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तकनीक खींचती मानव के महाविनाश की लकीर

human and technologyप्रमोद भार्गव

अब तक जीव-जंतुओं और कीट पतंगों की प्रजातियों के लुफ्त होने के अनुमान ही देश-विदेश में किए जाने वाले सर्वेक्षणों के निष्कर्ष लगाते रहे हैं,लेकिन ‘सांइस एडवांस‘ नामक जर्नल ने हाल ही में होश उड़ाने वाला अध्ययन छापा है। इसके मुताबिक परिस्थितिकी तंत्र इस हद तक बिगड़ता जा रहा है कि अब मानव प्रजातियों की विलुप्ति के साथ-साथ छठवें महाविनाश का खतरा सिर पर मंडारने लगा है। क्योंकि अब प्राणी-जगत में प्रजातियों के लुप्त होने की औसत दर सामान्य से एक सौ गुना ज्यादा बढ़ गई है। जिसमें दुर्लभ व आदिम प्रजातियों के मिल होने का सिलसिला भी शुरू हो गया है। विलुप्ति के कारणों में प्रमुख रूप से वह तकनीक है,जिसे हमने आधुनिक व नवीनतम विकास का आधार माना हुआ है। जबकि वह तकनीक ही है,जिसने वन्य प्राणियों के शिकार और भूजल के दोहन से लेकर वायुमंडल का तापमान बढ़ाने वाली तकनीक के साथ संचार की ऐसी तकनीक भी दी जिसकी तरंगें पक्षियों का जीवन लील रही हैं।

ऐसे सर्वेक्षण लगातार आ रहे हैं,जो पृथ्वी पर जीवन के विनाश का संकेत देने वाले हैं। बावजूद न्यूनतम लोगों के लिए प्राकृतिक संपदा का अधिकतम दोहन करके भौतिक सुख के साधन जुटाए जाने के उपाय जारी हैं। यही वजह है कि संकेत,चेतावनी भर नहीं रह गए है,बल्कि मनुष्यता के विनाश पर आमदा होकर छठवें महाविनाश की और बढ़ रहे हैं। क्योंकि प्राणी जगत के लुप्त होने की रफ्तार सौ गुना ज्यादा हो गई है। करीब साढ़े छह करोड़ वर्ष पहले इस धरती पर महाकाय प्राणी डायनासोर खत्म हुए थे। साथ ही संपूर्ण धरा को एक शीतयुग ने अपने प्रभाव में ले लिया था। हालांकि डायनासोर की विुलुप्ति से पहले भी पृथ्वी से पांच मर्तबा जीवन का नाश हो चुका है और अब पृथ्वी ने छठे विनाश की और कदम बढ़ा दिए हैं।

ताजा शोध का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक ग्रेरांडो कैबालोस ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा है कि ‘हालांकि डायनासोर के विलुप्त होने के बाद से हालात बिगड़ते रहे हैं। नतीजतन तभी से प्रजातियों के लुप्त होने की गति बढ़ गई थी,परंतु इस पर ध्यान नहीं दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक 1900 से 1990 तक महज 9 प्रकार के कषेरूकी मसलन रीढ़ की हड्डी वाले प्राणियों की प्रजातियां विलुप्त हुईं,जबकि 1990 से लेकर अब तक इसी किस्म के 477 प्राणियों की जीवन लीला समाप्त हो चुकी है। हालांकि इन्हें 10,000 साल में खत्म होना चाहिए था। दरअसल प्राणियों के विनाश का यह वही दौर रहा है,जिस दौर में भूमंडलीय उदारवादी आर्थिक नीतियां लागू हुईं और अंधाधुंध प्रकृति के दोहन का सिलसिला तेज हुआ। रिपोर्ट में भयावह संकेत दर्ज है कि यदि दुनिया संभली नहीं तो वर्तमान प्रजातियों में से 75 प्रतिषत प्रजातियां अगली दो पीढियां देखते-देखते दम तोड़ देंगी।

इसी तरह का एक अध्ययन पिछले साल प्रकाशित हुआ था,जिसमें दावा किया गया था कि बीते 35 वर्ष में दुनिया की आबादी दोगुनी हो गई है। इसी कालखण्ड में वैश्विक जलवायु एवं पर्यावरणीय बदलावों के कारण तितली,मख्खी और मकड़ी जैसे अकेशरूकी कीट-पतंगों की संख्या में 45 प्रतिषत की कमी दर्ज की गई है। यह अध्ययन इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन नेचर ने जारी किया था। इसी संगठन ने भारत के साथ मिलकर पक्षी प्रजातियों पर मंडरा रहे खतरे का अध्ययन भी प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार विश्व में पक्षियों की 140 प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं। 213 विलुप्ति के एकदम कगार पर हैं। यही हालात बने रहे तो आगामी कुछ दशकों में 419 पक्षी प्रजातियां समाप्त हो जाएंगी। 741 ऐसी पक्षी प्रजातियां हैं,जो असुरक्षा के दायरे में हैं।

