सरदार पटेल पर हामिद अंसारी का विवादास्पद बयान

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(2018 में प्रकाशित लेख का पुन: प्रकाशन)

#डॉविवेकआर्य

हामिद अंसारी ने देश के बंटवारे को लेकर विवादित बयान दिया है। उन्‍होंने कहा कि देश के विभाजन के लिए सिर्फ पाकिस्तान ही जिम्मेदार नहीं था, बल्‍क‍ि हिंदुस्तान भी जिम्मेदार था। अंसारी ने सरदार वल्‍लभ भाई पटेल के भारत की आजादी के चार दिन पहले 11 अगस्‍त 1947 को दिए भाषण के बारे में जिक्र करते हुए ये बात बताई। पहले भी अंसारी भारत में अल्पसंख्यक मुस्लमान सुरक्षित नहीं है जैसे मज़हबी बयान दे चुकें हैं।
सरदार पटेल के विषय में सत्य आप इस लेख के माध्यम से जान सकते हैं। सरदार पटेल के विषय में यह दुष्प्रचारित किया गया कि वे मुसलमान-विरोधी थे। किंतु वास्तविकता इसके विपरीत थी। सच्चाई यह थी कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक साथ लाने के लिए सरदार पटेल ने हरसंभव प्रयास किए। इतिहास साक्षी है कि उन्होंने कई ऊँचे-ऊँचे पदों पर मुस्लमानों की नियुक्ति की थी। वह देश की अंतर्बाह्य सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे और इस संबंध में किसी तरह का जोखिम लेना उचित नहीं समझते थे।
यही कारण है कि जहां पटेल विभाजन से पहले मुस्लिम लीग और जिन्ना की मतान्ध नीतियों के घोर विरोधी थे वहीं विभाजन के पश्चात भारत में रह गए मुसलमानों से केवल वफ़ादारी का सबूत चाहते थे।

