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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

नई खोज से हुई सरस्वती के अस्तित्व की प्रमाणिकता सिद्ध

सरस्वती  नाम की नदी की चर्चा हमारे देश में पौराणिक साहित्य में कई स्थानों पर हुई है। प्राचीन काल से ही यह परंपरा एक विश्वास के रूप में भारत में बनी रही है कि प्रयागराज में जहां गंगा और यमुना जाकर मिलती हैं वहीं पर एक अदृश्य नदी सरस्वती भी आकर मिलती है। इसे प्लाक्ष्वती,वेद्समृति, वेदवती भी कहते हैं! ऋग्वेद में सरस्वती का अन्नवती तथा उदकवती नामक आए शब्दों का मेल भी कुछ विद्वानों ने सरस्वती नदी के अस्तित्व के साथ करने का बेतुका प्रयास किया है। इसे हम बेतुका इसलिए कह रहे हैं कि वेदों में इतिहास नहीं है। हाँ, वेदों के शब्दों के आधार पर वस्तु, स्थान आदि को नाम अवश्य दिये गये हैं। सरस्वती विद्या सूचक है अर्थात इसका ज्ञानधारा से विशेष संबंध है। इसलिए सरस्वती को ज्ञान की देवी के रूप में माना जाता है। ज्ञान अदृश्य होता है परंतु जिसको प्राप्त हो जाता है वह उसका बेड़ा पार कर देता है। यही धारणा पौराणिक ग्रंथों में इस नदी के लिए की गई है। जैसे ज्ञान की धारा अदृश्य होती है वैसे ही सरस्वती नदी की धारा को अवश्य माना गया है।
     इस नदी के बारे में मान्यता रही है कि है इसकी निर्मल विमल थारा सदा जल से प्रवाहमान रहती थी। जिस क्षेत्र से यह गुजरती थी उस क्षेत्र में अन्न आदि की उपलब्धता सदा बनी रहती थी। इस नदी के बारे में विद्वानों की यह भी मान्यता रही है कि यह हिमाचल में सिरमौर राज्य के पर्वतीय भाग से निकलकर अंबाला तथा कुरुक्षेत्र,कैथल होती हुई पटियाला राज्य में प्रविष्ट होकर सिरसा जिले की दृशद्वती (कांगार) नदी में मिल जाती थी। अभी तक विद्वानों की यह भी मान्यता बनी रही है कि प्राचीन काल में प्राचीन काल में इस नदी ने राजपूताना  के भी कई क्षेत्रों को भरपूर पानी दिया था। यह प्रयाग के निकट तक आकर गंगा तथा यमुना में मिलकर त्रिवेणी  बनाती थी। ऐसी मान्यता बनी रही कि कालांतर में यह नदी अपना अस्तित्व खो बैठी। परंतु भीतर ही भीतर इसके प्रवाहित होते रहने की लोक कथाएं भी अपना अस्तित्व बनाए रहीं। जिस पर वैज्ञानिक और तार्किक बुद्धि में विश्वास रखने वाले कुछ लोगों ने विश्वास करना भी छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि ऐसी कोई संभावना नहीं हो सकती कि कोई नदी नीचे ही नीचे प्रवाहित होती रहे या स्वर्ग से आकर यहां गंगा और यमुना के साथ मिलकर त्रिवेणी बनाए। कालांतर में यह इन सब स्थानों से तिरोहित हो गई, फिर भी लोगों की धारणा है कि प्रयाग में वह अब भी अंत:सलिला होकर बहती है। मनुसंहिता से के अनुसार सरस्वती और दृषद्वती के बीच का भूभाग ही ब्रह्मावर्त कहलाता था।
   अब हमारे प्राचीन ऋषियों पूर्वजों की मान्यताओं को प्रमाणित करते हुए वैज्ञानिकों ने प्रयागराज में स्थित संगम के पास गंगा यमुना नदियों के नीचे नदी बहने के प्रमाण खोज निकाले हैं। इस संबंध में आए समाचारों के अनुसार हेलीकॉप्‍टर से किए गए इलेक्‍ट्रोमैग्‍नेटिक सर्वे में ये बात सामने आई है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यहां बड़ी मात्रा में पानी भी मिल सकता है, जो कि भविष्‍य में बहुत काम आ सकता है।
