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जम्मू कश्मीर के चुनाव परिणामों से भाजपा एजेंडा सेटर की भूमिका में

-डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री 

                       जम्मू कश्मीर की विधान सभा के लिये हुये चुनावों के जो परिणाम २३ दिसम्बर को सामने आये , उन्होंने प्रकारान्तर से राज्य के राजनैतिक इतिहास को बदल दिया है । राज्य की राजनीति १९४७ से एक ही दिशा में चली हुई थी और उस का परिणाम राज्य में भ्रष्टाचार , आतंकवाद और अराजकता के रुप में प्रकट हो रहा था । लेकिन इन चुनावों ने इतिहास की उस दिशा को समाप्त कर दिया । वहाँ एक नये अध्याय की शुरुआत हुई है जो नेहरु-शेख़ की असफल राजनीति के अन्त का द्योतक भी है । कुछ निष्पक्ष पर्यवेषकों का कहना है कि पहली बार ऐसा लग रहा था कि राज्य में सचमुच चुनाव हो रहे हैं । राज्य में निष्पक्ष चुनाव इससे पहले भी हो चुके हैं । जम्मू कश्मीर के लोग अभी भी मोरारजी देसाई और अटल विहारी वाजपेयी के युग के चुनावों की बात करते रहते हैं । नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री काल के ये चुनाव इसलिये सचमुच के चुनाव हो गये हैं कि पहली बार राज्य में किसी राजनैतिक दल का कोई आपसी गठबन्धन नहीं था और सभी पार्टियाँ बिना किसी लाग लपेट के अपनी जीत के लिये सिर धड़ की बाज़ी लगा रहीं थीं । यही कारण था कि राज्य में ६६ प्रतिशत तक मतदान हुआ । कुछ क्षेत्रों में तो ८० प्रतिशत  तक मतदान भी हुआ ।

                    चुनाव परिणामों के केवल आँकड़ों की बात की जाये तो ८७ सदस्यों वाली विधान सभा में पी डी पी को २८ , भाजपा को २५, नैशनल कान्फ्रेंस को १५ , सोनिया कांग्रेस को १२ , सज्जाद अहमद लोन की पीपुल्स कान्फ्रेंस को २ , सी पी एम को १ , तीन निर्दलीय और एक सीट पी डी एफ को मिली है । इसके साथ ही , जहाँ तक वोटों के प्रतिशत का सवाल है , भारतीय जनता पार्टी को सबसे ज़्यादा २३ प्रतिशत मत प्राप्त हुये । दूसरे नम्बर पर पी डी पी २२.७ प्रतिशत मत लेकर रही । नैशनल कान्फ्रेंस ने २०.८ प्रतिशत मत लिये और सोनिया कांग्रेस ने १८ प्रतिशत ।  लेकिन जम्मू कश्मीर के मामले में सीटों और वोटों का यह गणित राज्य के चुनाव परिणाम और जनादेश के अर्थ समझने में बिल्कुल सहायता नहीं कर सकता । इसके लिये राज्य के पाँच में से तीन संभागों , जम्मू, कश्मीर और लद्दाख , जिनमें चुनाव हुये (दो संभागों गिलगित और बाल्तीस्थान में और जम्मू संभाग के कुछ हिस्सों में जो पाकिस्तान के क़ब्ज़े में हैं , चुनाव करवाना संभव नहीं था, अत वहाँ की २४ सीटों के लिये चुनाव नहीं हुये । शेष बची ८७ सीटों के लिये ही मतदान संभव हो सका ) के परिणामों को अलग से जाँचना परखना होगा ।

                              सबसे पहले यह ध्यान में रखना होगा कि जम्मू संभाग और कश्मीर संभाग में जनसंख्या लगभग बराबर होते हुये भी , इन क्षेत्रों में विधान सभा सीटों के मामले में ९ का अंतर है । जम्मू संभाग में ३७ और कश्मीर संभाग में ४६ सीटें हैं । यदि इन दोनों संभागों में दो अलग अलग दल सभी वोटें भी प्राप्त कर लें तब भी जम्मू में सभी मत प्राप्त करने वाली पार्टी केवल ३७ सीटें प्राप्त कर पायेगी और कश्मीर संभाग में सभी मत प्राप्त करने वाली पार्टी ४६ सीटें प्राप्त कर लेगी । यह जम्मू कश्मीर की चुनावी लड़ाई का ऐसा पेंच है जो लड़ाई से पहले ही एक पार्टी को नौ अंक दे देता है और उसके बाद खिलाड़ियों को चुनाव के अखाड़े में बुलाता है ।

