मध्य प्रदेश सरकार कर रही है बिरसा मुंडा के सपनों को साकार

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 मनोज कुमार

जनजातीय गौरव दिवस 15 नवम्बर के लिए विशेष
मनोज कुमार
मध्यप्रदेश के इतिहास में एक और दिन 15 नवम्बर ऐतिहासिक दिन के रूप में लिखा जाएगा जब जनजातीय गौरव दिवस के रूप में बिरसा मुंडा की जयंती का जयघोष होगा। ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश हमेशा से बड़े दिल का रहा है और रांची के इस महान वीर सपूत बिरसा की जयंती मध्यप्रदेश की भूमि पर आयोजित है। यह एक महज आयोजन नहीं है बल्कि इस बात का संदेश है कि स्वाधीनता संग्राम के लिए सर्वस्व त्याग करने वाले वीर योद्धा किसी क्षेत्र विशेष के ना होकर सम्पूर्ण भारत वर्ष का गौरव हैं। मध्यप्रदेश एक नजीर बन रहा है कि एक राष्ट्र की संकल्पना को कैसे व्यवहार में लाया जाए। यह अवसर भी माकूल है जब हम स्वाधीनता संग्राम के 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं तब इन वीर योद्धाओं का स्मरण समाज का दायित्व बनता है। इन वीरों के स्मरण से उनके कार्यों और बलिदान की जो राष्ट्रीय भावना थी, उससे युवा पीढ़ी को अवगत कराना है। यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात है कि बिरसा मुंंंडा की जयंती मनाने का अवसर हमें मिल रहा है।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अंग्रेजों को चने चबाने वाले वीर नायकों से मध्यप्रदेश का स्वर्णिम इतिहास लिखा गया है। जिन जनजातीय वीर योद्धाओं का हम स्मरण करते हैं उनमें भीमा नायक, टंट्या मामा, खाज्या नायक, संग्राम शाह, शंकर शाह, रघुनाथ शाह, रानी दुर्गावती, बादल भोई, राजा भभूत सिंह, रघुनाथ मंडलोई भिलाला, राजा ढिल्लन शाह गोंड, राजा गंगाधर गोंड, सरदार विष्णुसिंह उइके जैसे अनेक चिंहित नाम हैं। लेकिन सत्य यह भी है कि अनेक ऐसे नाम हैं जिनका उल्लेख कभी इतिहास में नहीं किया गया। स्वाधीनता संग्राम के 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान पर इतिहास का पुर्नलेखन किया जा रहा है। अब तक जो इतिहास लिखा गया, उसमें स्वतंत्रता संग्राम के अनेक बहुमूल्य घटनाओंं और नामों को जानबूझकर विलोपित कर दिया गया। इतिहास लेखन की इस नवीन प्रकल्प को प्रभावी बनाने के लिए जनजातीय समाज के वीर योद्धाओं का स्मरण करना आवश्यक हो जाता है। यह वही अवसर है जब दबा दिये गए, छिपा दिए गए तथ्य सामने आते हैं और हम इतिहास को नए सिरे से लिखते हैं।
मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह सरकार ने जनजातीय समाज के लिए ऐसे अनेक कार्य किये हैं जो उन्हें मुख्यधारा में लाते हैं। पूर्ववर्ती सरकारों ने सुनियोजित ढंग से जनजातीय समाज को कभी मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बनने दिया। उन्हें इस बात का भय था कि जनजातीय समाज शिक्षित हो जाएगा, आत्मनिर्भर हो जाएगा तो उसके भीतर अपने अधिकारों के लिए लडऩे की शक्ति आ जाएगी। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान इस बात को बेहतर ढंग से जानते थे लेकिन उन्हें अपनी सरकार की नीतियों पर भरोसा है और उनका मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबको बराबर का अधिकार मिलना चाहिए। इस दृष्टि के साथ जनजातीय समाज के लिए ना केवल शिक्षा की व्यवस्था की बल्कि उनके लिए रोजगार के बेहतर अवसर मुहय्या कराया। जिन जनजातीय बच्चों को स्कूल जाना नसीब नहीं था, वे बच्चे आज विदेश में पढ़ रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा जिनके लिए कभी नहीं थी और थी भी तो बेहद औपचारिक वे बच्चे इंजीनियरिंग और मेडिकल के साथ एमबीए जैसे विषयों में दक्षता हासिल कर अपनी नई दुनिया गढ़ रहे हैं। जनजाति समाज पर प्रकृति का आशीर्वाद है। प्रकृति से सीधे जुड़े होने के कारण उनके भीतर नैसर्गिक कला संसार बसा हुआ है। शिवराजसिंह सरकार ने इसे पहचाना और देश-दुनिया का मंच दिया जहां आज ना वे अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं बल्कि आय का उत्तम स्रोत भी उन्हें मिल गया है।