      एडवांस्ड अर्थ एंड स्पेस साइंस जर्नल में प्रकाशित एक स्‍टडी के माध्यम से यह बात सामने आई है। यह स्‍टडी  CSIR-NGRI के वैज्ञानिकों ने मिलकर की है और उनका मानना है कि इस नदी का संबंध हिमालय से है। इस अध्ययनपूर्ण खोज के आधार पर यह बात कही जा सकती है की मिली हुई नदी प्राचीन काल से भारत में चली आ रही सरस्वती नदी की प्रमाणिकता को सिद्ध करती है। वैसे भी भारतीय परंपरा में संगम उसी को कहा जाता है जहां पर 3 नदियां आकर मिलती हों। इस नई खोज से न केवल एक नदी के अस्तित्व को खोज निकाला गया है अपितु हमने अपने पूर्वजों की परंपरा और ‘संगम’ शब्द की सार्थकता को भी सही परिभाषा दे दी है। वास्तव में हमारे वैज्ञानिक पानी की खोज करने के लिए इलेक्‍ट्रोमैग्‍नेटिक सर्वे कर रहे थे। इस सर्वे के माध्यम से हमारे वैज्ञानिकों का प्रयास था कि जमीन के नीचे उपलब्ध पानी का पता लगाया जाये। उनका यह भी प्रयास था कि यदि यहां पर पानी मिलता है तो उसका उपयोग पीने के पानी, खेती और अन्‍य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जा सके।
रिपोर्ट के अध्ययन से पता चलता है कि प्रयाग क्षेत्र में संगम के निकट 45 किलोमीटर लंबी चार किलोमीटर चौड़ी और 15 मीटर गहरी नदी के प्रमाण मिले हैं, जो आज भी प्रवाहमान है। जब यह नदी पूरी तरह पानी से भर जाती है तो भूमि के ऊपर 1300 से 2000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध करवाती है। इस नदी के पास 1000 डब्ड स्टोरेज की क्षमता है और किसी भी समय भूजल स्तर को बढ़ाने की अद्भुत क्षमता रखती है।
अब तक जितनी रिपोर्ट सामने आई है, उसमें इस अदृश्य नदी के उद्गम स्थल के विषय में तो कुछ दावे से नहीं कहा जा सकता लेकिन यह निश्चित है कि यह नदी 12 महीने जल से भरी रहती है और गंगा यमुना में जल स्तर को संतुलित रखती है। इस जांच के बाद अंतरराष्ट्रीय पीर रिव्यू ने प्राचीन नदी की प्रामाणिकता की पुष्टि की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह दृश्य नदी उसी स्थान पर मिली है जहां पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सरस्वती नदी के बहने की बात कही गई थी।
इस रिसर्च को बाद में अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन में भी छापा गया है। इन शोधों ने सरस्वती की प्रामाणिकता को सिद्ध कर दिया है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अग्रिम जांच से यह बात सिद्ध हो सकती है कि इस अदृश्य नदी का उद्गम हिमालय में ही है क्योंकि गंगा और यमुना का उद्गम हिमालय में ही है। इस शोध टीम का नेतृत्व करने वाले एनजीआरआई के निदेशक डॉ. वीरेंद्र एम तिवारी ने गंगा-यमुना के संगम के नीचे तीसरी नदी के प्रमाण मिलने की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि जिस गहराई पर नदी की खोज की गई थी और ड्रिलिंग प्रक्रिया के बाद प्राथमिक विश्लेषण को देखते हुए ऐसा लगता है कि नदी 10,000 से 12,000 वर्ष पुरानी होने की संभावना है।
  हमारा मानना है कि इस नदी का अस्तित्व और भी अधिक पुराना है जिस पर इस समय विशेष शोध की आवश्यकता है। कुछ भी हो इस नई खोज से भारत के विलुप्त इतिहास और विज्ञान को नए ढंग से परिभाषित करने , लिखने व समझने की अपार संभावनाओं का द्वार अवश्य खुल गया है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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