                                  जम्मू संभाग की ३७ सीटें मैदानी और पहाड़ी इलाक़ों में बंटी हुई हैं । कठुआ, सांबा और जम्मू ज़िला तक मैदानी इलाक़ा आता है और उसके बाद रियासी, उधमपुर , डोडा , रामबन , किश्तवाड , राजौरी और पुँछ ज़िले पहाड़ी इलाक़े में आते हैं और पीर पंजाल तक फैले हुये हैं । पहाड़ी इलाक़ों में मुसलमानों की संख्या भी काफ़ी है । पुँछ ज़िला तो व्यवहारिक रुप से मुस्लिम बहुल ज़िला ही है । जम्मू संभाग की ३७ सीटों में से भारतीय जनता पार्टी ने २५ सीटें जीत कर अब तक का सबसे बड़ा रिकार्ड बनाया है । उधमपुर से आज़ाद प्रत्याशी के तौर पर जीतने वाले पवन गुप्ता भी वास्तव में भारतीय जनता पार्टी से ही ताल्लुक़ रखते हैं । पार्टी टिकट न मिलने से आज़ाद खड़े हो गये और संगठन के कार्यकर्ता उनके साथ हो लिये । इससे व्यवहारिक रुप से इस सीट को भी भाजपा के खाते की सीट ही माना जा सकता है । कठुआ  , सांबा और जम्मू जिलों की १८ सीटों में से भाजपा ने १६ सीटें जीत कर मैदानी इलाक़ों की लगभग सभी सीटों पर अपना परचम फहरा दिया । मैदानी इलाक़े की जो दो सीटें भाजपा ने हारीं , उनमें से बिशनाह लगभग तीन हज़ार से और नगरोटा चार हज़ार मतों के मामूली अंतर से हारीं ।  उधमपुर, रियासी जिलों की ६ सीटों में से भाजपा ने तीन सीटें जीतीं । डोडा , किश्तवाड और रामबन के पहाड़ी जिलों की ६ सीटों में से भाजपा ने चार सीटें जीत लीं जो अपने आप में एक रिकार्ड है । यहाँ तक की राजौरी की चार सीटों में से भी भाजपा ने दो सीटें जीत लीं । जम्मू संभाग के पुँछ ज़िले की तीन सीटों में से ही भाजपा कोई सीट जीतने में असफल रही । ध्यान रखना होगा कि जम्मू संभाग के मैदानी इलाक़ों में से सोनिया कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी । जम्मू संभाग से उसे जो पाँच सीटें मिलीं वे सभी पहाड़ी इलाक़ों में से ही है । पी डी पी भी मैदानी इलाक़े में अपना खाता नहीं खोल सकी । पूरे जम्मू संभाग से पी डी पी को जो तीन सीटें मिलीं हैं वे राजौरी और पुँछ ज़िले में से ही मिली । पंैंथर पार्टी जो पिछले चुनावों में तीन सीटें जम्मू संभाग से जीत गई थी , इस बार साफ़ हो गई । संक्षेप में कहा जा सकता है कि जम्मू संभाग के मतदाताओं ने भाजपा के पक्ष में एकतरफ़ा फ़ैसला दिया है । इस संभाग से भाजपा को रिकार्ड १०३३१४३ वोट मिले ।

