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व्यापमं से उभरे कुछ जरूरी सवाल

vyapam-truthव्यापमं घोटाले में रहस्यमयी परिस्थितियों में मौतों का कारण क्या है, इसको लेकर कई तरह की बातें कही जा रही हैं, लेकिन इतना तो साफ है कि किसी एक घोटाले से जुड़े इतने सारे लोगों की मौत अपने आपमें एक अभूतपूर्व परिघटना है। लगता है कि हाईकोर्ट की निगरानी में मामले की जांच करने वाले विशेष जांच दल का गठन भी इसीलिए किया गया था ताकि कोई प्रदेश सरकार पर ये आरोप न लगा सके कि वह इस मामले की हकीकत को छुपाना चाहती है। लेकिन एसआईटी की जांच कितनी चाकचौबंद रही, वह अब जगजाहिर है। सर्वोच्च अदालत द्वारा अब इस मामले की जांच का जिम्मा सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसी को सौंपने का निर्णय भी यही बताता है कि एसआईटी की प्रामाणिकता संदेहों से परे नहीं थी।

व्यापमं घोटाले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद के एक पक्षधर संस्था के रूप में अवमूल्यन किए जाने की चिंतनीय प्रवृत्ति भी और मजबूत हुई है। जब भी केंद्र में सत्ता परिवर्तन होता है, पहली गाज राज्यपालों पर गिरती है और नया निजाम अपने चहेतों को राजभवन भेज देता है। केंद्रीय कार्यपालिका इस बात को स्वीकार नहीं कर पाती कि राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत और राजनीतिक पक्षधरता से परे एक व्यक्ति राज्यों में बैठकर उनकी पार्टी की सरकार के निर्णयों को प्रभावित कर सकता है। वैसे राज्यपाल के पद का राजनीतिक दुरुपयोग एक अरसे किया जाता रहा है। अगस्त 1984 में तत्कालीन कांग्रेस महासचिव राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री के पुत्र होने के अपने रुतबे का दुरुपयोग करते हुए आंध्रप्रदेश के राज्यपाल रामलाल की मदद से ही एनटी रामाराव की तेलुगुदेशम सरकार गिरवा दी थी। ठीक ऐसा ही जम्मू-कश्मीर में भी राज्यपाल की मदद से तत्कालीन फारूख अब्दुल्ला सरकार को गिरवाकर किया गया था। इन दोनों राज्यों में राजीव ने अपनी पसंद के लोगों को बिठवा दिया। स्थिति यह बन गई थी कि कुछ ही हफ्तों बाद इंदिरा गांधी को आंध्रप्रदेश के राज्यपाल को हटवाते हुए एनटीआर सरकार को बहाल करवाना पड़ा था। कश्मीर में भी गुलाम मोहम्मद सरकार लंबे समय तक टिक नहीं पाई थी। राज्यपाल के पद के राजनीतिक दुरुपयोग का एक क्लासिक उदाहरण तब देखने को मिला था, जब सरदार बूटा सिंह ने बिहार में एक निर्वाचित सरकार के गठन में अड़ंगा डाल दिया था। अंतत: सर्वोच्च अदालत को हस्तक्षेप करते हुए उन्हें वहां से हटवाना पड़ा था।

राज्यपालों की थोकबंद रवानगी का नजारा सबसे पहले वर्ष 1977 को देखने को मिला था, जब देश में पहली बार केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकार बनी थी। वर्ष 1980 में जब इंदिरा गांधी की सरकार फिर से सत्ता में काबिज हुई तो उन्होंने जनता सरकार द्वारा बिठाए गए राज्यपालों को हटाते हुए तुरंत ही इसका हिसाब भी चुकता कर दिया। वर्ष 1989 में भाजपा ने वीपी सिंह सरकार को समर्थन इस शर्त पर दिया था कि जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया जाएगा। जबकि आपातकाल के दौरान संजय गांधी की शह पर किए गए अपने क्रियाकलापों के चलते वे पहले ही काफी बदनामी मोल ले चुके थे। तब दिल्ली के सौंदर्यीकरण के नाम पर झुग्गी बस्तियों के उन्मूलन की कार्रवाई में मुख्य भूमिका निभाकर वे विवादों में आए थे। तुर्कमान गेट कांड नामक यह घटना तब बहुत चर्चित हुई थी। वर्ष 1990 में जब कश्मीर घाटी में उग्रवाद फैला, तब कश्मीरी पंडितों के पलायन में भी जगमोहन की भूमिका विवादों के दायरे में रही थी। अंतत: वीपी सिंह सरकार को जगमोहन को राज्यपाल पद से हटाने को मजबूर होना पड़ा था।

