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पर्यावरण

बैठता जा रहा है बारिश को लेकर लोगों में डर

अशोक प्रवृद्ध

पूर्णत: मानसून पर निर्भर हमारे देश भारत में वर्षा अर्थात बारिश को सदैव से ही ईश्वर की वरदान के रूप में देखा जाता रहा है, परन्तु  अब बारिश के बाद शहरों व गांवों में जो हालात पैदा होने लगे हैं उससे यह वरदान अभिशाप साबित होने लगा है और बारिश होने के साथ ही हर जगह पानी ही पानी और कीचड़ ही कीचड़ नजर आता है तथा लोगों में सर्वत्र भय व्याप्त हो जाता है । स्थिति यह हो जाती है कि लोग बारिश के बाद अब घर से निकलने में डर महसूस करते हैं। पहले लोग वर्षा में भीग-भीग कर मजे से नहाया करते थे, परन्तु अब बारिश में नहाने की बात तो दूर, सब जान बचाने की सोचते हैं। लोगों का कहना है कि इसे चाहे उन्नति कहें या अवनति, लेकिन अब यथार्थ यही है कि देश में वर्षा को अब बाढ़ कहा जाना चाहिए । प्रश्न उत्पन्न होता है कि आखिर कैसे पैदा हुए यह हालात ? कौन है इसके लिए जिम्मेदार और कैसे निकल सकते हैं इस हालात से बाहर?

विगत कुछ वर्षों से शहर ही नहीं गांव के लोगों में भी बारिश को लेकर एक डर सा बैठता जा रहा है। यह कोई एक जगह की बात नहीं है, बल्कि केरल से लेकर कश्मीर तक और बंगाल से लेकर राजस्थान तक बारिश के साथ जलभराव, जलजमाव और फिर दुर्घटनाओं के साथ जान-माल की क्षति आम बात हो गई है। कुछ वर्ष पहले तक केवल नदी या बड़े नालों के किनारे बसे शहरों व गांवों में उसी समय बाढ़ आती थी जबकि कई दिनों की झड़ी लगकर बरसात होने पर नदी-नालों में उफान आ जाता था । ऐसे बाढ़ का पैमाना भी उस पर किसी जगह बने पुल का डूबना या पानी का तट से ऊपर बहकर बस्तियों में आना होता था, परन्तु अब हालत यह है कि अगर वर्षा न आये तो आफत और आ जाये तब भी आफत । पहले नगर-कस्बों-गांवों का वर्षा जल नालियों से फौरन ही निकल जाता था, जबकि अब पानी निकलता नहीं है क्योंकि नालियां नहीं हैं, जो हैं वे हमेशा कचरे से भरी अर्थात चोक रहती हैं । जिसके कारण वर्षा काल में रहवास क्षेत्र में जलजमाव और वर्षा के शीघ्र बाद पेयजल तक की अभाव जैसी समस्याओं से जूझना भारतीयों की नीयति बनती जा रही है । स्वच्छ भारत अभियान में कभी आगे जाकर हो सकता है कचरे के निष्पादन से इसका समाधान हो जाए, परन्तु निकट भविष्य में ऐसा होता संभव नहीं दिखाई देता।

हमारी आर्थिक राजधानी मुम्बई में हमेशा से मूसलाधार वर्षा होती है। मुम्बई समुद्र तट पर है और इस शहर के जनजीवन में एक विलक्षण गतिशीलता है। जिस तरह मुम्बई दौड़ता रहता है, ठीक इसी तरह मुम्बई में होने वाली घनघोर वर्षा जल भी गतिशील मुम्बई की भान्ति फौरन इधर गिरा और तुरंत उधर समुद्र में समा गया। लेकिन अब हालत बदल गये हैं और अब मुम्बई में वर्षाकाल में दो की जगह तीन समुद्र हो जाते हैं । मुम्बई के पूर्व में मुम्बई की खाड़ी (बे) और पश्चिम में अरब सागर है। वर्षा काल में अब सम्पूर्ण मुम्बई नगर ही तीसरा समुद्र हो जाता है। अब उसका पानी बहकर समुद्र में नहीं जाता बल्कि पूरा महानगर ही डूबकर समुद्र बन जाता है ।देश की राजधानी दिल्ली यमुना नदी के तट पर बसी है, लेकिन अभी इन दिनों यमुना में बाढ़ नहीं आयी है, लेकिन दिल्ली में कई बार बाढ़ आ गयी है । प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी की जल जमाव की यह स्थिति अभी भी समाचार की सुर्खी बनी हुई है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की भौगोलिक पहचान बड़ा तालाबी  है। यह कहावत सर्वप्रचलित है- तालों में भोपाल ताल, लेकिन भोपाल में भी स्थिति यह है कि थोड़ी वर्षा होने के साथ ही भोपाल ताल का शहर ही दूसरा ताल बन जाता है, जो वहाँ के भौगोलिक तालाब से भी बड़ा हो जाता है । हर जगह जल भराव और जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। उज्जैन शहर की भी यही स्थिति है। गत दिनों यहाँ हुई थोड़ी वर्षा से ही वहाँ के सतर प्रतिशत घरों में दो से चार फीट तक पानी भर आया, जिसे हमारे कई मित्रों ने स्वयं उलछ-उलछ कर घर से बाहर निकालकर फेसबुक पर डाक अर्थात पोस्ट कर सैंकड़ों पसन्दगी अर्थात लाइक्स और टिप्पणियाँ अर्थात कमेंट्स प्राप्त किए । और तो और उज्जैन के प्रसिद्द महाकाल के मन्दिर में भी वर्षा जल चार फुट तक भर आया और मन्दिर में आरती व भष्म भी पानी में खड़े होकर करनी पड़ी । यह स्थिति कुछ गिने-चुने शहरों में नहीं बल्कि हर शहर-कस्बे-गांव की है । सडक़ों की संरचना में हमेशा से उसके दोनों किनारों पर नालियां होती ही इसलिये हैं कि पानी सडक़ों व बस्तियों में ठहरे नहीं और फौरन निकल जाए। सडक़ें और उसके दोनों किनारे की नालियां दोनों समानान्तर रचनायें हैं- एक-दूसरे की पूरक व्यवस्थाएं हैं । लेकिन हमारे देश में समस्या यह है कि शहर नियोजन अर्थात सिटी प्लानिंग के प्रारम्भ में यह चिंता नहीं की जाती और यह सोचा नहीं जाता है कि जिस भू-भाग पर कोई शहर बसाया जा रहा है उसमे स्वभाविक ढलान किस ओर है? किस ओर नदी-नाले, तालाब- झीलें व अन्य पानी के स्रोत और निकास आदि हैं? इन सबकी चिंता किए बगैर बस जहां बेहतर जमीन दिखी वहीं फटाफट भवन, सडक़ और यहां तक कि उद्योग भी लगाना शुरू कर दिया जाता है । शहर नियोजन के स्तर पर अगर कुछ किया भी जाता है तो उस मास्टर प्लान पर सख्ती से अमल नहीं किया जाता। एक तरह से कहा जा सकता है कि हमारे देश में शहर नियोजन दृष्टि का पूर्णत: अभाव है । जबकि विकसित देशों में उपरोक्त सारी भू-स्थितियों के मद्देनजर ही किसी शहर का मास्टर प्लान बनाया जाता है, और एक बार प्लान बनने के बाद फिर उसका उल्लंघन वहां सामान्यत: संभव नहीं होता।

