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चौधरी कुम्भाराम आर्य पुण्यतिथि विशेष..|


अंग्रेजी काल मे गुलामी व शोषण की एक श्रृंखला होती थी।अंग्रेजों के गुलाम देशी राजा और देशी राजाओं के गुलाम जागीरदार/सामंत।अंत मे सामंतों के गुलाम किसान-कामगार।शोषण की इस श्रृंखला में सबसे निचले पायदान वाला पिसता है क्योंकि ऊपर वाले सारे परजीवी बनकर मेहनतकशों की पूंजी लूटते है।

10मई 1914 को पटियाला में भैराराम सुंडा व जीवनी के घर बालक का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया “कुरड़ा”जो आगे चलकर चौधरी कुम्भाराम आर्य नाम से प्रसिद्ध हुआ।मूलतः सीकर जिले के रहने वाले सुंडा परिवार का पलायन पटियाला से होता हुआ बीकानेर रियासत में हो गया और चौधरी कुम्भाराम आर्य के संघर्षों की कर्मस्थली बन गया।
संयुक्त पंजाब में चौधरी छोटूराम की प्रेरणा से शिक्षा का प्रचार-प्रसार चल रहा था।माँ जीवणी ने उसका दाखिला स्कूल में करवा दिया।स्कूल में अध्यापक की कलम से बालक “कुरड़ा” कुम्भाराम बन गया और जो ताने पड़ौस की महिला देती थी कि कौनसा थानेदार बना देगी तो संयोग से आगे जाकर कुम्भाराम थानेदार ही बना।
कुम्भाराम जाट से कुम्भाराम आर्य
एक बार कुम्भाराम अपने सहपाठी जयपाल शर्मा के साथ स्कूल से उनके घर चले गए।प्यासे कुम्भाराम ने मटके से पानी पी लिया।उसको देखकर जयपाल की माँ आग बबूला हो गई और कहा “तुम अछूत जाट ने मटकी के कैसे हाथ लगा दिया,अब यह बेकार हो गई,इसके पैसे कौन देगा?”कुम्भाराम ने यह सवाल माँ के सामने रखा मगर संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई।एक तरफ जागीरदारों द्वारा अमानवीय शोषण व दूसरी तरफ सामाजिक भेदभावों की ऊंची दीवारों से कुम्भाराम आजिज आ चुके थे।मन मे बगावत की चिंगारी उठ चुकी थी।इसी बीच गांव में आर्य समाजियों का कार्यक्रम हुआ और यह बात सामने रखी गई कि यहां भेदभाव नहीं किया जाता तो कुम्भाराम जाट से कुम्भाराम आर्य बन गए।
पांचवी परीक्षा में प्रथम आने के बाद भी पिताजी का देहांत होने के कारण कुम्भाराम को पढ़ाई छोड़नी पड़ी।कम उम्र में वन विभाग में नौकरी लगी मगर बाद में कम उम्र के बालक से नौकरी न करवाने का अध्यादेश पारित हुआ तो नौकरी चली गई।दुबारा पुलिस विभाग में क्लर्क से लेकर थानेदार तक का सफर तय किया और पुलिस विभाग में नौकरी करते हुए सामंतो/जागीरदारों के अत्याचारों को सहन नही कर पाएं और नौकरी के साथ-साथ आजादी के आंदोलन कार्यक्रमों में शामिल होने लगे।
अपनी होशियारी व वाकपटुता के कारण चौधरी कुम्भाराम धीरे-धीरे किसान कामगारों की आवाज बनकर उभरने लगे।रियासती विभाग व कुम्भाराम की कार्यशैली के बीच धीरे-धीरे टकराव होने लगा!बीकानेर पुलिस आयुक्त कार्यालय से 1946 में नोटिस निकला- “कुंभाराम नाम का मुजरिम फरार है, उसे जो भी शख्स पकड़वायेगा उसको ₹100 का इनाम दिया जाएगा। मुजरिम का रंग कन्दूम, गोल चेहरा, हट्टा-कट्टा, लंबाई 5 फुट 7 इंच तथा बाएं हाथ पर कुंभाराम नाम खुदा है।”ईमानदारी व कर्तव्यपरायणता का बीकानेर की रियासती पुलिस ने यह इनाम दिया था मगर जनता ने कुम्भाराम को अपनी पलकों पर बैठाया और थानेदार कुम्भाराम से अब किसान मसीहा कुम्भाराम बनने की स्वच्छंद उड़ान की शुरुआत हो गई।
कुम्भाराम के सम्मान में पहली ही सभा ललाना गांव में हुई जिसमें सैंकड़ों किसान एकत्रित हुए।रियासत के कान खड़े हो गए मगर तुरंत कुम्भाराम ने अगली सभा प्रजा परिषद के बैनर तले ललाना गांव में करने की घोषणा कर दी।तिलमिलाए सामंतों ने रोकने की कोशिश की मगर कुम्भाराम की बगावत व हौंसले को वो कहाँ रोक पाते!कुम्भाराम ने मंच से चुनौती देते हुए कहा “गुंडों ने वहीं पर रामजस को मारने की धमकी दी तो कुंभाराम मंच पर खड़े होकर दहाड़े, “अरे ओ जागीरदार के वफादारो! सबसे पहले मेरे सीने पर गोली मारो!एक समय आएगा जब हम कुआं खोदेंगे तो पानी मिलेगा लेकिन जागीरदारों के निशान कहीं ढूंढने पर भी नहीं मिलेंगे!”
