Categories
आओ कुछ जाने

मूर्तिपूजा का प्रारम्भ कब क्यों व कैसे ??


5000 वर्ष पूर्व महाभारत काल तक भारत में विशुद्ध रूप से सभी जन वैदिक धर्म के ही अनुयाई थे। महाभारत के युद्ध के पश्चात ऋषियों की वैदिक व्यवस्थाओ में शिथिलता आने लगी। वेद के विद्वान जनो की हानि होने लगी। फिर भी 600 ईस्वी पूर्व तक आर्यावर्त में कुछ अशुद्धियों के साथ वैदिक मत ही पूरे आर्यावर्त में विद्यमान था। देश में अभी भी वेद, उपनिषद्, दर्शन आदि वैदिक ग्रंथो का पठन पाठन और प्रचलन था, कई यज्ञशालाऐं भी थीं।

इस समय केवल दो ही समुदाय भारत में थे, एक आर्य और दूसरे अनार्य। आर्यो का मत वेद था और दूसरी ओर अधिकांश आनार्य वाममार्गी थे। वैसे तो संपूर्ण आर्यावर्त में बहुतायत में आर्य जनसंख्या ही थी, लेकिन वेद-विरुद्ध मत वाले वाममार्गियों की भी कुछ छुटपुट जनसंख्या भी थी।

वाममार्गी मत में पंच मकार (मांस, मीन, मद्य, मैथुन, मुद्रा) की असभ्यता का परस्पर, सामूहिक भक्षण और विनिमय था, जिसका विरोध आर्य किया करते थे। आर्य राजाओं ने वाममार्गियों को नगरों और ग्रामों में प्रतिबंधित कर दिया था, इसलिए अधिकतर वाममार्गी पहाड़ों में, निर्जन वनों व कंदराओ में रहते थे।

मूर्तिपूजा वस्तुत: ईस्वी पूर्व 600 के लगभग जन्मे जैन पंथ के प्रवर्तक महावीर स्वामी की मृत्यु के तुरंत बाद उनके शिष्यों की देन है। अर्थात मूर्तिपूजा मूलत: जैनकाल की कृति है।

जैन पंथ के प्रवर्तकों ने महावीर स्वामी की मृत्यु के बाद सुनसान व निर्जन जगहों पर मंदिर बनाने शुरू कर दिए। जैनियों ने उस समय तक मंदिरों में किसी भी कल्पित पौराणिक देवी देवता की मूर्ति नहीं बनाई थी। उनमें अपने जैन मत के प्रवर्तकों की ही मूर्तियों का प्रचलन व्याप्त था।

महावीर स्वामी के समकालीन में ही गौतम बुद्ध का जन्म हुआ। गौतम बुद्ध की मृत्यु 483 ईस्वी पूर्व के लगभग को हुई।
गौतम बुद्ध की मृत्यु के बाद, उनके शिष्यों ने भी महावीर स्वामी के शिष्यों का अनुसरण व प्रतिस्पर्धा करते हुए बौद्ध काल में मूर्ति कला को पर्वतों की कंदराओं में आर्यावर्त में उकेरना शुरू कर दिया।आगे प्रतिस्पर्धा में बौद्ध भिक्षु तो जैनियों से भी एक कदम आगे रहकर पर्वतों और कंदराओं में ही अपने रहने, खाने पीने, पड़ने लिखने की व्यवस्था के लिए बौद्ध विहार बनाने लगे।

बौद्धों ने बौद्ध विहारों में, मूर्तियों के साथ साथ स्तूप व भिन्न भिन्न प्रकार के भित्तिचित्र व लोक कथाओ को भी चित्रित करना शुरू कर दिया।अब जैन मतावलंबी व बौद्ध मतावलंबी मूर्तियों का निर्माण करते जा रहे थे, लेकिन निर्जन स्थानों पर, पर्वतों पर और केवल गुफाओं में। अभी तक जैन व बौद्ध मतावलंबियों ने आर्यों के भय से, सभ्य नगरों अथवा ग्रामों में मूर्तियों व मंदिरों का निर्माण नहीं किया था।