वीर योद्धा बिरसा मुंडा की कहानी पढ़ते हैं तो ज्ञात होता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व भी जनजाति समाज सूदखोरों के चंगुल में फंसा था। आज भी हालात में बहुत कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है। सात दशक की यात्रा का विवेचन करें तो स्पष्ट हो जाता है कि मध्यप्रदेश की जनजाति समुदाय को सूदखोरों से मुक्त करने के लिए कोई गंभीर और प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह सरकार ने इस दिशा में प्रभावी पहल की है। मध्यप्रदेश सरकार का क्रांतिकारी फैसला साहूकारों से जनजाति समुदाय को मुक्त कराना है तथा ऋणमुक्त कर उन्हें अनावश्यक तनाव से मुक्ति दिलाना भी सरकार की प्राथमिकता में है। मध्यप्रदेश अनुसूचित जनजाति साहूकार विनियम 1972 को और अधिक प्रभावी बनाकर साहूकारों के लिए लायसेंस लेना अनिवार्य करने के साथ ब्याज की राशि निर्धारित की जा चुकी है और निर्धारित ब्याज राशि से अधिक लेने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की जाएगी।
पूर्ववर्ती सरकारों ने जनजातीय समाज को आगे आने नहीं दिया। उनकी कला-कौशल को समाज के समक्ष नहीं रखा जिसकी वजह से हमेशा से आत्मनिर्भर रहा जनजातीय समुदाय स्वयं को निरीह महसूस करने लगा था। बीते डेढ़ दशक में मध्यप्रदेश सरकार ने इस समाज के दर्द को समझा और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई नए प्रकल्प तैयार किये। मोदी सरकार के साथ कदमताल करती मध्यप्रदेश सरकार ने लोकल से वोकल और एक जिला, एक प्रोडक्ट पर कार्य कर इन जनजातियों को आगे बढऩे का अवसर दिया। मध्यप्रदेश के जनजाति समूह खेती करने के साथ वनोपज संग्रह, पशुपालन, मत्स्य पालन, हस्त कला यथा बांस शिल्प, काष्ठ शिल्प, मृदा शिल्प एवं धातु शिल्प का कार्य करते हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने ऐलान किया है कि देवारण्य योजना के अंतर्गत वनोत्पाद और वन औषधि को बढ़ावा दिया जाएगा एवं वन उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य में खरीदा जाएगा।  जनजातीय समुदाय की कला कौशल को मध्यप्रदेश सरकार ने ना केवल दुनिया को बताया बल्कि बाजार भी उपलब्ध कराया ताकि उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिल सके।
मध्यप्रदेश में जनजातीय समाज की बेहतरी के लिए जो कार्य किये जा रहे हैं, वह बिरसा मुंडा के स्वप्र को सच करने की कोशिश है। योद्धा बिरसा मुंडा भी जनजाति समाज को शोषणमुक्त देखना चाहते थे। वे चाहते थे कि समाज में समरसता हो और जनजाति समाज को मुख्यधारा में स्थान मिले। रोटी और रोजगार के साथ शिक्षा का बेहतर विकल्प मिले। युवा शिक्षित और आत्मनिर्भर हों और उनके मन में देशप्रेम का भाव हो। मध्यप्रदेश बिरसा मुंडा के सपनों को सच कर रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान सबका साथ, सबका विकास के साथ हमारा मध्यप्रदेश गढ़ रहे हैं। बिरसा मुंडा की जयंती के माध्यम से मध्यप्रदेश में जनजातीय समाज की बेहतरी के लिए किये जा रहे कार्यों से पूरा देश परिचित हो सकेगा।

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