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भारत का ज्ञान भंडार आज भी कर सकता है संसार का मार्गदर्शन

जवाहरलाल कौल

आधुनिकता का चोला ओढ़े हमारे इतिहासकार और बुद्धिजीवी अकसर यह कहते फिरते हैं कि भारतीय समाज आरम्भ से ही धर्म और शास्त्रों के बनाए नियमों कायदों में जकड़ा रहा है और आज भी इन्हीं में फंसा हुआ है। हमारे शास्त्रों का सही मायने में मूल्यांकन तो हुआ ही नही, समाज में उनकी साधारण समीक्षा की भी अनुमति नहीं है। यह आरोप सामी (सेमेटिक) मजहबों के बारे में सच हो सकतें हैं, भारतीय धर्मों पर लागू नही होते। ऐसा कोई भी शास्त्र नहीं है, जिस पर भारत में बहस नहीं हुई हो, समीक्षकों द्वारा आलोचना और कभी कभी कटु आलोचना नहीं हुई हो या जिसका किसी न किसी ने खण्डन नहीं किया हो। अंतर केवल यह है कि अन्य मजहबों और देशों में समाज बौद्धिक रूप से इतना सहिष्णु नहीं रहा है जितना हमारा समाज। इसलिए वहां किसी ने अपनी प्रतिष्ठित धार्मिक भावना के विरुद्ध कोई बात कह दी या उसकी किसी धारणा का खण्डन किया तो वह या तो मार दिया जाएगा या उसे आसमान पर चढ़ा कर महान बना दिया जाएगा।
यह उन समाजों के लिए अनहोनी बातें होती है, वहां के बौेद्धिकों के लिए महान साहस का काम माना जाता है, हमारे लिए सामान्य बात है जो हर क्षेत्र में हर शास्त्र के बारे में होती रही है। केवल आज नहीं, ईसा पूर्व से ही। हमारी संस्कृति में विचार विमर्श और संवाद से ही वास्तविक तथ्य या किसी समस्या के सार तक पहुंचा जा सकता है। इसी आदान प्रदान से हमारी सभ्यता संस्कृति का विकास हुआ है। हमें हमारी संस्कृति किसी पिटारे में बंद बनी बनाई नहीं मिली, इसे विकसित होने मे हजारो वर्ष लगे हैं और हर युग में इसमें नए आयाम जुड़़ते रहे हैं।
वेद की भारतीय समाज में इतनी मान्यता है कि वेद वाक्य को प्रमाण मान लिया जाता है। लेकिन इसका अर्थ कदापि नहीं होता कि वेदों की अलग अलग युगों में अलग अलग विद्वानों द्वारा व्याख्या नहीं हो सकती है। हर विद्वान की अपनी समझ और उस युग में सामाजिक आवश्यताओं के अनुरूप कहीं कहीं अर्थ के नए आयाम भी खोले जाते रहेे हैं। वेदों के गूढ़ तथ्यों और अनुभवों को दार्शनिक भाषा में जनता के सामने रखने का काम उपनिषदों और दर्शनों ने किया। लेकिन सभी दर्शन हरेक बात में सहमत नहीं हैं। और यह असहमति कर्मकांडी विधियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मौलिक सिद्धांतों और धारणाओं के बारे में भी है, जैसे आत्मा और ईश्वर। शुद्ध अनीश्वरवादी भौतिकवाद से लेकर शुद्ध अद्वैतवाद तक अनेक संभावनाओं और बहुआयामी संवाद का नाम ही भारतीय सभ्यता है। तो फिर अब भारतीय ज्ञान परम्परा को परखने की क्या आवश्यकता आ पड़ी है? जांचने परखने की कोई आवश्यकता नहीं है, उसे फिर से इस भौतिक संसार के सामने रखने और स्वयं इसे समझने की आवश्यकता है।
प्राय: हमारे देश में यह सुझाव दिया जाता रहा है कि हमें भी एक रिनेसां (पुनर्जागृति) की आवश्यकता है। ऐसा कहते हुए ऐसे विद्वानों के सामने यूरोप का सांस्कृतिक पुनर्जागरण होता है। रिनेसां जहां हुआ वहां किसी महान संस्कृति ने कभी जन्म नहीं लिया था। चौदहवीं शती तक तो इंग्लैंड निरंकुश राजशाही के दमन से ही जूझ रहा था। धार्मिक स्तर पर जितने अंधाविश्वास इस समाज को घेरे रहते थे, उतने तो आज आर्थिक रूप से बहुत पिछड़़ी जनजातियों में भी नहीं है। ऐसे वातावरण में कुछ बौद्धिक लोगों में राजशाही की निरंकुशता के विरुद्ध बगावत की भावना विकसित हुई जो इंग्लैड से आरम्भ होकर कुछ अन्य यूरोपीय देशों में भी फैली। लेकिन राजा दावा करते थे कि उन्हें राज करने का दैवीय अधिकार है। ईसाई मिशन भी राजाओं के इस ईश्वरीय अधिकार के पक्ष में था। पहली बार राजा और जनता के बीच टकराव हुआ और जनता को किसी ऐसी शक्ति की आवश्यकता थी जो जनता के अधिकारों के पक्ष में हो और जो ताकतवर चर्च का भी सामना कर सके। इसमें से ही नए ज्ञान से अधिक नई पहचान की आवश्यकता महसूस हुई। उसी ने यूरोपीय विद्वानों को अपने देशों से बाहर खोज करने की प्रेरणा दी। कहीं अरब तो कहीं भारत की प्राचीन संस्कृतियों से कुछ नई बातें मिलीं। लेकिन पहचान का प्रश्न सबसे बड़ा था, अंग्रेज या फ्रेंच या जर्मन नाम से यह पहचान नहीं बन सकती थी। वह पहचान उन्हें मिली प्राचीन ग्रीस और रोम की सभ्यता से। उन्होंने सारे यूरोप को ग्रीको रोमन कहना आरम्भ कर दिया। यानी यूरोप की पहचान ग्रीस और रोम कीे प्राचीन सभ्यता से ही होती है।