                                    अब कश्मीर घाटी की बात की जाये । घाटी में विधान सभा की ४६ सीटें हैं । घाटी मोटे तौर पर पी डी पी और नैशनल कान्फ्रेंस में बंटी हुई है । पहले कांग्रेस  भी यहाँ अपनी दावेदारी सिद्ध करती रहती थी लेकिन धीरे धीरे वह घाटी में से सिमट गई । लेकिन इस बार भाजपा भी घाटी में पूरे दम ख़म से उतरी , जो अनेक राजनैतिक पंडितों के लिये सातवाँ आश्चर्य था । भाजपा ने पहली बार घाटी की ४६ सीटों में से ३३ पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे । इनमें से तीन को छोड़ कर बाक़ी सभी मुसलमान ही थे । लेकिन ये प्रत्याशी केवल प्रतीकात्मक लड़ाई ही ही नहीं लड़ रहे थे बल्कि इन के लिये पार्टी ने पूरा ज़ोर लगा कर प्रचार किया । स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने श्रीनगर में एक ज़बरदस्त जन सभा की । पार्टी प्रधान अमित शाह घाटी के सर्वाधिक आतंकवाद से प्रभावित इलाक़ों में प्रचार के लिये गये । इतना तो  भाजपा को भी मालूम ही था कि फ़िलहाल घाटी में कोई सीट जीतना उसके लिये मुश्किल है लेकिन पार्टी इस बार घाटी में भविष्य के लिये अपनी स्पेस तलाश रही थी । घाटी में भाजपा का झंडा गड जाने के कारण , वहाँ सचमुच का चुनावी माहौल बन गया । घाटी में लोग मोदी और भाजपा के अन्य नेताओं को उत्सुकता से सुनने के लिये आये । इसके कारण वहाँ आतंकवादियों और हुर्रियत कान्फ्रेंस का चुनावी बायकाट का नारा और आह्वान अपना प्रभाव खोने लगा और घाटी में पचास प्रतिशत से भी उपर लोग वोट डालने के लिये आये । आतंकवादियों ने पाकिस्तान के साथ मिल कर उड़ी के सैनिक शिविर पर आक्रमण भी करवाया ताकि लोगों का मतदान केन्द्रों का ओर जाने का उत्साह मंद पड़ जाये , लेकिन भाजपा ने कश्मीर मंथन की जो प्रक्रिया छेड़ दी थी , उस पर कोई असर नहीं पड़ा । वैसे केवल रिकार्ड के लिये कश्मीर घाटी में पहली बार भाजपा ने ४७ हज़ार के लगभग वोट भी प्राप्त किये ।

                           घाटी की ४६ सीटों में से पी डी पी को २५ , नैशनल कान्फ्रेंस को १२ , सोनिया कांग्रेस को ४ और सज्जाद लोन की पीपुल्स कान्फ्रेंस को २ , सी पी एम और  पी डी एफ़ को १ -१ सीट मिली । एक सीट निर्दलीय के खाते में गई । नैशनल कान्फ्रेंस फ़िलहाल सत्ता में थी । इस लिये शासन विरोधी लहर का शिकार तो हो ही रही थी , लेकिन रही सही कसर पिछले दिनों घाटी में आई भयंकर बाढ़ ने पूरी कर दी , जिसमें स्थानीय प्रशासन पंगु होकर रह गया था । ऐसी स्थिति में पी डी पी को आशा थी कि वह घाटी में नैशनल कान्फ्रेंस की सफाई कर देगी और जम्मू से पाँच छह अतिरिक्त सीटें प्राप्त कर पहली बार अपने बलबूते सरकार बना कर नये इतिहास की रचना करेगी । लेकिन उसकी यह आशा पूरी न हो सकी । न तो वह घाटी में नैशनल कान्फ्रेंस का सफ़ाया कर सकी और न हीं जम्मू संभाग में अपनी सीटों की संख्या तीन से आगे बढ़ा सकी । ७८ साल के मुफ़्ती मोहम्मद सैयद की अपने बलबूते जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बनने की साध को घाटी में ही नैशनल कान्फ्रेंस ने मरते मरते भी रोक ही दिया । यहाँ तक सोनिया कांग्रेस का सम्बंध है , पी डी पी और नैशनल कान्फ्रेंस में घाटी का ध्रुवीकरण हो जाने के बाद , वह पहले ही हाशिये पर चली गई थी । इसलिये घाटी में मिली चार सीटों को भी उसे अपनी उपलब्धि ही मानना चाहिये । घाटी के चुनावों में जिस दूसरी पार्टी ने दम ख़म दिखाया है , वह आतंकवाद का रास्ता छोड़ कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपना लेने वाले सज्जाद अहमद लोन की पीपुल्स कान्फ्रेंस है जिसने दो सीटें जीत ली हैं और कुछ और सीटों पर भी अच्छा प्रदर्शन किया ।

