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ढोंगी संत का आत्म-समर्पण

हिसार के बरवाला में स्थित सतलोक आश्रम ऐसा बन गया था, जैसा 1984 में अमृतसर का स्वर्ण-मंदिर! लेकिन हरियाणा की खट्टर सरकार बधाई की पात्र है कि उसने बिना किसी विशेष रक्तपात किए ही रामपाल को गिरफ्तार कर लिया। भिंडरावाले से कहीं ज्यादा जोश-खरोश का प्रदर्शन करने वाले रामपाल ने जैसे भीगी बिल्ली की तरह आत्म-समर्पण किया, उससे क्या जाहिर होता है? यही कि ये साधु-संत और बाबा लोग हमारे नेताओं से भी ज्यादा गए-गुजरे होते हैं।

इनमें नैतिक बल का सर्वथा अभाव होता है। विपरीत परिस्थितियों में चारों खाने चित हो जाना इनके स्वभाव में होता है। ये लोग अपने चेले-चेलियां के दम पर माल मलाई सूंतते रहते हैं और यदि कभी मुठभेड़ का मौका आता है तो ये उन्हें ही आगे कर देते हैं।

रामपाल ने भी यही किया। उसके आश्रम से भागने वाले उसके भक्तों की भी यही कहानी है। अपने बचाव के लिए इस कापुरुष ने इन चेले-चेलियों की जान दांव पर लगा दी। लेकिन मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर को बधाई कि उन्होंने पर्याप्त धैर्य का परिचय दिया, जल्दबाजी नहीं की और बड़ी तरकीब से रामपाल को धर दबोचा। रामपाल पर हत्या का मुकदमा तो चल ही रहा है, अब वह राजद्रोह के अपराध में जेल में बैठा-बैठा माला फेरता रहेगा।

कितने शर्म की बात है कि वह अपने आप को संत कबीर का अवतार बताता है। कबीर के सिद्धांतों का वह सबसे ज्यादा उल्लंघन करता है। वह ढोंग फैलाता है। वह दूध से नहाता है। और उस दूध की खीर बनाकर उसके भक्तों को पिलाई जाती है। वह अपने आप को संत या साधु कहता है। माफिया डॉन की तरह अपना गिरोह चलाने वाला खुद को संत बताता है।

संत की परिभाषा क्या है? सुनिए कबीरदासजी ने खुद क्या कहा है- ‘‘सिंहों के लहड़े नहीं, हंसों की नहि पात। लालों की नहीं बोरियां, साधु चले न जमात।।’’ याने सच्चे साधु की कोई जमात नहीं होती। लेकिन रामपाल तो अपने गढ़ में जमात के दम पर ही कूद रहा था। जिस आरोपी ने 44 बार अदालत की अवमानना की हो, उसके पीछे इतने लोग कैसे खड़े हो गए? जाहिर है कि आसाराम, साईं बाबा, रामपाल जैसे लोगों को हम दोष कैसे दें? जब लाखों लोग मूर्ख बनने के लिए तैयार हों, अंधविश्वास में डूबे हों, पत्थरों को भगवान मानते हों तो इन बाबाओं को भी अपने भक्तों की बातों पर विश्वास होने लगता है।

वे अपने आप को भगवान समझने लगते हैं। वे खुद को कानून के ऊपर मानने लगते हैं। हमारे नेता लोग वोट के गुलाम होते हैं। वे भी उनकी मांद (आश्रम) में जाकर उन गिरोहबाजों के पांव छूने लगते हैं। इसके परिणामस्वरुप ही स्वर्ण-मंदिर और सतलोक धाम जैसी घटनाएं होती हैं। इन सामाजिक और धार्मिक अपराधियों पर कानूनी प्रतिबंध लगाना मुश्किल है। इनका मुकाबला तो तर्कशील जनता और प्रगतिशील संगठनों को ही करना होगा।

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