लेकिन हमें अपनी पहचान और ज्ञान को खोजने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। जिस रिनेसां की बात की जा रही है उसमें भी बहुत से तत्त्व तो भारतीय ही है। केवल उतना ही नहीं जितना उन्हें यहां से प्रत्यक्ष मिला, जो अरबों से उन्होंने सीखा, वह भी मूलत: भारतीय है जो अल बिरूनी जैसे कई अरब लेखकों ने यहां के बारे में लिखा था। हमारे पास वह सब कुछ है जिसके आधार पर हम नई जागृति ला सकते हैं। लेकिन यह सच है कि हम स्वयं ही उसे भूल से गए हैं। हजार वर्ष की दासता के दौर में हमारे ज्ञान भण्डार को नष्ट करने की अथक कोशिशें की गईं, हमारे ज्ञान के केन्द्रो को समाप्त किया गया। एक विदेशी संस्कृति हम पर थोप दी गई जो हमारे अतीत को पीछे धकेलने का प्रयास करती रही है। उन्हें भारतीय स्ंास्कृति के पुनरोदय से डर लगता था जो हमारे इतिहास को विकृत करके हमारी धरोहर को छिपाने का षड्यंत्र चलाते रहे हैं।
दमन के बावजूद हमारा ज्ञान भण्डार नष्ट नहीं हुआ है, लेकिन कुछ तो अंधेरे में पड़ा है, कुछ परिभाषित नहीं है और कुछ कहीं प्राचीन ग्रंथालयों में धूल धूसरित अनदेखी अवस्था में है। जो थोड़ा भाग प्रकाशित है, वही इतना बड़ा और प्रासंगिक है कि केवल उसी के बूते हम आज भी संस्कृति आधार पर विश्व में सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हो सकते हैं। जो अभी छिपा है, वह प्रकाश में आए तो जिस रिनेसां की हम कामना करते हैं, उसकी पदचाप हमें सुनाई देने लगेगी। इसके लिए हमें कहीं और जाने की या किसी और का मुंह ताकने की आवश्यकता ही नही है।
आज हमें अपने ज्ञान भण्डार को फिर से जानने की आवश्यकता है। हमारे दो महान दाशर्निकों ने पश्चिम के दार्शनिकों और बौद्धिकों को इतना आकर्षित किया है कि विश्व का शायद ही कोई प्रथम दर्जें का विश्वविद्यालय होगा जिसमें इन दो भारतीय विद्वानों का गम्भीर अध्ययन नही होता हो। वे हैं आदि शंकराचार्य और अभिनवगुप्तपाद। शंकर के अद्वैतवाद और अभिनव के अद्वयवाद ने पश्चिम को चमत्कृत कर दिया है। पैथागोरस से हेगल तक पश्चिमी दर्शन की यात्रा में माक्र्स और मैक्सम्यूलर तक आते आते पश्चिमी समाज ईसाइयत से उतर कर माक्र्सवाद और पंूजीवाद पर अटक गया है। माक्र्सवाद कहीं चीनी विस्तारवाद और कहीं उत्तर कोरिया के बर्बर निरंकुश अधिनायिकता के रूप में ही चर्चित होता है और पूंजीवाद कथित ग्लोबलिज्म और बाजारवाद के आर्थिक शिकंजों और अस्थिरताओं के शिकंजे के रूप में ही महसूस होता है। पश्चिम का बौद्धिक वर्ग भी त्रस्त है और नहीं समझ पाता कि कहां जाया जाए।
ऐसे में भारतीय दार्शनिकों के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक है क्योंकि और कहीं भी विश्व व्यापी बदलाव की संभावनाएं नही हैं। इसलिए हमारे ज्ञान भण्डार का पुनर्भाष्य और पुनर्मूल्यांकन हमारे लिए ही महत्त्वपूर्ण नहीं, पूरे विश्व समाज के लिए भी है। अभिनवगुप्त के दर्शन का एक सिद्धांत है प्रत्यभिज्ञा, यानी पहचान। अपनी पहचान और परम शिव की भी पहचान। यह पहचान ही शिवत्व प्राप्त करना है। यह सिद्धांत हम भारतीय जन के लिए भी है। हमें अपनी पहचान करनी होगी अपने आप को जानना होगा और यह पहचान अपने ज्ञान भंडार को खंगालने तथा मनन करने और उन्हें विश्व के संदर्भ मेें पारिभाषित करने से ही होगी। स्व की पहचान से ही हमें विराट भारतीय राष्ट्र और भारतीय सभ्यता की भी पहचान होगी। यही रिनेसां होगा और यही भारत की विराटता का अनुभव भी।

साभार

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