वैदिक सम्पत्ति : आसुर उपनिषद् की उत्पत्ति

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गतांक से आगे…
यह सारा प्रपंच अधिक स्पष्ट हो जाता है, जब हम आसुर उपनिषद में लिखा हुआ पाते हैं कि, उपनिषद्विद्या को ब्राह्मण नहीं जानते थे। छान्दोग्य 5/3/7 में लिखा है कि ‘न प्राक त्वत्त पुरा विद्या ब्राह्मणन गच्छति’ अर्थातत् तुम से पूर्व विद्या को ब्राह्मण नहीं जानते थे। इसी तरह बृहदारण्यक 6/2/8 में लिखा है कि ‘अथेयं विद्येतः पूर्व न कस्मिश्रवनब्राह्मण उवास’ अर्थात् इसके पूर्व कोई ब्राह्मण इस विद्या को नहीं जानता था। इस वर्णन से यह ज्ञात हुआ कि इस आसुर उपनिषद को,जो वेदों के विरुद्ध है, ब्राह्मण नहीं जानते थे। ठीक है, जो बात वेद में ही नहीं है, उसको ब्राह्मण कैसे जानते। किन्तु प्रश्न तो यह है कि इसे जानता कौन था और यह आर्यों की विद्या है या नहीं। इस प्रश्न का उत्तर जब तक न गढ़ लिया जाता तब तक आर्यों में इसका प्रचार हो ही नहीं सकता था।इसलिए इन्होंने बेचारे क्षत्रियों को अपने अनुकूल बनाया। क्योंकि छान्दोग्य 5/3/7 में लिखा है कि, ‘सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूत’ अर्थात् इस विद्या में सदैव क्षत्रियों का ही अधिकार रहा है। इस तरह फिर छान्दोग्य 5/11/ 4 में लिखा है कि, ‘तद्वै तद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनु: प्रजाभ्य:’ अर्थात् इस विद्या को ब्रह्या ने प्रजापति को, प्रजापति ने मनु को और मनु ने प्रजा को बतलाया। इस तरह से यह विद्या क्षत्रियों से ही प्रचलित हुई और उन्हीं में रही। इस उक्ति का कारण यह है कि यह मिश्रण करनेवाले विदेशी भी पहले के प्रायः क्षत्री ही थे। हम आर्यों के विदेशगमन में लिखा आये हैं कि क्षत्रिय जाति के कतिपय मनुष्य वृषल होकर आन्ध्रादि हो गए थे और ऑस्ट्रेलियादि देशों को चले गए थे। इस ऐतिहासिक सत्यता के आधार पर ही इन्होंने यह विद्या क्षत्रियों को बतलाई है और इसी आधार से इन्होंने कुछ क्षत्रियों को मिलाकर, उपनिषदों में मिश्रित आसुरी लीला का प्रचार करने के लिए गुप्त मंडली भी बनाई थी। इसी समस्त कार्यसाधना के लिए लिखा है कि, यह विद्या क्षत्रियों की है जो हो, पर बड़े ही दु:ख की बात है कि इस आसुर उपनिषद् को इन जालसाज ओं ने हमारे आर्यमुकुट हिंदूकुलपति पूज्य क्षत्रियों के नाम से प्रसिद्ध किया। यह प्रसिद्ध उपनिषद तक ही नहीं रही। प्रत्युत यह जहर गीता में भी डाला गया।
इस विद्या को, सूर्य ने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को सिखलाया। इस तरह इक्ष्वाकु से वंशपरंपरा प्राप्त यह विद्या क्षत्री राजर्षियों में चली आ रही है। यह राजविद्या और गुप्त विद्या है। तू मेरा मित्र है, इसलिए हे अर्जुन!वह तुझे बतलाता हूं।
क्रमशः

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