकाई गई। इस बात की खबर जैसे ही हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों को हुई लोगों ने विरोध किया। उस सूची में जिन लोगों का नाम था वे भी इसका विरोध करने लगे।  वे लोग कहने लगे कि हम लोगों को बहला-फुसलाकर कार्यक्रम में ले जाया गया था। इसके बाद उस कार्यक्रम की पोल-पट्टी खुली। लोगों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझते हुए पादरी  से पूछताछ की, जिसके बाद उसे गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। लेकिन घटना के बाद जिन लोगों के नाम ईसाई सूची में आ गए थे उनको अब समाज की ओर से दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।  रामसिंह यादव, जिनका नाम उस सूची में दर्ज है, वे कहते हैं, ‘मेरे एवं मेरे परिवार के  लोगों के नाम सूची में डाल कर  मिशनरी यहां  षड्यंत्र कर रही हैं। लेकिन इससे हमारा बहुत कुछ बिगड़ गया है। हमें लोग ईसाई मानने लगे हैं और कहते हैं कि तुमने पैसे लेकर ईसाई मत स्वीकार कर लिया है।  मैं उन्हें समझा ही नहीं पा रहा हूं कि मैंने पैसे नहीं लिए हैं। हमारे परिवार में लड़की की शादी होने वाली थी लेकिन जब से उन लोगों को पता चला है कि मेरा नाम सूची में आ गया तो उन्होंने शादी करने से मना कर दिया है।’ 
 
ऐसे ही सैकड़ों लोग हैं जो परेशान हैं और वे अपने को हिन्दू सिद्ध करने के लिए जाति-समाज के चक्कर लगा रहे हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो मिशनरियों ने इन लोगों को अपनी सूची में ईसाई दिखाकर इसी सूची को उच्च केन्द्रों को  भेजा है। ताकि वहां से अधिक से अधिक  पैसा इन क्षेत्रों को मिले और उससे वे और हिन्दुओं को कन्वर्ट कर सकें। 
 
 
 
मिशनरी गांव के हिन्दुओं को  कहते हैं कि आप कोई भी हिन्दू सूचक चिन्ह न बांधेंगे और न ही लगाएंगे। भगवान सिर्फ यीशु हैं और कोई नहीं। जो परम्परा यहां सदियों से चली आ रही है उसे वे नष्ट कर रहे हैं।
—ठाकुर रामेश्वर सिंह, पखरूपारा,नारायणपुर
 
भारत में अंग्र्रेज तराजू लेकर  आए थे लेकिन अब मिशनरी माला लेकर आए हैं और सेवा के बाने में वनवासियांे को अपने चंगुल में ले रहे हैं, उन्हें  ईसाई बना रही हैं। मिशनरियों के फरेब को समझने की जरूरत है।
—ठाकुर रामसिंह, प्रसिद्ध साहित्यकार, नारायणपुर
 
मेरे परिवार के  3 सदस्यों को मिशनरियों ने ईसाई बना दिया है। अब वे लोग आएदिन मुझसे लड़ाई करते हैं और ईसाई बनने के लिए दबाव डालते हैं। लेकिन मैंने उन्हें बोल दिया है कि मैं अपने धर्म में ही जिऊंगी और अपने ही धर्म में मरूंगी।
—सोनबाई उसेंडी, स्थानीय निवासी, ओरछा
 
नक्सली और मिशनरी गठजोड़ बनाकर यहां के अंदरूनी क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं । आज स्थिति यह है कि वनवासी पलायन करने को बाध्य हो रहे हैं। वहां आश्रय ढूंढते अन्य क्षेत्रों के ऐसे वनवासी पहुंच रहे हैं जो वस्तुत: ईसाई हो गये हैं।
—राजीव रंजन प्रसाद, लेखक, बस्तर
 
 यहां शासन की उदासीनता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इतने बड़े पैमाने पर यहां कन्वर्जन का खेल खेला जा रहा है और शासन-प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है। मिशनरियों ने इस क्षेत्र पर अपनी नजरंे गड़ा दी हैं।
—राजेन्द्र कुमार, देशमुख, पखरूपारा
 
