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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

‘गोरी’ का ‘पृथ्वी’ से करो सामना

भारत में नशीली दवाओं के व्यापार से पैदा किया गया पैसा पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में ही भारत की खुफिया एजेंसीज के लिए चिंता का विषय बन चुका था। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपने देश की अर्थव्यवस्था को विध्वंस करने और नशीली दवाओं के माध्यम से अपनी युवा पीढ़ी को नष्टï करने के इस गंभीर आक्रमण के प्रति आंखें मूंदे बैठे हैं।

टास्क फोर्स ने पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में अपना निष्कर्ष निकाला था कि नशीली दवाओं से प्राप्त धन आईएसआई और उसके सहयोगियों द्वारा दवाईयां भेजने के विदेशी माध्यम से इकट्ठा किया जाता है, और उसकी वास्तविकता को छिपाने के लिए विभिन्न विन्यासों के माध्यम से उसे वैध रूप दिया जाता है। उसके बाद उसे खाड़ी और अन्य देशों में बड़ी राशि में उपलब्ध करा दिया जाता है। इन देशों से यह धन बैंकिंग चैनलों के माध्यम से विभिन्न व्यक्तियों और भारत के भीतर धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक गतिविधियों की आड़ में अपना मूल उद्देश्य पूरा करने वाले मुस्लिम संगठनों तक पहुंचा दिया जाता है। जिनके पास वह धन भेजा जाता है, वे प्राय: इसे निवेश मूलक गतिविधियों में लगाते हैं तथा उससे प्राप्त लाभ जो विधिवत वैध होता है, को अन्य अनेक कार्यों में लगाते हैं।

इस प्रकार का धन द्वितीय या तृतीयक अवस्था में जो विदेशी योगदान नियामक अधिनियम के नियंत्रण के बाहर होता है, मुसलिम संगठनों के लिए उपलब्ध कराया जाता है। जिनमें भारतविरोधी गतिविधियां फैलाने वाले तथा उसमें सहयोग करने वाले कट्टरपंथी संगठन भी सम्मिलित हो सकते हैं। हालांकि धन की गतिशीलता के द्वितीयक या तृतीयक चरण में विदेशी योगदानों को आतंकवादी गतिविधियों में लगने से रोकना और उसका पता लगाना सचमुच एक कठिन कार्य है, लेकिन हम समझते हैं कि संचालन के मौजूदा स्तर को देखते हुए इस प्रकार के धन को प्राथमिक अवस्था में भी बिना सुराग के गैर कानूनी गतिविधियों में लगाया जा सकता है।

यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि विदेशी योगदान नियामक अधिनियम (एस.सी.आर.ए.) के अधीन निर्धारित सांस्कृतिक, शैक्षिक धार्मिक तथा सामाजिक कार्यक्रम रखने वाले पूर्वोक्त संगठन के अतिरिक्त अन्य कोई भी राजनैतिक संगठन अथवा अन्य संगठन नही हैं, जो गृहमंत्रालय की पूर्व अनुमति के बिना अथवा गृहमंत्रालय में पंजीकरण कराये बिना विदेशी योगदान स्वीकार कर सके। अनुदान प्राप्त करने वाले के खाते की जांच और नियमों का उल्लंघन करने पर दण्डात्मक कार्रवाई का प्रावधान कानून में है।

आज केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार है। जिसके आने से व्यवस्था में सुधार के संकेत मिले हैं। पर देश में बाहर से आने वाले धन का दुरूपयोग तो आज भी कुछ संस्थाएं या सामाजिक संगठन पूर्ववत ही कर रहे हैं। यह धन भारत के इतिहास धर्म और संस्कृति को मिटाकर यहां विदेशी इतिहास धर्म और संस्कृति को आरोपित करने के प्रायोजित कार्यक्रम पर व्यय हो रहा है। यह एक प्रकार का आक्रमण है, जिसके गंभीर परिणाम आ रहे हैं। हम किसी भौतिक युद्घ की प्रतीक्षा में रहते हैं, या जब सीधे-सीधे सेनाओं की टक्कर होती है तो उसे ही युद्घ मानते हैं। जबकि पाकिस्तान छद्मयुद्घ में भारत को उलझाये रखना चाहता है। भारत को इस छद्मयुद्घ से निपटने में भौतिक युद्घ की अपेक्षा कई गुणा शक्ति और ऊर्जा का अपव्यय करना पड़ रहा है।

अब पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने प्रधानमंत्री मोदी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ की उफा में हुई अभी की ताजा बैठक में बनी किसी सहमति की यह कहकर हवा निकाल दी है कि बिना कश्मीर के भारत से कोई वार्ता नही होगी।

भारत के विषय में टास्क फोर्स का यह भी मानना रहा है कि आर्थिक गोपनीय सूचनाओं का संग्रह करने उन्हें मिलाने और उनका विश्लेषण करने या आर्थिक अपराधियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिए कोई भी समन्वित व्यवस्था नही है। प्रत्येक संगठन अपने ही सीमित क्षेत्र के भीतर कार्य कर रहा है और सिर्फ पहले सामने आ चुके मामलों से संबंधित सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहा है। यह एक बड़ी कमी है जिसके कारण आर्थिक अपराधी कानूनों की सख्ती से बच निकलते हैं।

अब सरताज अजीज के बयान के बाद भारत सरकार को चेतना होगा। इस बयान के अर्थ स्पष्टï हैं कि पाकिस्तान भारत से कश्मीर को लेने के लिए अपने छद्मयुद्घ को तेज तो करा सकता है पर उसे कम नही करेगा। भारत की नई पीढ़ी को बर्बाद करने और यहां की अर्थव्यवस्था को चौपट करने के लिए भी उसका पूर्व प्रायोजित आतंकवाद जारी रहेगा।

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