जब वाममार्गियों ने अपने मूल स्थानों, पर्वतों, गुफाओं, कंदराओं में जैन और बौद्ध मतावलंबियों का अतिक्रमण देखा तो वह चुप नहीं बैठे और उन्होंने जैन-मंदिरों और बौद्ध विहारों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। वाममार्गियों के द्वारा जैन मंदिरों और बौद्ध विहारों पर कब्जे से अहिंसक जैन समुदाय यहां से पलायन करते हुए अपने जैन मत को आर्यों के नगरों ग्रामों में प्रचार प्रसार हेतु जुट गया।

जैनों कि देखा देखी बौद्ध भी चुपचाप नहीं बैठे। उन्होंने भी आर्यों में अपने मत का प्रचार प्रसार करना आरंभ कर दिया। बौद्धों ने अपने बौद्ध विहारों को बनाने का काम भी अन्य दूसरी निर्जन जगहों व पर्वतों पर जारी रखा।

इस समय भारत के आर्य राजाओं में परस्पर युद्ध और वैमनस्य पनप रहा था। वह एक दूसरे से लड़ रहे थे, जिसका लाभ वेद विरुद्ध मतावलंबियों ने भरपूर उठाया। धीरे धीरे वैदिक धर्मी कम होते चले गए। अब आर्यावर्त की स्थिति यह हो गई कि लगभग दो तिहाई आर्य जनसंख्या ही नास्तिक अर्थात् (बौद्ध जैन) में मतांतरित हो गई।

दूसरी ओर वाममार्गियों ने भी आर्य जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अपने मत में लाना शुरू कर दिया। धीरे धीरे बहुत सारे आर्य सनातन वैदिक धर्म की शिक्षाओं को भूल कर वाममार्गियों के पंचमकार के वशीभूत हो गए।

(अभी भी यहां तक यह गनीमत रही की किसी भी पौराणिक देवी देवता की मूर्तिपूजा का आरंभ नहीं हुआ था, क्योंकि इसकी कल्पना किसी को भी नहीं थी)

इसी कालखंड के ईस्वी पूर्व में आदि शंकराचार्य का जन्म दक्षिण भारत में हुआ। उन्होंने कई वैदिक सत्य शास्त्रों का अध्ययन किया। उन्होंने जाना कि सत्य आर्थात वेद मत का छूटना और नास्तिक मत का प्रचलित होना राष्ट्र के लिए ठीक नहीं है। तब उन्होंने वेदों की शिक्षा के अनुरूप वैदिक धर्म को बढ़ाने के लिए बौद्ध जैन नास्तिक मतावलंबियों से बहुत लंबे काल तक शास्त्रार्थ किया और उनको परास्त किया।

आदि शंकराचार्य ने संपूर्ण आर्यावर्त में घूम कर सनातन वैदिक धर्म का पुनर्स्थापन किया और अधिकतम जनसंख्या को फिर से आर्य बना दिया। वे अभी 32 वर्ष के ही थे कि उनके ही दो अनुयाई जो उपर से उनके शिष्य, लेकिन अंदर से कपटी नास्तिक थे, उन्होंने आदि शंकराचार्य को ऐसी विषयुक्त वस्तु खिलाई की कुछ ही समय मे उनका शरीर छूट गया। वे 32 वर्ष ही जिए, पर उन्होंने बहुत सारे, सत्य और प्रामाणिक ऋषियों के ग्रंथों पर भाष्य लिखे। उन्होंने पूरे भारत में चारों दिशाओं में चार मठों की स्थापना की, जिसमें कई यज्ञशालाऐं थी। यहां से देश में पुनः वेद मत का प्रचार प्रसार होने लगा।