                जम्मू कश्मीर का तीसरा संभाग लद्दाख है जिसकी चार सीटें हैं । इन चार में से तीन सोनिया कांग्रेस ने और एक निर्दलीय ने जीत ली है । लेकिन भारतीय जनता पार्टी को इस संभाग से भी २२ प्रतिशत वोट प्राप्त हुये हैं । इस प्रकार सोनिया कांग्रेस ने जो बारह सीटें जीती हैं उनमें से पाँच जम्मू से , तीन लद्दाख से और चार घाटी में से हैं ।

                                    उपरोक्त पृष्ठभूमि में चुनाव परिणाम का विश्लेषण बताता है कि कश्मीर घाटी अभी भी पी डी पी और नैशनल कान्फ्रेंस में ही बंटी हुई है । जम्मू संभाग ने एक तरफ़ा फ़ैसला भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में दे दिया है । लद्दाख सोनिया कांग्रेस के पक्ष में गया है । इसलिये भारतीय जनता पार्टी को साथ लिये बिना यदि कोई सरकार बनती है तो उसे प्रदेश की प्रतिनिधि सरकार नहीं कहा जा सकेगा और राज्य में क्षेत्रीय असन्तुलन व्याप्त हो जायेगा । भारतीय जनता पार्टी को प्रदेश में सबसे ज़्यादा वोट हासिल हुये हैं । इसे ग्यारह लाख से भी ज़्यादा वोट हासिल हुये । कोई भी पार्टी अकेले इतने वोट हासिल नहीं कर सकी । वैसे भी भाजपा ने ८७ में से ७४ सीटों पर ही अपने प्रत्याशी खड़े किये थे । यदि उसने सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारे होते तो वोटों की संख्या और ज़्यादा होती । इस चुनाव का सबसे बड़ा संकेत तो यही है कि १९४७ में नेहरु-शेख़ अब्दुल्ला ने आपस में मिल कर राज्य के क्षेत्रीय संतुलन को खंडित  करते हुये जो घाटी केन्द्रित राजनैतिक व्यवस्था स्थापित कर दी थी उसे राज्य के लोगों ने मिल कर नकार दिया है । अब राज्य में जो भी सरकार बना करेगी वह सभी क्षेत्रों में संतुलन के आधार पर ही बन पायेगी । दूसरे भाजपा के प्रमुख दल के तौर पर स्थापित हो जाने के कारण जम्मू संभाग का मुख्यमंत्री भी , ख़ास कर मैदानी इलाक़े का , बन सकता है , यह संभावना स्थिर हो गई है । जम्मू कश्मीर राज्य दूसरे राज्यों से इसलिये अलग नहीं है कि वहाँ मुसलमानों की संख्या , हिन्दू-सिक्ख, शिया समाज , गुज्जर समाज और बौद्ध समाज से ज़्यादा है , बल्कि वह इसलिये अनूठा राज्य है कि वहां के पाँचों संभागों में भाषायी व लोक सांस्कृतिक विभिन्नता बहुत ज़्यादा है । महाराजा हरि सिंह ने बहुत ही अच्छे तरीक़े से इन पाँचों संभागों में संतुलन बिठा कर रखा हुआ था लेकिन नेहरु युग में राज्य के संभाग तो तीन ही रह गये लेकिन उनमें भी यह संतुलन बिगड़ गया और मात्र कश्मीर को ही पूरा जम्मू कश्मीर मान लिया गया । कांग्रेस ने तो संघीय संविधान सभा के दिनों में राज्य का नाम ही बदल कर कश्मीर करने का प्रयास किया था । पहली बार प्रदेश के लोगों  , ख़ास कर जम्मू के लोगों ने चुनाव के माध्यम से यह संकेत दिया है कि मुख्यमंत्री पद पर केवल कश्मीर के लोगों का ही पुश्तैनी अधिकार नहीं है । जम्मू भी मुख्यमंत्री के लिये उतना ही हक़दार है । नेहरु-शेख़ अब्दुल्ला के दिनों से एक अलिखत परम्परा स्थापित कर दी गई थी कि मुख्यमंत्री कश्मीर का ही बन सकता है । इन चुनाव परिणामों ने उस परम्परा को समाप्त करने का जनादेश दे दिया है । नेहरु-शेख़ अब्दुल्ला की राजनीति ने तो कहीं न कहीं यह भी निश्चित कर ही दिया था कि राज्य का मुख्यमंत्री मुसलमान ही बन सकता है । इन चुनाव परिणामों ने इस परम्परा पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है । अब तक जम्मू कश्मीर में स्थिति यह थी कि राष्ट्रीय दल राज्य में चुनाव लड़ते ही नहीं थे । भाजपा केवल जम्मू तक सीमित रहती थी , रहा प्रश्न कांग्रेस का , तो उसने तो अनेक सालों तक राज्य में अपनी शाखा ही नहीं खोली थी । कांग्रेस नैशनल कान्प्रेंस को अपनी शाखा ही बताती थी । जब घाटी में दो क्षेत्रीय दल स्थापित हो गये तो कांग्रेस उनके विरोध में चुनाव लड़ने का तमाशा करती थी लेकिन दोनों में से किसी एक दल के साथ मिल कर सरकार में शामिल हो लेती थी । कुछ मंत्रीपदों के लिये कश्मीर घाटी के इन दोनों दलों में से किसी एक के आगे आत्मसमर्पण कर देती थी । कांग्रेस का आधार जम्मू ही होता था । वस वह जम्मू से सीटें जीत कर घाटी के किसी एक क्षेत्रीय दल की झोली में डाल देती थी ।

