गांव तक पहुंचे डिजिटल इंडिया की चमक

digital india villagesअभिषेक कुमार

देश डिजिटलीकरण की नई इबारत लिखने जा रहा है। सरकार के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम ‘डिजिटल इंडिया’ की धमाकेदार शुरुआत के लिए पहली जुलाई से डिजिटल भारत सप्ताह मनाने की घोषणा सरकार की तरफ से की जा चुकी है। इस दौरान बिल गेट्स, सत्य नडेला और एनआर नारायणमूर्ति जैसी हस्तियां इंटरनेट विस्तार के नए मानदंड खड़े करने के लिए योजनाओं और निवेश का ऐलान कर सकती हैं। यह देखते हुए कि इंटरनेट हमारे देश में आज भी एक शहरी इस्तेमाल की चीज है और हजारों गांव अभी भी इससे कोसों दूर हैं, डिजिटल इंडिया का यह कार्यक्रम एक नई उम्मीद जगा सकता है।

आधुनिक भारत का इतिहास उठाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि कंप्यूटर और इंटरनेट के मामले में हमारे देश ने कोई विलंबित शुरुआत नहीं की थी। जब यह संचार क्रांति कंप्यूटर और इंटरनेट की शक्ल में अमेरिका से बाहर अपने पांव पसारना शुरू कर रही थी, भारत ने उसी समय इन नई तकनीकों को अपनाने की समझदारी भरी पहल की थी। इसका लाभ यह हुआ कि बीते डेढ़-दो दशकों में भारत आईटी क्रांति के अगुआ देशों में गिना जाने लगा पर इसी के दूसरे छोर पर वह भारत हमेशा मौजूद रहा जो इस क्रांति में हमकदम नहीं हो सका और लगातार पिछड़ता गया।

गांव-कस्बों में बसने वाले इस भारत का डिजिटल संसार में पिछड़ापन इतना अखरने वाला है कि एक ओर आज जहां हमारे शहर शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और खरीददारी से लेकर रेल आरक्षण तक में मोबाइल, इंटरनेट के जरिये घर बैठे सुविधा पा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण जनता का ज्यादातर हिस्सा इन सारी सहूलियतों से कोसों दूर है। पिछले साल 15 अगस्त को लालकिले से भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने डिजिटल इंडिया कार्यक्रम की घोषणा करते हुए साफ कर दिया था कि वह गांव-कस्बों को इंटरनेट और मोबाइल क्रांति का लाभ दिलाना चाहते हैं। इस घोषणा पर अमल करते हुए सरकार ने अगस्त के आखिरी हफ्ते में एक लाख करोड़ के कुल बजट वाली इस परियोजना को हरी झंडी दिखा दी थी। फिलहाल इसके लिए आरंभ में 500 करोड़ रुपये देने की घोषणा की गई और अब इसके लिए भारी-भरकम निवेश बड़ी इंटरनेट कंपनियों से आने की उम्मीद है।

इस कार्यक्रम को कुछ आंकड़ों और तथ्यों की रोशनी में रखकर देखें तो इसकी उपयोगिता साफ समझ में आ जाएगी। जैसे आज देश में जो 25-26 करोड़ लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं, उनमें से एक तिहाई का संबंध किसी न किसी रूप में गांवों से है। इसी तरह जो 15 करोड़ मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लोग हैं, उनमें से एक चौथाई का संबंध गांव-कस्बों से है। पर जहां हमारे 37.4 फीसदी शहरों में इंटरनेट की सुविधाएं लोगों को हासिल हैं, वहीं अभी सिर्फ देश के 8.6 फीसदी गांव इंटरनेट से जुड़े पाए हैं। कुछ ऐसा ही अंतर इंटरनेट की कनेक्टिविटी और स्पीड को लेकर है।

पिछली यूपीए सरकार का दावा था कि 2015 तक देश की ढाई लाख ग्राम पंचायतों को ब्रॉडबैंड इंटरनेट से जोड़ दिया जाएगा, पर इस दावे की हकीकत यह रही कि सिर्फ 60 गांवों में इंटरनेट पहुंचाया जा सका है। यह एक तरह का सरकारी डिजिटल विभाजन है जो शहर और गांव में फर्क करता आया है। देश में एक तरफ साधन-संपन्न लोग हैं जो इंटरनेट का इस्तेमाल अपने मनोरंजन और खरीददारी के लिए कर रहे हैं तो दूसरी तरफ वे गरीब और उपेक्षित लोग हैं जो इंटरनेट के सार्थक उपयोग तक से वंचित हैं।

उल्लेखनीय है कि 2011-12 के बजट में नेशनल ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क (एनओएफएम) के तहत देश के लाखों गांवों को इंटरनेट से जोडऩे का प्रस्ताव किया गया था। पहले यह प्रोजेक्ट 2012 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, जिसकी समय सीमा 2013 और फिर बढ़ाकर 2015 तक कर दी गई। अब सारी उम्मीदें डिजिटल इंडिया जैसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रम पर आकर टिक गई हैं, जिसमें 2019 तक देश की ढाई लाख ग्राम पंचायतों को इंटरनेट के ब्रॉडबैंड कनेक्शन से जोडऩे का लक्ष्य रखा गया है।

देश के दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में तेज इंटरनेट कनेक्शन की जरूरत सिर्फ प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े अलर्ट जारी करने में नहीं है बल्कि यह उन इलाकों के समग्र विकास के नजरिये से जरूरी है। इससे बाहर दो-तीन चीजों में कंप्यूटर और इंटरनेट की जरूरत गांवों में है। पहला क्षेत्र है शिक्षा। आज के हालात में कंप्यूटर और इंटरनेट के बिना कोई शिक्षा फायदेमंद साबित नहीं हो सकती। गांवों के स्कूलों को, जहां सिर्फ कहने को टीचर और दो-एक सहूलियतें हैं, अगर कंप्यूटर-इंटरनेट से जोड़ दिया जाता है तो बच्चे नई तकनीकों और नई तरह की शिक्षा से रूबरू हो सकते हैं जो आगे चलकर उनके रोजी-रोजगार में मददगार साबित हो सकती है। गांवों को दूसरा फायदा ई-गवर्नेंस के रूप में हो सकता है। देश में लाखों ग्राम पंचायतें हैं और उनमें एक तिहाई महिलाएं हैं, यदि इन पंचायतों को कंप्यूटर-इंटरनेट की मदद से ई-पंचायतों में बदल दिया जाता है तो पूरे ग्रामीण परिदृश्य की कायापलट हो सकती है। खेती, सिंचाई की अधुनातन जानकारी ग्रामीणों को मिल सकती है। सरकार गांवों के विकास की जो योजनाएं लागू करती है, उनका सीधा फायदा उन्हें हो सकता है। तीसरा फायदा स्वास्थ्य और बाजार के निर्माण में हो सकता है। आज भी पढ़े-लिखे डॉक्टर गांव नहीं जाना चाहते, पर यदि ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर कंप्यूटर-इंटरनेट की सुविधा हो तो वे मरीजों को अपनी सलाह टेलिमेडिसन जैसे तरीकों से घर बैठे पहुंचा सकते हैं।

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