इसी अध्ययन में भारत की 170 से ज्यादा पक्षी प्रजातियां संकट में बताई गई हैं। इनमें से 8 पर संकट गहरा है। ये हैं, ऊनी गर्दन वाला सारस,अंडमान का पनकुकरी,अंडमान का ही हरा कबूतर,राख के रंग जैसा हरा कबूतर,लाल सिर वाला बाज,हिमालयन चील,दाढ़ी वाला चील और बीज खाने वाली चिडिय़ा। उनके अलावा अरूणाचल प्रदेश में पिछले साल खोजी गई चिडिय़ा,बुगन लियोचिचिल पर गंभीर खतरा है। भारत में मानसून के आगमन का पैगाम देने वाला दुर्लभ पक्षी चटाका पाखी भी खतरे में है। हालांकि यह पक्षी प्रवासी है। दक्षिण अफी्रका से चलकर भारत के ओडी़शा में इसे मानसून के ठीक पहले कभी-कभार देख लिया जाता है। इसीलिए इसे मानसूनी पक्षी भी कहा जाता है। पिछले चार दशक से देशी-विदेशी परिंदों के अलग-अलग पहलुओं पर काम करने वाले पक्षी विज्ञानी यूएन देव ने चटाका पाखी को भुवनेशवर के भरतपुर इलाके में देखा था। उनका भी मानना है कि इस पक्षी का संकेत इस बात का प्रतीक है,कि जिस क्षेत्र में इसकी उपस्थिति है,वहां बारिश जल्दी होने वाली है। इसी साल अप्रैल माह में विश्व बैंक ने वैश्विक स्तर पर स्तनधारी प्राणियों का सर्वेक्षण कराया था। 214 देशों में कराए अध्ययन की यह रिपोर्ट भी हैरान करने वाली है। भारत का नाम इस सूची में चौथे स्थान पर है और यहां 94 स्तनधारी विलुप्ति के निकट हैं। इनमें सबसे ज्यादा संकटग्रस्त प्राणी बाघ है। हालांकि इसी साल की गणना में बाघों की संख्या बढ़ी बताई गई है। लेकिन कई ऐसे दुर्लभ प्राणी हैं,जो सरंक्षण के पर्याप्त उपायों के बावजूद भी घट रहे हैं। इनमें उत्तर पूर्व भारत में पाई जाने वाली नमदाफा गिलहरी,हिमालयन भेडिय़ा और अंडमान में विचरण करने वाली सफेद छंछुदर समेत 94 जीव खतरे में है। वैसे दुनिया के जंगलों में रहने वाले प्राणियों में से अब तक 3 करोड़ प्राणी-प्रजातियों का नामकरण वैज्ञानिक कर चुके हैं। इनमें से 25 ऐसी प्रजातियां हैं,जो पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं और 153 विलुप्ति के भीषण संकट से जूझ रही हैं। अतिरिक्त मानवीय हस्तक्षेप और तकनीकी विकास के चलते प्रकृति का कितना हश्र हुआ है,इसका खुलासा 2006 में ‘विश्व प्रकृति निधि ने अपनी एक रिपोर्ट में किया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैयार की गई यह अध्ययन रिपोर्ट ‘लिविंग प्लेनेट 2006‘शीर्षक से जारी हुई थी। नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद विकसित और विकासशील देशों द्वारा प्राकृतिक संपदा के अंधाधुंध दोहन के दुष्परिणाम इस रिपोर्ट से भी सामने आए थे। रिपोर्ट में 1970 से 2003 के बीच के वर्षों में किए आकलन के मुताबिक,हमने प्राकृतिक क्षमताओं का 30 प्रतिषत से ज्यादा दोहन तो किया,लेकिन उसके सरंक्षण की दृष्टि से लौटाया कुछ नहीं। फलत: 1961 की तुलना में दोहन व प्रदूषण की गति तीन गुना अधिक बढ़ गई। यह अध्ययन विश्व की 3600 मानव आबादियों,13कषेरू की प्रजातियों, 695 थलचर जीवों, 274 जलीय जीवों और 344 निर्मल जलचरों पर किया गया था। नतीजतन इस कालखंड में उष्णकटिबंधीय प्रजातियों की आबादी में 55 प्रतिषत की कमी आई। समुद्री जीव-जंतुओं की 274 प्रजातियां में से 25 फीसदी प्रजातियां लुप्त हो गईं। भारतीय समुद्रों में यह कमी और भी ज्यादा मात्रा में दर्ज की गई थी। दुनियाभर की नदियों के प्रवाह में 83 प्रतिषत तक की कमी दर्ज की गई है। इससे भी जल-जीवों की लुप्तता बढ़ी है।

एक समय था जब मनुष्य वन्य-पशुओं के भय से गुफाओं और पेड़ों पर आश्रय ढूंढता था,लेकिन ज्यों-ज्यों मानव प्रगतिशील व सभ्य होता गया,त्यों-त्यों पशु असुरक्षित होते चले गए। धनुष-बाण के आविष्कार तक तो प्राणियों के शिकार की एक सीमा थी और मनुष्य क्षुधा पूर्ती के लिए ही शिकार करता था।

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