पटेल का कहना था-

मैं मुसलमानों से पूछता हूँ कि आप भारतीय इलाकों पर सीमावर्ती कबालियों की मदद के लिए पाकिस्तानी हमले की बगैर हिलाहवाली के निंदा क्यों नहीं करते?
क्या ये उनका दायित्व नहीं है कि भारत पर होने वाले हर हमले की निंदा करें?
हैदराबाद के विषय में भी सरदार पटेल की सम्मति जानने योग्य है। यह महसूस किया गया कि यदि सरदार पटेल को कश्मीर समस्या सुलझाने की अनुमति दी जाती तो जैसा कि उन्होंने स्वयं भी महसूस किया था, हैदराबाद की तरफ यह समस्या भी सोद्देश्यपूर्ण ढंग से सुलझ जाती। एक बार सरदार पटेल ने स्वयं एच.वी. कामत को बताया था कि ‘‘यदि जवाहरलाल नेहरू और गोपालस्वामी आयंगर कश्मीरी मुद्दे को निजी हिफाजत में न रखते तथा इसे गृह मंत्रालय से अलग न करते तो मैं हैदराबाद की तरह इस मुद्दे को भी देश-हित में सुलझा देता।’’
इसी प्रकार से, हैदराबाद के मामले में जवाहरलाल नेहरू सैनिक कारवाई के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने सरदार पटेल को यह परामर्श दिया-‘‘इस प्रकार से मसले को सुलझाने में पूरा खतरा और अनिश्चितता है।’’ वे चाहते थे कि हैदराबाद में की जानेवाली कारवाई को स्थगित कर दिया जाए। इससे राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। प्रख्यात कांग्रेसी नेता प्रो. एन.जी. रंगा की भी राय थी कि विलंब से की गई कारवाई के लिए नेहरू, मौलाना और माउंटबेटन जिम्मेदार हैं। रंगा लिखते हैं कि हैदराबाद के मामले में सरदार पटेल स्वयं महसूस करते थे कि पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री पद पर उनके दावे को निष्फल कर दिया था और इसमें मौलाना आजाद एवं लार्ड माउंटबेटन ने सहयोग दिया था। सरदार पटेल शीघ्र ही हैदराबाद के एकीकरण के पक्ष में थे, लेकिन जवाहरलाल नेहरू इससे सहमत हीं थे। लार्ड माउंटबेटन की कूटनीति से सरदार पटेल के विचार और प्रयासों को साकार रूप देने में विलम्ब हो गया।
सरदार पटेल के विरोधियों ने उन्हें मुसलिम वर्ग के विरोधी के रूप में वर्णित किया; लेकिन वास्तव में सरदार पटेल हिंदू-मुसलिम एकता के लिए संघर्षरत रहे। इस धारणा की पुष्टि उनके विचारों एवं कार्यों से होती है; यहां तक कि गांधी जी ने भी स्पष्ट किया था कि ‘‘सरदार पटेल को मुसलिम-विरोधी बताना सत्य को झुठलाना है। यह बहुत बड़ी विडंबना है।’’ वस्तुत: स्वतंत्रता-प्राप्ति के तत्काल बाद अलीगढ़ विश्वविद्यालय में दिए गए उनके व्याख्यान में हिंदू-मुसलिम प्रश्न पर उनके विचारों की पुष्टि होती है।
इसी प्रकार, निहित स्वार्थ के वशीभूत होकर लोगों ने नेहरू और पटेल के बीच विवाद को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया है तथा जान-बूझकर पटेल और नेहरू के बीच परस्पर मान-सम्मान और स्नेह की उपेक्षा की। इन दोनों दिग्ग्ज नेताओं के बीच एक-दूसरे के प्रति आदर और स्नेह के भाव उन पात्रों से झलकते हैं, जो उन्होंने गांधीजी की हत्या के बाद एक-दूसरे को लिखे थे। निस्संदेह, सरदार पटेल की कांग्रेस संगठन पर मजबूत पकड़ थी और नेहरूजी को वे आसानी से (वोटों से) पराजित कर सकते थे। लेकिन वे गांधीजी की इच्छा का सम्मान रखते हुए दूसरे नंबर पर कमान पाकर संतुष्ट थे। तथा उन्होंने राष्ट्र के कल्याण को सर्वोपरि स्थान दिया।
सरदार पटेल चीन के साथ मैत्री तथा ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ के विचार से सहमत नहीं थे। इस विचार के कारण गुमराह होकर नेहरू जी यह मानने लगे थे कि यदि भारत तिब्बत मुद्दे पर पीछे हट जाता है तो चीन और भारत के बीच स्थायी मैत्री स्थापित हो जाएगी। विदेश मंत्रालय ने तत्कालीन महासचिव श्री गिरिजाशंकर वाजपेयी भी सरदार पटेल के विचारों से सहमत थे। वे संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन के दावे का समर्थन करने के पक्ष में भी नहीं थे। उन्होंने चीन की तिब्बत नीति पर एक लंबा नोट लिखकर उसके दुष्परिणामों से नेहरू को आगाह किया था।
सरदार पटेल को आशंका थी कि भारत की मार्क्सवादी पार्टी की देश से बाहर साम्यवादियों तक पहुँच होगी, खासतौर से चीन तक, और अन्य साम्यवादी देशों से उन्हें हथियार एवं साहित्य आदि की आपूर्ति अवश्य होती होगी। वे चाहते थे कि सरकार द्वारा भारत के साम्यवादी दल तथा चीन के बारे में स्पष्ट नीति बनाई जाए।
इसी प्रकार, भारत की आर्थिक नीति के संबंध में सरदार पटेल के स्पष्ट विचार थे तथा कैबिनेट की बैठकों में उन्होंने नेहरूजी के समझ अपने विचार बार-बार रखे, लेकिन किसी-न-किसी कारणवश उनके विचारों पर अमल नहीं किया गया। उदाहरण के लिए, उनके विचार में उस समय समुचित योजना तैयार करके उदारीकरण की नीति अपनाई जानी चाहिए। आज सोवियत संघ पर आधरित नेहरूवादी आर्थिक नीतियों के स्थान पर जोर-शोर से उदारीकरण की नीति ही अपनाई जा रही है।
खेद की बात है कि सरदार पटेल को सही रूप में नहीं समझा गया। उनके ऐसे राजनीतिक विरोधियों के हम शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने निरन्तर उनके विरुद्ध अभियान चलाया तथा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया, जिससे पटेल को अप्रत्यक्ष रूप से सम्मान मिला। समाजवादी नेहरू को अपना अग्रणी नेता मानते थे। इन लोगों ने पटेल को बदनाम किया तथा उनकी छवि पूँजीवाद के समर्थक के रूप में प्रस्तुत की। इन्होंने सरदार पटेल को क्रांतिकारी माना; लेकिन सौभाग्यवश सबसे पहले समाजवादियों ने ही यह महसूस किया था कि उन्होंने पटेल के बारे में गलत निर्णय लिया है।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के पच्चीस वर्ष बाद चक्रवर्ती राज गोपालाचारी ने लिखा-‘‘निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता। यदि पटेल कुछ दिन और जीवित रहते तो उन्हें यह पद मिल जाता, जिसके लिए संभवत: वे सही पात्र थे। तब भारत में कश्मीर, तिब्बत चीन और धार्मिक विवादों की कोई समस्या नहीं रहती।’’
लेकिन निराशाजनक स्थिति यह रही कि सरदार पटेल के आदर्शों का बढ़-चढ़कर प्रचार करने वाले तथा उनके कार्यों की सराहना करने वाले भारतीय जनता पार्टी के अग्रणी नेताओं ने कांग्रेस से भी ज्यादा उनकी उपेक्षा की। ‘’सरदार पटेल सोसाइटी’ के संस्थापक एवं यूनाइटेड नेशनल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष श्री एस. निजलिंगप्पा ने अपनी जीवनी ‘माइ लाइफ ऐंड पॉलिटक्स’ (उनकी मृत्यु के कुछ माह पश्चात् प्रकाशित) में लिखा था-

‘‘……आश्चर्य होता है कि पं. नेहरू से लेकर अब तक कांग्रेसी नेताओं को उनकी जीवनियाँ तथा संगृहीत चुनिंदा कार्यों को छपवाकर स्मरण किया जाता है। उनकी प्रतिमाएँ लगाई जाती हैं तथा उनके नामों पर बड़ी-बड़ी इमारतों के नाम रखे जाते हैं। लेकिन सरदार पटेल के नाम की स्मृति में पिछले 70 वर्षों में ऐसा कुछ नहीं किया गया था।

इस कमी को आज देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंदर मोदी जी ने सरदार की सबसे बड़ी प्रतिमा देश को समर्पित कर महान कार्य किया हैं।
#SardarVallabhbhaiPatel #SardarPatelStatue #Statue_Of_Unity

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