बहरहाल, व्यापमं घोटाले से एक अन्य सवाल यह भी उठा है कि क्या राजनीतिक संकटों का समाधान न्यायपालिका की मदद से खोजने की कोशिश की जानी चाहिए या नहीं। राजनेता न्यायपालिका की शरण में भी केवल तभी जाते हैं, जब उन्हें लगता है कि फलां मामले में जनाक्रोश बढ़ता ही जा रहा है। तब उन्हें लगता है कि न्यायपालिका से क्लीनचिट मिले बिना वे अपने नैतिक आधार की पुष्टि नहीं कर सकते। व्यापमं मामले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चाहते तो अपने स्तर पर सीबीआई जांच की सिफारिश कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा तब जाकर किया, जब उनके पास कोई और चारा नहीं रह गया था। इसके तुरंत बाद सर्वोच्च अदालत ने भी मामले की सीबीआई जांच कराने का आदेश दे दिया। या शायद मुख्यमंत्री अदालत के हस्तक्षेप का ही इंतजार कर रहे थे।

राजनीतिक संकटों का हल न्यायपालिका के माध्यम से खोजने की प्रवृत्ति की शुरुआत तब हुई थी, जब राज्यसभा के माक्र्सवादी सदस्यों ने सर्वोच्च अदालत से अनुरोध किया था कि वह हस्तक्षेप करते हुए तत्कालीन संचार मंत्री सुखराम द्वारा किए गए स्पेक्ट्रम लाइसेंसों के आवंटन पर संसद के उच्चतर सदन में बहस सुनिश्चित करवाए। पीवी नरसिंह राव सरकार बहस को लेकर तैयार नहीं थी। सर्वोच्च अदालत ने भी इस मामले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया, क्योंकि उसका स्पष्ट मत था कि सदन की कार्रवाई में दखल देना उसके अधिकारक्षेत्र में नहीं आता और संविधान ने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के अलग-अलग दायित्व निर्धारित किए हैं।

गौरतलब है कि अतीत में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री बाबू जगजीवन राम के कुछ कथनों को सदन की कार्यवाही से हटा देने के सर्वोच्च अदालत के आग्रह को लोकसभा ने सिरे से खारिज कर दिया था। इसी प्रकार वर्ष 1969 में केशवानंद भारती मामले में भी लोकसभा ने सर्वोच्च अदालत के समक्ष अपनी स्वायत्तता की पुष्टि की थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सर्वोच्च अदालत के हस्तक्षेप के बावजूद अपने दूरसंचार मंत्री ए. राजा का इस्तीफा नहीं मांगा था। आखिरकार सर्वोच्च अदालत ने ही इस मामले में सीबीआई जांच कराने का आदेश दिया था। यही स्थिति कोयला घोटाले में भी दोहराई गई। ताजा मामले में भाजपा ललितगेट कांड को लेकर सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे का तो पुरजोर बचाव कर सकी, लेकिन शिवराज सिंह चौहान के मामले में वह अपना पक्ष उतनी ताकत से नहीं रख पाई। यकीनन इसका कारण व्यापमं घोटाले से जुड़ी रहस्यमय मौतें हैं। मुख्यमंत्री चौहान भी खुद कोई ठोस निर्णय लेने के बजाय न्यायिक हस्तक्षेप की बाट जोहते रहे।

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