इसके विपरीत हमारे देश में लगभग हर गांव-कस्बे-शहर की एकसमान कहानी यही है कि प्राकृतिक नदी-नालों, झीलों और तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र में संरचनाओं का निर्माण कर लिया गया है और पानी निकासी के रास्तों पर भी कंक्रीट संरचनाएं जैसे सडक़ या दूसरे निर्माण खड़े कर दिए गए हैं। जिसके कारण रिहायशी क्षेत्र से पानी निकासी के सारे मार्ग अवरूद्ध हो चुके हैं । जबकि होना यह चाहिए था कि इन प्राकृतिक जल संसाधनों के सहअस्तित्व में   नगर की विकास की रूपरेखा तय की जाती तथा जरूरत अनुसार इनका विकास किया जाता। इसके विपरीत हम अपने प्राकृतिक जल संसाधनों को ही नष्ट करते जा रहे हैं। इसलिए जब भी बारिश आती है तो बाढ़ के पानी को निकास मार्ग नहीं मिल पाता। अत्यधिक कंक्रीट संरचनाओं के निर्माण के कारण वह जमीन में जा नहीं पाता अर्थात सोख नहीं पाता, उसका हम उचित उपयोग भी नहीं कर पाते और प्राय: हर शहर बारिश के मौसम में जानलेवा जलभराव की समस्या से जूझता है। जिस बारिश को वरदान बनना था वह प्राय: शहरों में मुसीबत बन कर आती है और बारिश के दौरान घरों से बाहर निकलना जोखिम का काम बन जाता है।

दरअसल एक बार शहर अथवा गांव के विकसित हो जाने पर फिर नये सिरे से नियोजन करना बड़ा महंगा काम होता है, वहीँ जल निकासी के लिए नई व्यवस्था की संरचना और जल संग्रहण के लिए खुली जगहों का निर्माण करना एक बड़ी लागत और अतिरिक्त जमीन व्यर्थ इस्तेमाल करने के साथ ही व्यर्थ श्रमसाध्य कार्य भी है ।बड़े शहरों में जमीनें भी बहुत महंगी होती हैं। इसलिए अगर आरंभ से इन सब जरूरतों के लिए जमीन नहीं छोड़ी गई है तो फिर इन सब जरूरतों के लिए जमीन हासिल करना बहुत टेढ़ा काम होता है। हर शहर की जरूरत के अनुसार स्थानीय स्तर पर ही कुछ व्यावहारिक हल ढ़ूंढऩे की आवश्यकता होती है । क्षेत्र में उपलब्ध तालाब, नालों और झीलों को और गहरा करने के साथ ही खुली जगहों के लिए अधिक से अधिक जगह निकालने की आवश्यकता होती है । वॉटर हार्वेस्टिंग को बड़े स्तर पर प्रोत्साहित कर, जल निकासी व्यवस्था का प्रबंधन चुस्त-दुरस्त कर बारिश के पानी के लिए सीवरेज ड्रेनेज से अलग एक निकास प्रणाली स्ट्रॉम ड्रेनेज प्रणाली विकसित कर ही बारिश के पानी की निकासी और उसका समुचित उपयोग भी किया जा सकता है ।

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