आदि शंकराचार्य की मृत्यु के पश्चात उनके शिष्यों ने भी अगले 500 वर्षों तक वैदिक धर्म को बहुत अधिक प्रचारित और प्रसारित किया। उस समय का आर्यावर्त पश्चिम में ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, उत्तर में तिब्बत और पूर्व में ब्रह्मदेश (म्यांमार) तक विस्तृत था।

ईसा के प्रारंभिक वर्षों के लगभग भारत में सम्राट विक्रमादित्य का जन्म हुआ। उनके शासन में कालिदास प्रसिद्ध कवि हुए हैं। उन्होंने कई ग्रंथों की रचना की। उनके ग्रंथों से ये विदित होता है कि अभी भी आर्यावर्त में अधिकांश वैदिक धर्मावलंबी ही थे। और अभी तक देवी देवताओं की मूर्ति पूजा की कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।

महाराजा विक्रमादित्य की मृत्यु के पश्चात भारत में राजनीतिक अस्थिरता पुनः शुरू हो गई। इसका पूरा लाभ वाममार्गियों ने उठाया। इन्होंने अपने “पंच मकार” का प्रचार प्रसार आर्य नगरों व ग्रामों में दोबारा करना शुरू कर दिया, और वे अगली एक शताब्दी तक बिना किसी विशेष परेशानी के अपने मत का प्रचार करते रहे। इन्होंने एक बड़ी आर्य जनसंख्या को “पंचमकार” के भ्रम जाल में फंसा लिया।

इसी काल खंड में वाममार्गियों ने अवैदिक ग्रंथ “पुराणों” की रचना करके अब अपना नया रूप आर्यों के सामने प्रस्तुत किया। वाममार्गियों ने कई काल्पनिक पुराण, शिवलिंग आदि को मान्यता दिलवाने के लिए उस समय पाटलिपुत्र के राजा हुविष्क को अपने जाल में फंसा लिया।

राजा हुविष्क ने आर्यावर्त के सबसे पहले मंदिर, मुंडेश्वरी देवी मंदिर का निर्माण ईसा के प्रारंभिक वर्षों में कराया। उस राज्य की आर्य प्रजा ने भी, राजा के अनुरूप अपना देवता परम योगी महादेव शिव के रूप को विकृत करके बनाए गए पुराणों के शिव को मानना प्रारम्भ कर दिया। यह शिव मंदिर आज भी बिहार के कैमूर जिले के भगवानपुर अंचल में पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

अब वाममार्गियों को एक मूल मंत्र मिल चुका था उन्होंने अन्य नए-नए पुराणों जैसे शिवपुराण, देवीभागवत पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, गरुण पुराण आदि की रचना की और बहूत सारे राजाओं की मदद से, पुराणों के आधार पर उन्होंने उनके अनेक मनघड़ंत देवी देवताओं की मंदिर, मूर्तियां बनवाईं। तथा आर्यो के देवालयों व मठों में से यज्ञशालाऐं हटवाकर उनकी जगह मूर्त्तियां व शिवलिंग स्थापित करवा दिए गए। जैसे जैन और बौद्धों ने अपनी मूर्तियां वैरागी, नग्न और ध्यान मुद्रा में बनाई ठीक इसी के विपरीत वाममार्गियों ने अपने देवी देवताओ की मूर्ति साज श्रंगार आदि से युक्त देवी दुर्गा, विष्णु की मूर्तियां बनाई। क्योंकि यदि जैनियों और बौद्धों के तुल्य बनाते तो इनके मत के ही माने जाते।

तब से व्यापक रूप से भारत में भारत का दुर्भाग्य अर्थात् “मूर्तिपूजा” प्रचलित होती चली गई। ना तो मूर्तिपूजा सनातन है और ना ही धर्म से इसका कोई लेना देना है। ये एक कुरिती के अतिरिक्त और कुछ नहीं|

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betnano
Hititbet Giriş
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet
betgaranti giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betgaranti giriş
sahabet
sahabet
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betyap giriş
betyap giriş
betyap giriş
betyap giriş
solobet giriş
solobet giriş
hititbet giriş