यहीं से कुम्भाराम चौधरी कुम्भाराम आर्य बने और किसानों-कामगारों के नेता बन गए।रियासत से निकाला, गिरफ्तारी,जेल,जमानत आदि दिनचर्या का हिस्सा बन गए मगर बगावत की चिंगारी भारी राजस्थान को दिशा देने लग गई।बाद में प्रजा परिषद की बढ़ती ताकत को ताकत हुए बीकानेर रियासत ने मंत्रिमंडल का गठन किया और चौधरी कुम्भाराम को राजस्व मंत्री बनाया गया।26जनवरी 1947 को कुम्भाराम ने आदेश पारित किया और किसानों को कुओं,तालाब,जोहड़ आदि पर कब्जा दे दिया और जागीरदारों द्वारा ली जाने वाली भेंट, बेगार, लालबाग और बांटा पर लगाम लगा दिया।लाज़िम था षड्यंत्र होगा और हुआ भी ऐसा ही।मतभेद उभरे और प्रजा परिषद मंत्रिमंडल से अलग हो गई।
30 मार्च 1949 को बीकानेर का राजस्थान में विलय कर दिया और कुम्भाराम आर्य अंतरिम सरकार में गृहमंत्री तो बलदेवराम जी मिर्धा राजस्व मंत्री बने।एक राजस्व विभाग के माध्यम से किसान हितैषी कानूनी बनाता तो दूसरा सामंतों व डाकुओं के गठजोड़ को तोड़ता रहा।कुम्भाराम जी अक्सर कहते थे “जमीन किंकी, बाव जिंकी!”और मारवाड़ में एक नारा चलता था “बलदेवो राजकुमार भोमली(जमीन)जाटों की!”
यह कुम्भाराम जी की दूरदर्शिता का ही कमाल था कि जागीरदारों की लूट पर रोक लगाने के लिए “राजस्थान उपज लगान नियमन अधिनियम” जून 1951 ई. में पास करवा लिया और प्रथम आम चुनाव से पूर्व ही “राजस्थान भूमिसुधार और जागीर पुनर्ग्रहण अधिनियम 1952” पास करवाया और बिना एक रुपया दिए किसानों को जमीनों का मालिक बनवा दिया।1952 के आम चुनावों में जहां प्रजा परिषद के जयनारायण व्यास जैसे बड़े नेता सामंतों से कड़ी टक्कर में हार गए और चौधरी कुम्भाराम बड़े भारी अंतर से विजयी हुए थे।
बाद में चौधरी कुम्भाराम के कई नेताओं के साथ मतभेद हुए मगर किसानों के हितों व खुद के स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया।आगे कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया तो पंचायती राज संघ के निर्माण में लग गए जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश नारायण व कुम्भाराम जी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने।इसी के दबाव में आकर पंडित नेहरू ने नागौर से पंचायती राज की स्थापना की थी।वर्तमान सरपंचों-प्रधानों के कार्यालय में एक तस्वीर चौधरी कुम्भाराम आर्य की अनिवार्य होनी चाहिए।
चौधरी कुम्भाराम ने गरीब किसान परिवार में खेती से लेकर केंद्र तक की राजनीति में दखल रखा और राजस्थान में मुख्यमंत्री मेकर के रूप में प्रसिद्ध हुए थे।चौधरी कुम्भाराम ने अपना पूरा जीवन किसान-कामगारों के लिए समर्पित किया।26अक्टूबर 1995 में जब इस माटी के सपूत ने दुनियाँ को अलविदा कहा उस समय किसान-कामगार उस अवस्था मे पहुंच चुके थे कि खुद अपने बूते अपने भाग्य का फैसला कर सके।
आज बड़ी मायूसी होती है कि जिस मृत्युभोज, सामाजिक भेदभाव जैसी कुरीतियों से कुम्भाराम जी जूझ रहे थे वो कम तो हुई मगर उस मिशन को हम अंजाम तक नहीं पहुंचा पाएं।दिल मे बड़ा दर्द होता जब चौधरी कुम्भाराम आर्य की किताब “वर्ग चेतना”पढ़ता हूँ तो!जिस महापुरुष ने हमे भविष्य की दिशा बताने के लिए जो किताब लिखी थी उसको पढ़ना तो दूर खुद कुम्भाराम जी को ही हम वो सम्मान नहीं दे पाएं जिसके वो असली हकदार थे।आज हमारे युवाओं में अपने बाप को बाप न कहकर दूसरों के बाप को बाप कहने की जो होड़ मची हुई है वो देखकर मन द्रवित हो जाता है।
निकले थे बड़ा कारवां लेकर मंजिल को
सेनापति गुजरा और काफिला बिखर गया।

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