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विशेष संपादकीय

अब तो जागो….

देवेन्द्र सिंह आर्य

मानव का खानपान बदल गया, रहन-सहन बदल गया, चाल-चलन बदल गया, मानव की मान्यताएं बदल गयीं और बदल गया मानव का स्वभाव। जैसे-जैसे मानव मूल्यों में हृास हुआ मानव पतनोन्मुख होता चला गया मानव नाम प्राणी के अजीब-अजीब चेहरे मिलते हैं। मानव के पतन का सिलसिला अभी और चलना चाहिए या इस पर सोचना होगा, इसको पूर्ण विराम देना होगा। हम शायर की नई पंक्तियों पर अपना ध्यान केन्द्रित करना होगा।

अभी तलक कुछ लोगों ने बेची न आत्मा।

यह पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए।।

जब इन शेष लोगों की आत्मा भी बिक जाएगी तो मानव पूर्णतया नग्न हो जाएगा, इसलिए द्वितीय पंक्ति के भावार्थ पर रोक लगे।

मानव को उठना होगा। मानव को जागना होगा और ‘उतिष्ठत जागृत’ की पंक्तियों पर विशेष ध्यान देना होगा। मानव को वास्तविक रूप में निंद्रा से उठना होगा। आज यह जागता हुआ भी सो रहा है। उठने का तात्पर्य यहां चारपाई से उठना नही है। अगर मानव यही सोचता है तो ऐसा सोचना उसकी तंग सोच है। मानव को, जागते हुए जो सो रहा है उस निंद्रा को, उस रूप को त्यागना होगा। साथ ही अपने असली स्वरूप को पहचानना होगा। अपने मंतव्य एवं गंतव्य तथा जीवन के महत्व को पहचानना होगा।

मानव का निरंतर एवं उत्तरोत्तर उन्नति की तरफ अग्रसर होना ही उसका वास्तविक अर्थों में उठना है। मानव का प्रगति पथ पर आरूढ़ होना ही उठना है एवं मानव का ऊंचाईयों की बुलंदियों पर पहुंचना ही उठना है। मानव को अपनी अकर्मण्यता एवं निकम्मेपन को छोडक़र अपने आपको आदर्श रूप में स्थापित करना ही उसका उठना है। मानव को इस पंक्ति को अंगीकार करना ही उठना है-

तू नींद से अंखियां खोल जरा,

और अपने रब से ध्यान लगा।

यह प्रीति करन की रीति नही,

प्रभु जागत है तू सोवत है।।

मानव तू उसकी तरफ बढ़, चल, तेरा कारवां रूक न जाए। गति का क्रम टूट न जाए। गंतव्य एक दिन मिल ही जाना है, लेकिन हताश नही होना है क्योंकि-

मंजिल मिले, न मिले इसका गम नही।

मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है।।

मानव को उत्थान के लिए संघर्ष करना होगा। अनेक प्रकार की बाधाओं को पार करना होगा। मानव को अपनी नियंत्रण शक्ति इतनी बढ़ानी होगी एवं इतनी सशक्त करनी होगी कि उसके मन में केवल वही संकल्प उत्पन्न हों जिन्हें वह चाहता है। इससे अधिक हो न कम और मानव को अपने मंतव्य एवं गंतव्य में सफलता प्राप्ति के लिए पूर्णमनोयोग से पूर्ण आवेग एवं पूर्ण आवेश से आगे बढऩा होगा तभी उन्नति मिला करती है। मानव को सफलता प्राप्ति के मार्ग में बने अवरोधों को दूर करना होगा। बकौल शायर-

भंवरों से लड़ो तुंद लहरों से उलझो

कहां तक चलोगे किनारे-किनारे।।

मानव को इस महासंग्राम में उतरना ही होगा नही तो पतन के सिलसिले को कोई रोक नही सकता। मानव को निम्न प्रवृति छोडऩी होगी।

यही बहुत है कि तुम देखते हो साहिल से

सफीना डूब रहा है तो कोई बात नही।।

नही, मानव को साहिल से कूदना है और सफीना को बचाना है। सफीना को बचाना ही तो धर्म है। सफीना बचाना ही तो कर्म है। सफीना बचाते बचाते यदि न बचे तो कोई पाश्चाताप नही होगा क्योंकि मानव अपना कर्म करता है तो नियति अपना कार्य करती है फिर भी कवि दिनकर की यह पंक्तियां कितनी सार्थक हैं।

ना हार में ना जीत में,

किंचित नही भयभीत में।

कर्तव्य पथ परजो मिले,

यह भी सही वह भी सही।।

इसलिए कत्र्तव्य पथ पर जो भी मिले, हार या जीत, बढ़ता चल, एक दिन अवश्य सफलता की बुलंदियों को प्राप्त करेंगे।

मानव की मान्यताएं कैसे बदलीं, उसका एक छोटा सा उदाहरण है। हमारे वेद शास्त्रों में ब्रह्मïा मुहूर्त में उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर ईश उपासना करने को कहा गया है तथा सांय को भोजन जल्दी करके जल्दी सो जाना लिखा गया है जो अच्छे स्वास्थ्य के लिएए जरूरी है। अंग्रेजी की कविता के भाव भी कुछ ऐसे ही हैं। लेकिन मानव ने क्या करना प्रारंभ कर दिया है? र

ात केा देर तक जागना, सुबह 8-9 बजे तक सोना। भोजन करने व सोने के बीच में जो कम से कम तीन घंटे का अंतराल नियमानुसार रहना चाहिए वह नही रहा और भोजन देर से बनाया गया, देर से खाया गया। आमाशय व लीवर पर दबाव बना रहा। मनुष्य के स्वास्थ्य में विकार आ रहे हैं क्योंकि भोजन के उपरांत तीन घंटे तक भोजन आमाशय में रहता है और इतने समय तक सोना नही चाहिए। हम जागते रहेंगे तो घूमते फिरते भी रहेंगे।

जो हमारे भोजन को पचाने में सहायक होगा। ऋषि महर्षियों, वैज्ञानिकों का चिंतन लेखन बहुत ही महत्वपूर्ण है जो काफी शोध करने के उपरांत लिखा गया है। इस प्रकार जब से मानव ने मनन करना छोड़ा है तभी से नाना प्रकार की व्याधियों को निमंत्रण दिया है। मानीषियों का चिंतन आज भी प्रासंगिक है। मानव को सुधारना होगा। अपना पतन रोकना होगा। पतन का सिलसिला अब बंद होना चाहिए क्योंकि यह मानवीय गुण नही है।

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