                   राज्य के इतिहास में पहली बार हुआ है कि घाटी के दोनों दल जहां अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे वहीं राष्ट्रीय दल मसलन भाजपा और कांग्रेस अपने बलबूते ताल ठोंक रहे थे । समझौते चुनाव के बाद हो सकते थे , चुनाव से पूर्व तो हर दल को अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना ही था । भाजपा इस लड़ाई में जीत गई और सोनिया कांग्रेस फिसड्डी साबित हुई । उधर नैशनल कान्फ्रेंस हार कर भी प्रासांगिक बनी रही और पी डी पी घाटी का एकमात्र प्रतिनिधि दल बनने का अपना स्वप्न पूरा नहीं कर सकी । यदि चुनाव परिणाम के आधार पर केवल मज़हब के आधार पर ही सीटों का विश्लेषण करना हो तो पी डी पी की २८ सीटों के सभी विजेता मुसलमान ही हैं । कांग्रेस के १२ विजेताओं में से एक भी हिन्दू नहीं है  और नैशनल कान्फ्रेंस के १५ विजेताओं में से मात्र दो हिन्दू हैं । यदि उधमपुर से जीते भाजपा विद्रोही पवन गुप्ता को भी फ़िलहाल भाजपा सहायकों की सूची में रख लिया जाये तो यदि पी डी पी और कांग्रेस मिल कर सरकार बनाते हैं तो उनके पास एक भी हिन्दू विधायक नहीं होगा । यदि कांग्रेस , पी डी पी और नैशनल कान्फ्रेंस और शेष सभी मिल जाते हैं तो उनके ६२ विधायकों में से केवल दो हिन्दू विधायक होंगे । इससे सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि यदि भाजपा के बिना कोई भी सरकार बनती है तो वह मोटे तौर पर मुस्लिम सरकार ही होगी और फ़िलहाल इसी को सोनिया कांग्रेस सबसे ज़्यादा सेक्युलर सरकार बता रही है । भाजपा के पच्चीस योद्धाओं में केवल एक मुसलमान है । भाजपा ने पहाड़ी क्षेत्र की यह मुसलमान सीट जीत कर सिद्ध कर दिया है कि भाजपा को लेकर मुसलमानों के जम्मू कश्मीर में भी संशय धीरे धीरे समाप्त हो रहे हैं ।

                   २५ दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी के जन्मदिन के अवसर पर पार्टी ने जम्मू में अपने विधायक दल की बैठक के बाद यह स्पष्ट कर दिया कि राज्य में सरकार बनाने का पहला अधिकार उसका है क्योंकि उसके पास ३१ विधायकों का समर्थन है । इतना स्पष्ट करने के बाद ही पार्टी मैदान में अन्य दलों के पास अप्रोच करेगी । पहली बार भारतीय जनता पार्टी राज्य की राजनीति में एजेंडा सेटर की भूमिका में आई है । प्रेम नाथ डोगरा से शुरु हुई राजनैतिक यात्रा की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है ।

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