 यहां शासन की उदासीनता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इतने बड़े पैमाने पर यहां कन्वर्जन का खेल खेला जा रहा है और शासन-प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है। मिशनरियों ने इस क्षेत्र पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं।
—राजेन्द्र कुमार, देशमुख, पखरूपारा
 
ईसाई मिशनरियां स्वास्थ्य एवं शिक्षा के नाम पर माड़ के वनवासी लोगों को बहला-फुसलाकर चर्च में आने को मजबूर करती हैं और फिर धीरे-धीरे ईसाई बना लेती हैं।
—गौतम गोलछा,स्थानीय निवासी, नारायणपुर
 
 
 मिशनरियों ने यहां आतंक मचा रखा है और लोगों को बरगालाकर ईसाई बना रहे हैं। गंाव के  30 प्रतिशत से ज्यादा लोग कन्वर्ट हो चुके हैं।   हम लोग इनके आतंक से        परेशान हैं।        
–   यशवंत कुमार पंवार,  सरपंच, बड़गांव
 
 हम अपने समाज को बराबर समझा रहे हैं कि जहां भी मिशनरियों को देखो उनका प्रतिकार करो,  नहीं तो एक दिन ये ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देंगे कि हम अपने ही  समाज के दुश्मन बन बैठेंगे।
                           —बाबू नंदी,  घनोरा (अबूझमाड़)
 
 मिशनरियां यहां पर गरीबी और अशिक्षा की आड़ में लोगों को बहलाकर ईसाई बना रही हैं।  चंगाई सभाओं के जरिए लोगों को भ्रमित भी कर रही हैं। हिन्दू देवी-देवताओं के प्रति नफरत      फैला रही हैंे।
 — दिवाकर प्रसाद द्विवेदी,  ओरछा
 
हम लोग हिन्दू हैं। हमारे  अपने ही  इतने देवी-देवता हैं कि हम उन सब की पूजा नहीं कर पाते।  तो फिर हम यीशु की प्रार्थना का क्या करेंगे?  हम जन्म से हिन्दू हैं और मरेंगे भी तो हिन्दू व्यवस्था में ही रहकर।
—रैनवती,  राजापुर
 
कन्वर्जन कराना गलत है। लेकिन यहां पर मिशनरी कन्वर्जन कर रहे हैं। यह कार्य इस क्षेत्र में तत्काल रूप से बंद हो। नहीं तो यह पूरा क्षेत्र जल्द ही ईसाई बहुल हो जायेगा और यहां की परम्परा नष्ट हो जायेगी।
—लता कोराम, सरपंच, धौड़ाई
 
  अपने गांव  के सरपंच महेश कोराम को ईसाई से हिन्दू धर्म में लाकर सरपंच बनाया है। समाज के लोगों ने साफ कह दिया था कि जब तक तुम ईसाई  रहोगे हम तुम्हें स्वीकार नहीं करेंगे। हम ईसाइयों को इस क्षेत्र में देखना तक पसंद नहीं करते हैं।               
  —लल्लू राम, तारागांव
 
मैं अपना धर्म क्यों परिवर्तित करूं? कोई डॉक्टर, जो ईसाई है और मेरे रोगों का ईलाज करता है,  वह  क्यों मुझसे उम्मीद करता है कि मैं उससे प्रभावित होकर अपना मत परिवर्तित करूंगा।
 –   महात्मा गांधी (हरिजन, 9 सितबंर,1935) 
 
 
मैं कन्वर्ट करने में विश्वास नहीं रखता। मैं कभी भी ऐसा प्रयास नहीं करूंगा जिससे किसी दूसरे की आस्था को कमतर आंका जाए। सभी मत और संप्रदाय का एक ही लक्ष्य है, वह है  मानवता।
   –   महात्मा गांधी  (यंग इंडिया, 23 अप्रैल, 1931)
 
साभार-साप्ताहिक पाञ्चजन्य से

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